भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 551, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 551

वैसे ही प्रकाशक ब्रह्म-सम्बन्धसे अध्यस्त दृश्यमात्रमें उत्कर्ष है । अतः उसके परमार्थ सत्य होनेकी कोई अपेक्षा नहीं है । अतएव ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आदि न आ सकेगी । यदि दूसरे अभिप्रायसे प्रश्न हो कि भूमा परमार्थतः किसमें प्रतिष्ठित है, तब तो 'यदि वा नो महिम्नि'—वह महिमामें प्रतिष्ठित नही है, यही उत्तर है; क्योंकि 'अन्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठितः'—दूसरा ही दूसरेमें प्रतिष्ठित होता है । जब भूमासे भिन्न परमार्थ सत्य कोई पदार्थ ही नहीं है, तब भूमाकी किसमें प्रतिष्ठा कही जाय ? 'यत्र नान्यत्पश्यति' इत्यादि वाक्यसे अद्वैत ब्रह्म ही भूमा कहा गया है । इस तरह जब पूर्व वाक्यसे ही अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय हो गया, तब तो फिर उसके अनुसार ही 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका भी सर्वात्मता-प्रतिपादनमे ही तात्पर्य होगा । दो वाक्योंका पृथक् अर्थकल्पना करना निरर्थक है । अतः 'स एवाधस्तात्' इत्यादि वाक्योंका यही तात्पर्य है कि अधर्-ऊर्ध्व, देशकाल आदि सब कुछ भूमा ही है । 'जाति सर्वगता होती है' इस सिद्धान्तके अनुसार व्यापक जातिके समान भूमा अन्यमें अधिष्ठित भी हो सकता है । जैसे घटत्वादि जाति घटादिमें तादात्म्यसम्बन्धसे एव अन्यत्र स्वरूप-सम्बन्धसे रहती है, वैसे ही भूमा अपने कार्योंमें तादात्म्यसम्बन्धसे और अनादि पदार्थोंमें स्वज्ञान-विष- यत्वादिसम्बन्धसे प्रतिष्ठित होता है । 'अहमेवाधस्तात्' इत्यादिके मध्यमें अहंका- रोपदेश भी व्यर्थ नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ब्रह्ममें अपरोक्षता, प्रत्यक्चैतन्या- भिन्नता आदिके प्रतिपादनके लिये उसकी सार्थकता पहले ही कह चुके हैं । कहा जाता है कि 'वेदान्त-मतानुसार प्रत्यक्चैतन्य आत्मा ही मुख्यरूपसे अपरोक्ष है । उसके साथ ब्रह्मकी एकता कहनेसे भूमा ब्रह्मकी अपरोक्षता ( प्रत्यक्षता) सिद्ध हो ही जानी, फिर अहंकारकी, जो वस्तुतः सर्वरूप नही है सर्वात्मता क्यो कही गयी ?' परतु इसका उत्तर यही है कि यद्यपि आत्माके सम्बन्धसे ही अहंकारकी भी अपरोक्षता है, अतः आत्माकी एकतासे ही भूमाकी अपरोक्षता सिद्ध हो सकती थी तथापि अहकार (मै) मे अपरोक्षता लोकमें बहुत प्रसिद्ध है, इसलिये उसकी उक्ति सार्थक है । इसके सिवा यदि 'अहं' का अर्थ अणुपरिणाम आत्मा ही मान लिया जाय, तब तो उसमे व्यापकता, सर्वरूपता आदि कुछ भी नहीं बन सकती । कुछ लोग कहते हैं कि 'भूमा नारायणख्यः स्यात् स एवाहंकृतिः स्मृतः। जीवस्थस्त्वनिरुद्धो यः सोऽहंकार इतीरितः ॥ अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेवः परो विभुः । आत्मेत्युक्तः स च व्यापी' इस स्मृतिमें भूमारूप नारायणहीको अहंकृति कहा गया है । एवं जीवमें रहनेवाले अनिरुद्धको ही अहंकार कहा गया है और 'अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्परः । योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम् ॥ सोऽहंकार इति प्रोक्तः सर्वतेजोमयो हि सः' इत्यादि स्मृतियोसे व्यक्त-भावको प्राप्त होकर पितामहको रचनेवाला ही अहंकार कहा गया है ।