मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
७९६ मार्क्सवाद और रामराज्य पर्यवसित होगे । परंतु यह कथन ठीक नहीं है । गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है । किंतु जैसे 'इदम्' (पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है । वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है । आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप (भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है । जो कहा जाता है कि 'ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय-दोष होगा', वह भी ठीक नहीं । सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता । इसीसे उन दोनोका भेद सिद्ध हो जाता है । कहा जाता है कि 'अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अतः अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं । परामशसे सिद्ध सुषुप्तिमे अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अतः अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही। यहाँ संदेह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया । अतः यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है ?' परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमे प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है, स्वाभाविक नहीं । स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है । इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमे भी स्नेहात्मक-वृत्तिरूप प्रेम होता है । रहा यह कि 'अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय', यह भी ठीक नहीं, क्योकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है । परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता । अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामे प्रमाण है, अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है । कहा जाता है कि 'समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत् । विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत् ॥' अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय (अधिष्ठान) के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता । इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये । परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये ? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठानके जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता—ऐसा नियम है । जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व,
मार्क्स और आत्मा ७१७ शुक्तित्वादि धर्मका भान नहीं होता, क्योंकि शुक्तित्वादिविशिष्ट शुक्तिकाके ज्ञान होनेसे आरोपित रजतकी निवृत्ति हो ही जाती है। अतः अधिष्ठानके उसी रूपसे समारोप्य रूपवान् नहीं होता, जिसके ज्ञानसे आरोपित मिट जाय। प्रेमास्पदत्व वैसा धर्म नहीं है। अतः जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिकी इदन्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मगत प्रेमास्पदताके अहमर्थमें अभानका नियम नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी सङ्गत नहीं है, क्योंकि आरोप्यगत वे ही धर्म अधिष्ठानमे प्रतीत हो सकते हैं जो अधिष्ठानगत धर्म-प्रतीतिका विरोधी न हो। अतएव सर्पगत भीषणता, अधिष्ठानगत इदन्ता-प्रतीतिका अविरुद्ध होनेके कारण अधिष्ठानमें भासित होती है। परन्तु अधिष्ठानगत धर्म इदन्ताकी प्रतीतिके विरुद्ध देशान्तरस्थत्वादि अन्य धर्मकी प्रतीति नहीं होती। ठीक उसी तरह आत्मामें भी आरोप्य अहमर्थके वे ही धर्म प्रतीत हो सकेंगे, जो आत्मधर्म-प्रतीतिका बाधक न हो। परन्तु यहाँ तो अप्रेमास्पदत्वरूप आरोप्यधर्म
