मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'अहमस्वाप्सम्' इस प्रतीतिमें उसकी स्मृति न मानी जाय।' पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सर्वत्र स्मर्यमाण आत्माके साथ अभेदारोप होनेके कारण ही अहम्भावमें स्मृतित्वका अभिमान होता है। अतः सुषुप्तिमें अहमर्थका अनुभव माननेका कोई भी स्थिर आधार नहीं। यदि कहा जाय कि अपरामर्श-परामर्शभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप कहीं नहीं देखा जाता अर्थात् स्मृतिसे भिन्नमें स्मृतित्वका आरोप नहीं देखा जाता तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणरूपसे अनुभूयमान स्मर्यमाणभिन्नमें परा- मर्शत्वका आरोप होता ही है। अतएव इस कथनका भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता कि यदि अहमर्थ आत्मासे भिन्न हो तब तो 'जो पहले दुःखी था, वही अब सुखी हुआ' इस प्रतीतिके समान 'जो पहले मेरेसे भिन्न सोता था, वही अब मैं उत्पन्न हुआ हूँ' ऐसा अनुभव होना चाहिये। क्योंकि जैसे दुःखीरूपसे आत्माका पहले ज्ञान होता है, वैसे 'मुझसे अन्य पहले सोया था', ऐसा प्रथम विज्ञान ही नहीं होता। सुषुप्तिमें जैसे अहमर्थका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही मदन्यता (मेरेसे भिन्नता) का भी प्रकाश नहीं होता। सुषुप्तिमें अहमर्थके असत्त्वका ज्ञान नहीं होता। जागने- पर अनुभूयमान अहङ्कारमें सोनेके पहले कालमें गृहीत अहङ्कारसे अभिन्नता ही गृह्यमाण होती है। अतः अहङ्कारकी उत्पत्तिका बोध नहीं होता। यदि विपक्षियों को ऐसी बुद्धि होती हो, तो इष्ट ही है। उन्हें तो यह ज्ञान होना ही चाहिये कि सुषुप्तिमें अहमर्थ नहीं था। प्रबोध होनेपर सुषुप्तिके अधिष्ठान चैतन्यमें ही अहमर्थ- का अध्यास होता है। उसीमें सोनेसे पहलेके अहमर्थका अभेद प्रतीत होता है। इस- पर कुछ लोगोंका कहना है कि 'जब अहमर्थमें आत्मासे भिन्न सिद्ध हो जाय, तभी स्मर्यमाण आत्मामें अहमर्थके ऐक्यका आरोप होगा और जब वैसा आरोप सिद्ध हो जायगा, तब सुषुप्तिमें अहमर्थके अप्रकाश होनेसे उसकी आत्मासे भिन्नता सिद्ध होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा।' पर यह ठीक नहीं, क्योंकि आत्मासे भिन्नता-सिद्धिके पहले ही सुषुप्तिमें अहमर्थका अप्रकाश सिद्ध हो जाता है। 'अहमस्वाप्सम्' इसीको आत्मपरामर्श मान लेनेसे दृष्टहान और अदृष्टकी कल्पना भी नहीं करनी पड़ेगी। अह शब्दका गौणार्थ देहादि है। मुख्यार्थ अन्तःकरण और आत्माका अन्योन्याध्यासरूप चिज्जडग्रन्थि है और लक्ष्यार्थ आत्मा है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण होता तब तो उसका भी उसी तरह स्मरण होता, जैसे गतदिनके अहमर्थका स्मरण होता है। इसे इष्टापत्ति नहीं कहा जा सकता; क्योंकि पूर्व दिनमें जैसे इच्छादिविशिष्ट आत्मा गृहीत हुआ है, वैसे ही सौषुप्त आत्माका भी परामर्श होना चाहिये था। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता तो 'इतने समयतक मैं अभिमन्यमान था' इस तरह परामर्श अवश्य होता। कहा जाता है कि अहमर्थके एकदेशमें अभिमानवान् अन्तःकरण तो लीन होगया