भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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७९८ | मार्क्सवाद और रामराज्य


नहीं दिखायी देती, अतः मुक्तिकी अनिष्टापत्ति कही जा सकती है, तथापि विचार करनेसे विदित होगा कि इच्छाके समय अन्तःकरणका अध्यास होता है। अतएव यद्यपि आत्ममात्रकी मुक्तिकी इच्छा नहीं अनुभूत होती, तथापि विशिष्टगत मुक्तिकी इच्छाका ही शुद्धात्मगतत्वेन पर्यवसान होता है। आशय यह है कि इच्छाके भासक साक्षीसे ही अहमर्थका भान होता है, अतः इच्छाके उल्लेखकालमें अहमर्थ- का उल्लेख होनेपर भी विवेकियोंको अहमर्थके विविक्त आत्मगतरूपसे ही मुक्तिकी इच्छा होती है। अविवेकीको भी, जो दुःखमूलवाला हो उसमें दुःखमूलका उच्छेद हो, ऐसी इच्छा होती है। इस तरह शुद्धात्मामें दुःखमूलोच्छेदरूप मुक्तिकी इच्छा पर्यवसित होती है; क्योकि दुःखमूल अज्ञानवाला नहीं है। कहा जाता है कि यदि अहमर्थ अन्तःकरण ग्रन्थिरूप ही है तब तो 'मम मनः'—मेरा मन, मेरा अन्तःकरण—ऐसी बुद्धि नहीं होनी चाहिये; क्योकि अन्तःकरण और मन दोनो एक ही वस्तु हैं। परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि अन्तः- करण जडमात्र है। परंतु चेतन आत्मा और अन्तःकरण—इन दोनोंकी ग्रन्थि अहमर्थ है। इस भेदसे मेरा मन इस तरह षष्ठी (सम्बन्ध) बन सकती है। फिर भी कहा जाता है कि 'मनः स्फुरति, मनोऽस्ति' इस ज्ञानमें भी मनकी सत्ता और स्फूर्तिरूप आत्मासे सम्बन्ध है अतः इसे भी चिदचिद् ग्रन्थि कहा जा सकता है। फिर अह इस ज्ञान और 'मनःस्फुरति' इस ज्ञानमे समता क्यो नहीं प्रतीत होती ? यह ठीक नहीं है; क्योंकि सम्बन्धमात्र ही ग्रन्थि या संवलन नहीं कहा जाता, किंतु तादात्म्येन प्रतिभास (अभेदरूपसे प्रतीति) ही सवलन या ग्रन्थि है। 'मनः स्फुरति, मनोऽस्ति' इत्यादि स्थलोंमें आख्यातसे मनमें स्फुरण एवं सत्ताकी आश्रयता ही प्रतीत होती है, मनमें स्फुरणादिका तादात्म्य नहीं प्रतीत होता। अह इस स्थानमें तो अन्तःकरणका चेतनमें तादात्म्याध्यास है। कहा जाता है कि सभी भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश और आरोप्य—इन दो अङ्गोकी अवश्य प्रतीति होती है। यदि 'इदं रजतम्' इत्यादि भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश इदन्ताकी प्रतीति न अपेक्षित हो, तब तो बिना अधिष्ठानका भ्रम मानना पड़ेगा, जिससे शून्यवादकी प्रसक्ति अवश्य होगी। परतु 'अह इस भ्रान्तिमे तो दो अशकी प्रतीति ही नही होती। यदि कहा जाय कि वहाँ भी दो अंशकी कल्पना कर लेनी चाहिये, तब तो फिर 'आत्मा' इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनासे भ्रान्तिता-सिद्धि माननी होगी। यदि दो अशकी प्रतीति न होनेसे 'आत्मा' इस प्रतीतिकी भ्रान्ति न माने, तब तो 'अह' इस प्रतीतिको भी भ्रान्ति मानना व्यर्थ है। इन संदेहोका समाधान यह है कि यदि भ्रान्तिमें अधिष्ठान और आरोप्य—इन दो अंशकी प्रतीतिका आपादन करना है तो वह तो मान्य ही है। अहमर्थका मिथ्यात्व ही उसके द्वितीय अंशके होनेमें प्रमाण है। परतु 'आत्मा' इस बुद्धिके विषयमें भी दो अंश है; इसमे तो कुछ भी प्रमाण नहीं है। अतः 'आत्मा' इस बुद्धिमें भी दो