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नहीं दिखायी देती, अतः मुक्तिकी अनिष्टापत्ति कही जा सकती है, तथापि विचार करनेसे विदित होगा कि इच्छाके समय अन्तःकरणका अध्यास होता है। अतएव यद्यपि आत्ममात्रकी मुक्तिकी इच्छा नहीं अनुभूत होती, तथापि विशिष्टगत मुक्तिकी इच्छाका ही शुद्धात्मगतत्वेन पर्यवसान होता है। आशय यह है कि इच्छाके भासक साक्षीसे ही अहमर्थका भान होता है, अतः इच्छाके उल्लेखकालमें अहमर्थ- का उल्लेख होनेपर भी विवेकियोंको अहमर्थके विविक्त आत्मगतरूपसे ही मुक्तिकी इच्छा होती है। अविवेकीको भी, जो दुःखमूलवाला हो उसमें दुःखमूलका उच्छेद हो, ऐसी इच्छा होती है। इस तरह शुद्धात्मामें दुःखमूलोच्छेदरूप मुक्तिकी इच्छा पर्यवसित होती है; क्योकि दुःखमूल अज्ञानवाला नहीं है। कहा जाता है कि यदि अहमर्थ अन्तःकरण ग्रन्थिरूप ही है तब तो 'मम मनः'—मेरा मन, मेरा अन्तःकरण—ऐसी बुद्धि नहीं होनी चाहिये; क्योकि अन्तःकरण और मन दोनो एक ही वस्तु हैं। परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योकि अन्तः- करण जडमात्र है। परंतु चेतन आत्मा और अन्तःकरण—इन दोनोंकी ग्रन्थि अहमर्थ है। इस भेदसे मेरा मन इस तरह षष्ठी (सम्बन्ध) बन सकती है। फिर भी कहा जाता है कि 'मनः स्फुरति, मनोऽस्ति' इस ज्ञानमें भी मनकी सत्ता और स्फूर्तिरूप आत्मासे सम्बन्ध है अतः इसे भी चिदचिद् ग्रन्थि कहा जा सकता है। फिर अह इस ज्ञान और 'मनःस्फुरति' इस ज्ञानमे समता क्यो नहीं प्रतीत होती ? यह ठीक नहीं है; क्योंकि सम्बन्धमात्र ही ग्रन्थि या संवलन नहीं कहा जाता, किंतु तादात्म्येन प्रतिभास (अभेदरूपसे प्रतीति) ही सवलन या ग्रन्थि है। 'मनः स्फुरति, मनोऽस्ति' इत्यादि स्थलोंमें आख्यातसे मनमें स्फुरण एवं सत्ताकी आश्रयता ही प्रतीत होती है, मनमें स्फुरणादिका तादात्म्य नहीं प्रतीत होता। अह इस स्थानमें तो अन्तःकरणका चेतनमें तादात्म्याध्यास है। कहा जाता है कि सभी भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश और आरोप्य—इन दो अङ्गोकी अवश्य प्रतीति होती है। यदि 'इदं रजतम्' इत्यादि भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश इदन्ताकी प्रतीति न अपेक्षित हो, तब तो बिना अधिष्ठानका भ्रम मानना पड़ेगा, जिससे शून्यवादकी प्रसक्ति अवश्य होगी। परतु 'अह इस भ्रान्तिमे तो दो अशकी प्रतीति ही नही होती। यदि कहा जाय कि वहाँ भी दो अंशकी कल्पना कर लेनी चाहिये, तब तो फिर 'आत्मा' इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनासे भ्रान्तिता-सिद्धि माननी होगी। यदि दो अशकी प्रतीति न होनेसे 'आत्मा' इस प्रतीतिकी भ्रान्ति न माने, तब तो 'अह' इस प्रतीतिको भी भ्रान्ति मानना व्यर्थ है। इन संदेहोका समाधान यह है कि यदि भ्रान्तिमें अधिष्ठान और आरोप्य—इन दो अंशकी प्रतीतिका आपादन करना है तो वह तो मान्य ही है। अहमर्थका मिथ्यात्व ही उसके द्वितीय अंशके होनेमें प्रमाण है। परतु 'आत्मा' इस बुद्धिके विषयमें भी दो अंश है; इसमे तो कुछ भी प्रमाण नहीं है। अतः 'आत्मा' इस बुद्धिमें भी दो
