भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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मार्क्स और आत्मा ७१७ शुक्तित्वादि धर्मका भान नहीं होता, क्योंकि शुक्तित्वादिविशिष्ट शुक्तिकाके ज्ञान होनेसे आरोपित रजतकी निवृत्ति हो ही जाती है। अतः अधिष्ठानके उसी रूपसे समारोप्य रूपवान् नहीं होता, जिसके ज्ञानसे आरोपित मिट जाय। प्रेमास्पदत्व वैसा धर्म नहीं है। अतः जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिकी इदन्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मगत प्रेमास्पदताके अहमर्थमें अभानका नियम नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि आरोप्यगत वे ही धर्म अधिष्ठानमे प्रतीत हो सकते हैं जो अधिष्ठानगत धर्म-प्रतीतिका विरोधी न हो। अतएव सर्पगत भीषणता, अधिष्ठानगत इदन्ता-प्रतीतिका अविरुद्ध होनेके कारण अधिष्ठानमें भासित होती है। परन्तु अधिष्ठानगत धर्म इदन्ताकी प्रतीतिके विरुद्ध देशान्तरस्थत्वादि अन्य धर्मकी प्रतीति नहीं होती। ठीक उसी तरह आत्मामें भी आरोप्य अहमर्थके वे ही धर्म प्रतीत हो सकेंगे, जो आत्मधर्म-प्रतीतिका बाधक न हो। परन्तु यहाँ तो अप्रेमास्पदत्वरूप आरोप्यधर्म