मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७८५ मार्क्स और आत्मा पक्ष मान्य हो, तब तो 'योऽहमकार्षं सोऽहं सौषुप्तिकाज्ञानादि स्मरामि' अर्थात् जो मै कर्मोंका कर्ता था, वही मे सुषुप्तिके अज्ञानका स्मरण करता हूँ, इस अनुभव- से विरोध होगा, क्योकि कर्तृत्व अविद्यावच्छिन्न चैतन्यमें कथमपि नही बन सकता । यदि अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको ही स्मर्ता माना जाय, तब तो अहमर्थ- को ही अनुभव करनेवाला भी मानना होगा; क्योकि एकाश्रयमे रहनेसे ही स्मृति, सस्कार एवं अनुभवमें कार्यकारणभाव बनता है । इसीसे जो मै अनुभव करनेवाला था, वही मै स्मरण कर रहा हूँ, इस तरह प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है।' परतु यह सब कथन निरर्थक है, क्योंकि यह कहा जा चुका कि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य अज्ञानका अनुभव करनेवाला है और वही जाग्रत्-कालमें अन्तःकरणावच्छिन्न होकर स्मर्ता होता है। इसलिये चैतन्यके अभेदसे अनुभव और स्मरणकी एका- श्रयतामें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। कहा जाता है कि अन्तःकरणरूप उपाधिके भेदसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्यके साथ ऐक्य नही हो सकता, यह भी ठीक नहीं है। अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ही अन्तःकरणावच्छिन्न होता है, अतः भेदकल्पना असङ्गत है। फिर भी कहा जाता है कि अविद्या और अन्तःकरणरूप उपाधिका भेद होनेसे मठाकाश और मठाकाशान्तर्गत घटाकाशके समान दोनों उपहितोंका अर्थात् अविद्योपहित और अन्तःकरणोपहितका भेद अवश्य होना चाहिये। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ दृष्टान्त ही अप्रतिपन्न है। वही उपाधियाँ परस्पर उपहितकी भेदक होती हैं, जो एक दूसरीसे अनुपहितकी उपधायक होती हैं। अन्यथा कम्बु-अवच्छिन्न आकाश, ग्रीवावच्छिन्न आकाशसे पृथक् ही समझा जाना चाहिये। इस दृष्टिसे यद्यपि मठबहिर्भूत घटसे अवच्छिन्न आकाश मठा- वच्छिन्न आकाशसे भिन्न कहा जा सकता है, क्योंकि वे दोनों उपाधियाँ एक दूसरेसे अनुपहित आकाशको ही उपहित बनाती हैं, तथापि मठान्तर्गत घट तो मठापहित मठाकाशको ही घटोपहित घटाकाश बनाता है, अतः इन दोनोंका परस्पर भेद नहीं कहा जा सकता । इस तरह अविद्यान्तर्गत अन्तःकरण, अन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्यको अविद्यावच्छिन्न चैतन्यसे भिन्न नहीं बन सकता । कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ न होता तो 'मै निर्दुःख होऊँ' इस इच्छासे प्राणियोंकी सुषुप्तिके लिये प्रवृत्ति न होनी चाहिये। परंतु यह भी ठीक नहीं। जैसे 'मै दुबला हूँ, मोटा हो जाऊँ' इस बुद्धिसे इच्छासे स्थौल्य- सम्पादनमें प्रवृत्ति होती है, यहाँ स्थौल्य दशामें कार्यके न रहनेपर भी कृशकी स्थौल्य-सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। वैसे ही निर्दुःख सुषुप्ति-दशामें अहमर्थके न होनेपर भी अहमर्थकी निर्दुःख होनेकी इच्छासे सुषुप्तिमें प्रवृत्ति हो जाती है। यदि कहा जाय कि कार्श्यादिसे विविक्त (पृथक्) शरीरमें ही स्थूलताकी इच्छा होती है, तब प्रकृतमें भी यही कहा जा सकता है कि अन्तःकरण निष्कृष्ट केवल साक्षी मा० रा० ५९—