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स्फुराम्यहम्' इस तरह स्फुरण और अज्ञ—इन दो अंगोंकी प्रतीति होती ही है।
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८०० मार्क्सवाद और रामराज्य प्रयोग मानना चाहिये, यह बात पहले ही कही जा चुकी है । जैसे 'युष्मद्' शब्द सम्बोध्य चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणया अचेतनमात्रका बोधक होता है, वैसे ही 'अस्मद्' शब्द अहंकारविशिष्ट चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणासे केवल शुद्ध चेतनमें ही प्रयुक्त होता है । आन्तर-बाह्य सभी प्रपञ्चका अधिष्ठान (आधार) सत् ही है, इसलिये घट, पट, मठ, पृथिवी, जल, तेज, आकाश सबके साथ 'सत्' (है) लगता है; जैसे आकाश सत् (है), वायु सत् (है), घट सत् (है) आदि । जैसे मिट्टीके घट-उदंचन आदि हर एक कार्यमें मिट्टी है, जलके तरंग बुलबुले आदि हर एक कार्यमें जल है, वैसे ही एक कार्यमें सत्, सत्ता या हस्ती है, अतः वही सत् कारण है । आकाशका कारण 'अहं तत्त्व' हे और उसका कारण 'महत्तत्त्व' और उसका भी 'अव्यक्त तत्त्व' है । जैसे सुषुप्तिमे अज्ञान या निद्रासे आवृत स्वप्रकाश सत्द्वारा ही मेघसे ढंके हुए सूर्यमें बादलकी तरह अज्ञान या निद्राका प्रकाश होता है, वैसे ही समष्टि अज्ञान या निद्रासे आवृत व्यापक स्वप्रकाश सत् ही उसका प्रकाशक होता है । आवृत सत्से भासित समष्टि अज्ञानको ही 'अव्यक्त' कहा जाता है । उस अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाली समष्टि बुद्धि या ज्ञानको ही 'महत्तत्त्व' कहा जाता है । जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार-ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही समष्टि सुषुप्तिके पश्चात् अज्ञानावृत सत्को अहंकार-ममकारशून्य समष्टि ज्ञान उत्पन्न होता है । यह ज्ञान अज्ञानरूप अव्यक्त- का परिणाम है । जैसे अप्रकाशरूप पर्वतकी खानसे प्रकाशमय मणिका प्रादुर्भाव होता है, किंवा जैसे सूर्यके प्रकाशको न व्यक्त करनेवाली मिट्टीसे ही उत्पन्न होकर काच सूर्यप्रतिबिम्बका ग्राहक होता है, वैसे ही निखिल शक्तियोंके आश्रय केन्द्र अज्ञान (अचित्त्तत्वसे) चैतन्य-प्रतिबिम्बग्राहकज्ञान उत्पन्न होता है (यहाँ चित्स्वरूप परमात्मासे विलक्षण अचित् या जड़-शक्ति ही अज्ञान पदसे विवक्षित है, इसीका परिणाम वृत्तिरूप ज्ञान है) । यह स्वप्रकाश परमात्म- रूप नित्यबोध या ज्ञानसे भिन्न है, अतः उसीके प्रतिबिम्ब या आभाससे युक्त होनेके कारण अचित्परिणाममे औपचारिक 'ज्ञान' पदका प्रयोग होता है । जाग्रत् एव स्वप्नके ज्ञानोका सुषुप्तिमें लय हो जाता है और सुषुप्तिके पश्चात् ही इनका पुनः प्रादुर्भाव होता है । अतः जैसे मिट्टीसे उत्पन्न और उसमें लीन होनेवाले विकारोंका मिट्टी कारण समझी जाती है, वैसे ही जाग्रदादि ज्ञानोंका सौषुप्त अज्ञान कारण समझा जाता है । सोकर जागनेवालेके अहंकार-ममकारसे शून्य प्राथमिक ईक्षण (ज्ञान)के समान ही अज्ञानोपहित सत्का अहंकार-शून्य केवल ईक्षण (ज्ञान) ही महत्तत्त्व है । पुनश्च जैसे सामान्य ईक्षणके अनन्तर 'मै अमुक हूँ' इत्यादि रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है । वैसे ही सत्के ईक्षणके बाद उसमें 'एकोऽहं बहु
