भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 543

७८४ मार्क्सवाद और रामराज्य में कटि-चालनके समान है; परंतु वह ठीक नहीं; क्योकि अहमर्थकी अपेक्षासे ही प्रकाश और अभिमान--दोनो ही होते हैं, अतः एकके प्रकाशसे दूसरेका आपादन युक्त ही है । यदि कहा जाय कि सुषुप्तिमें आत्माके प्रकाशमान होनेपर भी 'आत्नेत्यभिमन्यमान आसम्' इतने कालतक आत्मा ऐसा अभिमन्यमान था— ऐसा अभिमान होना चाहिये, वह भी अनुचित है, क्योकि अभिमानमें अहमर्थ ही कारण है, आत्मा नही । मनकी स्थूलावस्थासे उपहित चिद्रूप अहमर्थकी अपेक्षासे ही अहमाकारवृत्तिरूप अभिमान व्यक्त हो जाता है। वृत्तिरूप होनेपर भी उसके लिये प्रमाण व्यापारकी आवश्यकता नही होती । अहमर्थका प्रकाश भी अहमर्था- वच्छिन्न साक्षीरूप हो है, अतः उसे भी अहमर्थसे भिन्न किसीकी अपेक्षा नहीं है । यदि अभिमान साक्षीमात्रसे ही प्रकाशित होता है। यदि सुषुप्तिमे अहमर्थ हो- तब तो अवश्य ही उसका प्रकाश और अभिमान होना चाहिये । कुछ लोग कहते हैं कि 'सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता ही है।' ' न किंचिदहमवेदिषम्'—'मैंने कुछ भी नहीं जाना' इस अज्ञानपरामर्शका विषय अहमर्थके अज्ञानसे भिन्न ही विषय है । जैसे वेदान्तीके मतमें चिद्रूपांशमें अज्ञान अमान्य है; क्योकि वह भासमान है, अतः पूर्णानन्दांशमे ही अज्ञान मान्य है, वैसे ही अहमर्थांशमें भी अज्ञान अमान्य है, अन्यथा अहमर्थके भानका विरोध स्पष्ट ही होगा।' परतु यह कथन असगत ही है; क्योकि साक्षिरूप ज्ञान-अज्ञानका विरोधी नहीं हुआ करता । अतएव अज्ञानका भी साक्षीसे प्रकाश होता है। जैसे मेघसे आच्छादित सूर्यद्वारा ही मेघ- का प्रकाश होता है, वैसे ही अज्ञानोपहित चैतन्यरूप साक्षीसे ही अज्ञानका प्रकाश होता है । विरोध होनेपर प्रकाश्यप्रकाशकभाव कथमपि उपपन्न नहीं हो सकता था । इसके सिवा यह कहा ही जा चुका कि सुषुप्तिमें अहमर्थ (मै ) का प्रकाश नही होता । अतएव सुषुप्तिका वर्णन करनेवाली श्रुति भी सुषुप्तिमें अहमर्थ- के अज्ञानको सिद्ध करती है । 'न विजानात्ययमहमस्मि' अर्थात् सुषुप्तिमे 'मैं यह हूँ' इस तरह जीवको ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि 'नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम् । प्राज्ञ. किंचन संवेत्ति तुरीयं सर्वदृक् सदा ॥' सुषुप्ति-अवस्था- भिमानी प्राज्ञ अपनेको, न दूसरेको, न सत्यको, न अनृतको—किसी भी तत्त्वको नही जानता; इत्यादि श्रुतिवचनके समान आत्मादिके विशेषाज्ञान प्रतिपादनमें ही उक्त श्रुति भी तात्पर्य रखती है, परतु यह कथन ठीक नहीं है। 'अहरहर्ब्रह्म गच्छन्ति सम्पद्य न विन्दुरमृतेन प्रत्यूढाः', इस आत्मबोधक श्रुतिविरोधके कारण उपर्युक्त श्रुतिका विशेषाज्ञान प्रतिपादनम तात्पर्य माना जाता है। परंतु 'न विजाना- त्ययमहमस्मि' इस श्रुतिके साथ किसी श्रुतिका विरोध नही है, अतः यह श्रुति तो अहमर्थके अज्ञानमें भी पर्यवसित होती है। जो कहा जाता है कि 'अहमर्थ स्मर्ता (स्मरण करनेवाला ) है यह तो अवश्य ही मान्य है'; इसपर अब विचारना यह है कि वह अविद्यावच्छिन्न चैतन्य है अथवा अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य । यदि प्रथम