मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७९६ मार्क्सवाद और रामराज्य पर्यवसित होगे । परंतु यह कथन ठीक नहीं है । गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है । किंतु जैसे 'इदम्' (पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है । वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है । आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप (भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है । जो कहा जाता है कि 'ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय-दोष होगा', वह भी ठीक नहीं । सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता । इसीसे उन दोनोका भेद सिद्ध हो जाता है । कहा जाता है कि 'अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अतः अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं । परामशसे सिद्ध सुषुप्तिमे अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अतः अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही। यहाँ संदेह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया । अतः यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है ?' परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमे प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है, स्वाभाविक नहीं । स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है । इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमे भी स्नेहात्मक-वृत्तिरूप प्रेम होता है । रहा यह कि 'अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय', यह भी ठीक नहीं, क्योकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है । परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता । अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामे प्रमाण है, अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है । कहा जाता है कि 'समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् । विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥' अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय (अधिष्ठान) के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता । इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये । परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये ? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठानके जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता—ऐसा नियम है । जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व,