स्याम्'—मैं एक हूँ, अनेक होऊँ, इस रूपसे अहङ्कारका उल्लेख होता है वही 'अह- न्तत्त्व' है। सुषुप्तिकी ओर जाते हुए भी 'मैं कहाँ और कौन हूँ' इत्यादि अहङ्कार- का पहले लय होता है। केवल कुछ चेत (ज्ञानसामान्य) रह जाता है। अन्तमें वह भी अज्ञान या सुषुप्तिमें लीन हो जाता है। परन्तु आत्मा या परमात्मस्वरूप नित्यबोध या ज्ञान तो इन तीनोंका भासक है, स्वप्रकाश सद्रूप है। जैसे बादलकी टुकड़ी देखकर आकाशव्यापी मेघमण्डल बुद्धिमें आरूढ हो सकता है, वैसे ही व्यष्टि (जीवगत) अहङ्कार, बुद्धि (ज्ञान), अज्ञान (सुषुप्ति) से ईश्वरगत समष्टि अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्ततत्त्वका बोध हो जाता है। जैसे अहङ्कारपूर्वक ही जीवका कार्य होता है, वैसे ही अहङ्कारपूर्वक ही परमात्मासे आकाशादि समस्त प्रपञ्च उत्पन्न होते हैं। तभी अहन्तत्त्वसे शब्दतन्मात्रा या अपञ्चीकृत सूक्ष्म आकाशकी उत्पत्ति मानी गयी है। सर्वप्रथम अज्ञान या अचित् भी स्वप्रकाश सत्की ही शक्ति है। अतः वह भी सत्से स्वतन्त्र होकर स्वतः सत् नहीं है। जैसे सिता (शर्करा)के सम्बन्धसे अमधुर वस्तु भी मधुर प्रतीत होती वैसे ही स्वप्रकाश सत्के सम्बन्धसे ही अव्यक्तादि सभी प्रपञ्चमें सत्ता और स्फूर्ति प्रतीत होती है। अतएव जैसे लहरोंमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, वैसे ही अव्यक्तसे लेकर सभी प्रपञ्चके भीतर-बाहर सत् ही है, स्फूर्ति ही है। जैसे जलके बिना लहर कोई वस्तु ही नहीं, वैसे ही सत्के बिना—स्फूर्तिके बिना अव्यक्त, अचित्, महत्तत्त्व, अहन्तत्त्व आकाशादि सब असत् हो जाते हैं। जबतक उनमें सत्का योग है तबतक उनका होना, उनकी सत्ता या स्फूर्ति है। सत्के बिना सब-के सब असत् हो जाते हैं। इसीलिये कहा है—'जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥ अतः अचित् आदि सभी मिथ्या हैं।, अधिष्ठानका साक्षात् बोध होते ही सब मिट जाते हैं। आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, घटादि सब उत्पन्न होते हैं और क्रमेण सब उसीमें लीन हो जाते हैं, तथापि घटाकाश, शरावाकाश, महाकाश आदि अनेक कल्पनाएँ हो जाती हैं। आकाशसे ही सूर्य, उससे ही घट और जल उसका ही आकाश और सूर्यरूपसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब होना सङ्गत है और पार्थिव प्रपञ्च पृथ्वीमें, पृथ्वी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमे और वायुके आकाशमे मिलते ही सब कुछ केवल आकाश ही रह जाता है। उसी तरह स्वप्रकाश सत्से ही उत्पन्न अनेक उपाधियोंसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब जीव, जगत् आदि अनेक भेद बनते हैं। परन्तु उत्पत्तिके विपरीत क्रमसे जब सब कुछ परमात्मामें लीन हो जाता है तब एक ही परमात्मा रह जाता है। जैसे आकाशसे ही क्रमेण घट उसीसे जल, उसीसे प्रतिबिम्ब और वही बिम्ब होता है, अन्तमें आकाश कार्य होनेसे सबका उसीमें लय हो जाता है, वैसे ही सर्व प्रपञ्च अनन्त, अखण्ड स्वप्रकाश चित्में ही उत्पन्न होता है, उसीमे लीन हो जाता है। 'अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
भा० २।९ ५६—
