मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशास्त्रगम्य है । यह सब कथन पूर्वोक्त पक्षके विरुद्ध नही है; क्योंकि मोक्षावस्थाथी आत्मा केवल शास्त्रसे ही अवगत होता है । इसलिये वचनसे ही यह कहा गया कि उपाधिमात्रविरही निष्कलङ्क चेतनमे प्रत्यभिज्ञाका निषेध किया गया है । अन्तःकरण पद उपाधिमात्रमें तात्पर्य रखता है । तथा च सुषुप्तिमें अज्ञानोपहित आत्मा भी प्रत्यभिज्ञानार्ह ( पहचानने योग्य ) है । इसके सिवा अन्तःकरणराहित्य दशामें विवरणवाक्यद्वारा प्रत्यभिज्ञाका ही निषेध है, अभिज्ञाका नही । देखी हुई वस्तुके फिर देखनेपर 'यह वही है' ऐसा पहचाननेको 'प्रत्यभिज्ञा' कहा जाता है और केवल ज्ञानको 'अभिज्ञा' कहा जाता है। सुषुप्ति दशामें अन्तःकरण न होनेसे प्रत्यभिज्ञाके न होनेपर भी यहीं अविद्योपहित चेतनकी ज्ञानरूप अभिज्ञामें कोई बाधा नही है । अतः सुषुप्तिमें अहंकाररहित आत्माके अनुभवमें कोई भी आपत्ति नही उठायी जा सकती । जो यह कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण न होता, तब तो इतने समयतक मै सोता था या अन्य कोई—'एतावन्तं कालं सुप्तोऽहमन्यो वा' ऐसा संशय होना चाहिये, 'मै ही सोया था' ऐसा निश्चय न होना चाहिये । पर वह भी ठीक नहीं, क्योंकि सुषुप्तिकालमें अनुभूत आत्मामें ही अहंकारका ऐक्याध्यास होनेसे 'मै ही सोता था' ऐसा निश्चित प्रत्यय होता है । वास्तवमें 'अहमज्ञः' इत्यादि स्थलोमें भी अज्ञान अहमर्थके आश्रित नहीं, किंतु अहंकारके अधिष्ठानभूत चैतन्यमे ही रहता है । इस तरह अज्ञान और अहंकार एक अधिकरणमें रहते हैं, अतः सामानाधिकरण्य या एकाश्रयाश्रितत्व होनेके कारण अज्ञानमें अहमर्थाश्रयत्वकी प्रतीति होती है, जैसे सामान्य, समवाय आदि और सत्ता—दोनोंहीका समान द्रव्यादि आश्रय होनेके कारण ही 'सामान्यं सत्, समवायः सन्' इत्यादि व्यवहार होता है, वैसे ही 'अहमज्ञः' इत्यादि व्यवहार होते हैं । ऐसी स्थितिमें जैसे कोई पहले दिन चैत्रभिन्न देवदत्तको भ्रान्तिसे चैत्र मानकर, दूसरे दिन 'सोऽयं चैत्रः' ऐसा प्रत्यभिज्ञान ( पहचान ) करता हे, वैसे ही भ्रान्तिसे अज्ञानाश्रय चित्को भ्रान्तिसे अहमर्थ मानकर दूसरे दिन अज्ञानाश्रयत्वेन अहमर्थका प्रत्यभिज्ञान करता है । इसके सिवा निश्चय होनेपर सशय न होनेका नियम तो है, किंतु निश्चय न होनेपर सशय होनेका नियम नहीं है । अतएव कहा गया है कि 'सत्यारोपे निमित्तानु- सरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोपः' अर्थात् आरोप होनेपर उसके निमित्तका अन्वेषण होता है, यह नही कि निमित्तवशात् आरोप हो । जैसे कही जल-दर्पणादि प्रतिबिम्ब-निमित्तके रहनेपर भी प्रतिबिम्ब नही होता, वैसे ही निश्चयाभाव रहने- पर भी संशय नहीं होता । इसीलिये 'अहमन्यो वा' ऐसा सदेह नही होता । फिर भी यह सदेह होता है कि 'जब इतने समयतक मैं स्वप्न देखता था, इतने समय- तक मैं जागता था—'एतावन्तं कालमहं स्वप्नं पश्यन्नासमहं जाग्रदासम्' इत्यादि प्रतीतियोके समान ही 'अहमस्वाप्सम्' मै सोता था, ऐसी प्रतीति भी होती है, तब प्फिर क्या कारण है कि पहली दो प्रतीतियोमें अहमर्थकी स्मृति मानी जाय और