८०२ मार्क्सवाद और रामराज्य पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥' (श्रीमद्भा० २।१०।३२) भगवान्की उक्ति है कि सृष्टिके पहले एक मै ही था, मुझसे भिन्न कार्यकारण कुछ भी नही था, सृष्टि होनेपर भी जो प्रपञ्च उपलब्ध होता है, वह भी मै ही हूँ और अन्तमें जो अवशिष्ट रहता है वह भी मै हूँ । 'आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥' (माण्डूक्यकारिका ४। ३१) अर्थात् जो आदिमें नहीं, अन्तमें नही, वह मध्यमें भी नही ही है। यद्यपि मध्यमें सत्-सा प्रतीत होता है, तथापि है असत् ही । घटादि कार्य अपनी उत्पत्तिके पहले नहीं थे, अन्तमें नष्ट होनेके बाद भी नही रहते हैं । अतः मध्यमें सत्से प्रतीत होनेवालोंको भी असत् ही समझना चाहिये । जलकी लहरे, पानीके बुलबुले और स्वप्न- के पदार्थ, उत्पत्ति या प्रतीतिके पहले भी नहीं रहते, अन्तमें भी नहीं रहते, केवल मध्य- में प्रतीत होते हैं, तो भी उन्हें असत् ही समझना उचित है। 'अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥' (गीता २।२८) सभी प्रपञ्च उत्पत्तिके पहले अव्यक्त ही था, अन्तमें भी सब अव्यक्त हो जाता है, केवल मध्यमें व्यक्त है, फिर उसके लिये क्या रोना ? कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति अदर्शन—अज्ञानसे ही आया, अन्तमें पुनः अदर्शनमें ही चला गया । फिर जो न अपना है, न जिसके हम हैं, उसके लिये क्या रोना ? 'अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः। नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना ॥' (महा० स्त्रीपर्व २।१३) जैसे मिट्टी या जलके भीतर ही तरह-तरहके पात्र और तरङ्ग आ जाते हैं, वैसे ही मनके भीतर ही सब दृश्य आ जाते हैं। मनकी हलचलमें ही दृश्य दिखलायी पड़ता है और उसके मिटनेमें मिट जाता है, अतः सब कुछ मन ही है । वह मन स्वप्रकाश सत् या भानके भीतर आ जाता है, अतः स्वप्रकाश सत् या अबाध्य अनन्त भान ही सब कुछ है । जैसे दर्पणके भीतर भूधर-सागर, गगन- मेघमाला, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र, वन-उपवन, नगर आदि प्रतिबिम्बरूपमें दिखायी देते हैं, वैसे ही अव्यक्तादि स्थावरान्त सदसत् सकल प्रपञ्च कूटस्थ स्वप्रकाश सत् या भानमें दिखायी देता है । जाग्रत्-स्वप्नके द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, सुषुप्तिकी निद्रा या अज्ञान जिससे प्रकाशित होते है, वही शुद्ध भानरूप आत्मा है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, प्रकाश-प्रवृत्ति मोह (रज तम-सत्त्व) इन सबका प्रकाशक सबका अधिष्ठान, सबका कारण, सबसे अतीत सत् ही आत्मा है । वह प्रतिबिम्बके समान है, प्रतिबिम्ब नहीं। अतः उससे पृथक् बिम्बकी सत्ता नहीं अपेक्षित है। जैसे शुद्ध दर्पण देखनेसे प्रतिबिम्ब दृष्टि मिट जाती है, वैसे शुद्ध सत् देखनेसे प्रपञ्च-बुद्धि मिटती है। बोध होनेके उपरान्त यद्यपि प्रपञ्चका मूल अज्ञान मिट जाता है, तथापि प्रारब्धदोषसे प्रारब्ध-स्थितितक प्रपञ्चकी प्रतीति होती है । भोगसे प्रारब्ध मिटनेपर अवश्य ही प्रपञ्चप्रतीति भी मिट जाती है--'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये।' (छां० उ० ६।१४।२) 'भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते ।'
फिर भी मनको निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये प्रथम वाक्, चक्षु आदि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको रोक लेना चाहिये, अर्थात् भाषण, दर्शन आदि इन्द्रियोंके व्यापारोंको रोककर केवल मनसे जप या ध्यान करते रहना चाहिये । जब कुछ कालके अभ्याससे दर्शनादि व्यापाररहित होकर मानस ध्यान, जपादि स्थिर हो जाय; तब मनको बुद्धिमें लय कर देना चाहिये । अर्थात् सङ्कल्प-विकल्पात्मक मनके व्यापारको निश्चयात्मिका बुद्धिमें लीन कर देना चाहिये । केवल ध्येय लक्ष्यके दृढ निश्चयमें संकल्प समाप्त कर देना चाहिये । पश्चात् व्यष्टि-बुद्धिको समष्टि-बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वमें लीन करना चाहिये और उसे फिर समष्टिबुद्धिके भी भासक शान्त आत्मामें लय करना चाहिये । अथवा वागादिव्यापारोंका मनमें लय करके मनको निश्चयात्मिका बुद्धिमें, फिर उसे समष्टि- बुद्धिमें और उसे शान्त आत्मामें नियन्त्रित या लीन करना चाहिये । बुद्धिके भासक शुद्ध भानका ही चिन्तन करना तद्भिन्न वस्तुका चिन्तन न करना ही उसका लय है । ‘यच्छे
द्वादश परिच्छेद मार्क्स और ईश्वर मार्क्सवादी विद्वान् धर्मके समान ही ईश्वरको भी अनावश्यक समझते हैं। उनकी दृष्टिमें 'भीरुता या भ्रान्तिके कारण कल्पनाप्रसूत भूत प्रेत ही सभ्यताके साबुनसे धुलते-धुलते देवता बन गया, और फिर वह कल्पित देवता ही विज्ञानकी चमत्कृतिसे चमत्कृत होकर ईश्वर या निर्गुण ब्रह्म बन गया। ईश्वर या ब्रह्म न तो कोई वास्तविक वस्तु है, न उसकी आवश्यकता ही है। ईश्वरकी कल्पनासे लाभके बदले हानि अधिक हो सकती है। कारण, ईश्वरीय शास्त्र या ईश्वरीय नियमका नाम लेकर अन्धविश्वासी लोग प्रगतिके मार्गमे बार-बार रोड़ा अटकाते रहते हैं।' एक कम्युनिस्टका कहना है कि 'जो ईश्वर या धर्मको मानते हुए भी मार्क्सकी अर्थनीति कार्यान्वित करनेकी बात करता है, या तो वह धूर्त मक्कार है अथवा महामूर्ख। ईश्वर दिखावटी हुंडी नहीं है। ईश्वर माना जायगा तो उसके नियम भी मानने पड़ेंगे। फिर व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीयकरण भी ईश्वरीय नियमके विरुद्ध ठहरेगा।' परंतु ईश्वर यदि सत्य वस्तु है तो किसीके चाहने या न चाहनेसे उसका कुछ भी बिगड़ नहीं सकता। भले ही चमगादड़ोंको सूर्यका प्रखर प्रकाश असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत होता हो, परंतु एतावता सूर्य असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक नहीं सिद्ध होते। वैसे किसीको ईश्वर भी भले ही असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत हो, फिर भी उसकी प्रचण्ड सत्ताका अपलाप होना असम्भव है। वस्तुतः सूर्यनारायणसे भी अधिक सूर्यचन्द्रका भी भासक ईश्वर एक स्वतःसिद्ध सर्वमान्य वस्तु है। यह बात आधुनिक अन्वेषण, न्याय-सांख्य-वेदान्त-दर्शन, आस्तिक सिद्धान्तो तथा आस्तिक वादोसे स्पष्ट सिद्ध है। धर्म एवं ईश्वर परम सत्य वस्तु है, इसीलिये सर्वकाल एवं सर्वदेशमें इसकी मान्यता रही है। कहा जाता है कि द्वितीय युद्धके प्रसङ्गमें अमेरिका एव अफ्रीकाके कई ऐसे प्रदेशोमें वैज्ञानिकोने अनुसंधान किया तो वहाँ यही पता चला कि वहाँके जंगली लोगोंमें धर्म एव ईश्वरके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी धारणा नही है। परंतु ठीक इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि जब उन प्रदेशोंमें जाकर कई आस्तिकोने वहाँके लोगोंसे बात की तो पता चला कि वे लोग आसमानी पिता एवं स्वर्गीय लोकपर विश्वास रखते हैं, परंतु विदेशी सभ्य कहे जानेवाले लोगोंकी पहले तो वे बात ही नहीं समझते और समझनेपर भी डरकर अपना भाव नहीं व्यक्त कर सकते। प्रोफेसर मैक्सम्यूलरके अनुसार पादरी
मार्क्स और ईश्वर [८०५]
डाक्टर कौल, जुलूजातिके मध्यमें बहुत दिनोंतक रहे। जब वे उनकी भाषा भली प्रकार बोलने और समझने लगे तो उन्हें मालूम पडा कि जुलूजातिमें भी धर्म है। उनके विश्वासानुसार प्रत्येक घरानेका एक पूर्वज था और फिर समस्त मानवजातिका भी एक पूर्वज था, जिसका नाम उन्होंने 'उनकुलंकुलू' (प्रपितामह) रखा है। जब उनसे पूछा गया कि उनकुलकुलूका पिता कौन है ? तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह बाँससे निकला था। जुलू-भाषामें बाँसको उथलङ्ग कहते हैं। बाप संतानका उथलङ्ग कहलाता है। जैसे बाँससे कल्ले फूटते हैं, उसी प्रकार बापसे संतानकी उत्पत्ति होती है। डाक्टर कौलसे एक जुलूने कहा कि 'यह ठीक नहीं कि स्वर्गीय राजाको हमने गोरे आदमियोंसे सुना है। गर्मियोंमें जब बादल गरजते हैं, तो हम कहते हैं - राजा (ईश्वर) खेल रहा है।' एक बुड्ढेने कहा कि 'हम बचपनमें यही सुना करते थे कि राजा ऊपर है, हम उसका नाम नहीं जानते। संसारको पैदा करनेवाला उम्दबूको (राजा) है, जो कि ऊपर है।' एक बुड्ढीने कहा कि जिसने सब संसार बनाया, उसीने अन्न भी बनाया। 'ईश्वर कहाँ है ?' यह पूछनेपर वृद्ध लोग कहते हैं कि वह स्वर्गमें है, राजाओंका भी राजा है। मैडम ब्लेवैट्स्कीका कहना है कि जिस प्रकार मछली पानीके बाहर नहीं रह सकती, उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी किसी प्रकारके धर्मके बाहर नहीं रह सकता।' संसारमें चेतन-अचेतन दो प्रकारके पदार्थ मिलते हैं, उनमें अचेतनसे चेतन प्रबल होता है। एक चींटी बड़े-बड़े मिट्टीके चट्टानोंको काट देती है। छोटे-छोटे कीड़े पहाड़ोंको तोड़ देते हैं। छोटा पक्षी बड़े-से-बड़े वृक्षोंको हिला देता है। वस्तुतः जहाँ चेतनता है, वहीं बल होता है। जड वस्तुएँ निर्बल होती हैं। घोड़ा गाड़ी खींचता है, गाड़ीकी अपेक्षा घोड़ा बलवान् है। जडशरीर भी चेतनके सहारे चलता है। मरे हुए हाथीसे जीवित चींटी भी बलवान् है। चेतनोंमें भी मनुष्यकी शक्ति बहुत ही प्रबल है। एक शिशु भी हाथीका नियन्त्रण करता है। सिंह-जैसा क्रूर जन्तु भी मनुष्यकी इच्छाका अनुसरण करता है। जल, वायु, बिजली आदि भूतोंपर मनुष्यका अधिकार है। रेल, तार, वायुयान आदि मनुष्य- शक्तिके ही परिचायक हैं। मनुष्य सृष्टिमें भी रद्दोबदल करता रहता है। वह समुद्रको पार कर, पहाड़-जंगलको काटकर शहर बसा देता है, नदियोंपर बड़े-बड़े पुल बाँध देता है, उनके प्रवाहको बदल देता है, स्थलोंमें जल एवं जलमें स्थल बना देता है। फिर भी विचित्र सृष्टिमें कितने ही प्राणी मनुष्यसे भी कहीं अधिक बलवान् होते हैं। गृध्रकी दृष्टि और हिरणोंके दौड़के सामने मनुष्यकी शक्ति कमजोर है। बड़े बड़े वैज्ञानिक, बलवान्, बुद्धिमान् भी महाशक्तिमान् सर्वज्ञके सामने कुछ नहीं हैं। बड़े-बड़े बलवान् अन्तमें अपने-आपको प्राकृतिक शक्तियोंके सामने नगण्य पाते हैं। वस्तुतः निश्चयके आधारपर आशा होती है और आशाके आधारपर ही प्राणीकी प्रवृत्ति होती है।
८०६ मार्क्सवाद और रामराज्य कहा जाता है, ज्यालोजी ( भूगर्भशास्त्र ) ने पता लगाया है कि अमुक चट्टाने किस प्रकार और कब बनीं ? हिमालय-जैसा महान् पर्वत भी कभी-न-कभी उत्पन्न हुआ है । एक-एक वस्तु दूसरेकी अपेक्षा नयी है । वृक्षका फूल पत्तेसे नया है । पत्ता भी जड़से नया और जड़ भी उस मिट्टीकी अपेक्षा नयी है, जिसपर जड़ उत्पन्न हुई । कहा जाता है 'पृथ्वी' एक आगका गोला थी । जैसे अङ्गारोंपर ठंडा होनेके समय सिकुडन पड जाती है, उसी प्रकार पृथ्वीका गोला जब ठंडा होने लगा तो उसमें सिकुड़न पड़ गयी । ऊँचे स्थान पहाड़ हो गये, नीचे समुद्र बन गये । बहुत पदार्थोंकी उत्पत्ति हम देखते हैं । बहुतोंका हम विश्लेषण कर सकते हैं। वे इन्द्रियाँ जिनसे ज्ञान प्राप्त किया जाता है और वे पदार्थ जिनका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, दोनो ही कार्य हैं । जिन-जिन वस्तुओंका विश्लेषण हो सकता है, वह कार्य समझा जाता है । जिनका विश्लेषण या विभाजन नहीं हो सकता वे ही परमाणु हैं । आजकल यद्यपि कहा जाता है कि परमाणुका विभाजन वैज्ञानिक कर लेते हैं । परंतु जब परमाणुकी यही परिभाषा है, तब तो जिसका विश्लेषण हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं । जो लोग परमाणु न मानकर केवल शक्ति ही मानते हैं, उन्हे भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि शक्ति कभी वर्तमान जगत्के रूपमें परिणत हुई है । चाहे परमाणुओंसे, चाहे शक्तिसे, चाहे प्रकृतिसे, चाहे ब्रह्मसे जगत्की सृष्टि हुई और उस सृष्टिमें क्रम भी मान्य होने चाहिये । यह नहीं कि पहले फल हुआ फिर फूल हुआ । मालीको यह नियम मालूम होता है कि पहले अङ्कुर, फिर नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फलका आविर्भाव होता है । इसी तरह निम्बके बीज एव आमकी गुठलीसे तथा अन्यान्य विभिन्न बीजोसे विभिन्न ढंगके अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं । निम्बका बीज बोनेसे आमका फल नहीं लगता, यह नियम भी लोगोंको ज्ञात है । इसी तरह गेहूँ बोनेसे चनेकी उत्पत्ति नहीं होती । मनुष्य तथा प्राणियोंकी भी वृद्धिका नियम है । शैशव, यौवन, वार्धक्य अवस्थाएँ क्रमेण आती हैं । चिकित्सक चिकित्सालयोंमें शारीरिक नियमोंके आधारपर ही चिकित्सा करते हैं । पहाड़ एवं पहाड़ी नदियोंका निर्माण कैसे होता है, इनका किस ओर क्यों प्रवाह है, आदिके सम्बन्धमें भूगर्भके विद्वानोंका भी भूगर्भ-सम्बन्धी नियम प्रसिद्ध है । मनोविज्ञानकी जटिलता और भी विलक्षण है । यद्यपि मनकी गति बड़ी विलक्षण होती है, फिर भी मनोविज्ञानके नियम हैं ही । इसी तरह सभी शास्त्रोंके नियम हैं। इस तरह सृष्टिकी नियमबद्धता दिखायी देती है । इन नियमोंका विधायक और पालक कोई मान्य होना चाहिये । नियमकी दृष्टिसे सृष्टिमें एकता है । हर एक नियमका प्रयोजन भी होता है । लड़कोंका प्रतिदिन एक साथ विद्यालयमें जानेका नियम व्यर्थ नहीं होता । प्रयोजन ही कार्यको सार्थक बनाता है । संसारकी सभी वस्तुओ एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती
मार्क्स और ईश्वर ८०७ है। भले ही प्रयोजन समझमें न आये, परंतु है अवश्य । एक मशीनमें हजारों पुर्जे होते हैं, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई गोला, कोई टेढ़ा—उनमें परस्पर पर्याप्त भिन्नता है, परंतु बनानेवालेका उद्देश्य कार्यसिद्धि ही है। कपड़ा बुनना, आटा पीसना, पुस्तक छापना आदि इसी प्रयोजनसे प्रेरित होकर वैज्ञानिकोंने भिन्न-भिन्न पुर्जोंको बनाकर फिर सबको इस प्रकार मिलाया कि जिससे कार्यकी सिद्धि हो । पुर्जे न तो सब बराबर हैं, न एक-से हैं, न सबके साथ एक-से जुड़े हुए हैं। सब असमान होते हुए भी एक उद्देश्यपूर्तिके लिये जुड़े हुए हैं। उनमें बहुत-से कल- पुर्जे छोटे एव भद्दे हैं। उनके स्थानपर अच्छे एव सुन्दर पुर्जे हो सकते हैं, परंतु कल चलानेमे जिसका उपयोग नहीं, वह कितना भी सुन्दर हो, व्यर्थ ही है। इसी तरह जगत् एक महाप्रयोजनके लिये निर्मित है। इसकी छोटी-से-छोटी वस्तुएँ एवं घटनाएँ भी निष्प्रयोजन नहीं हैं। राबर्ट क्रिप्सके अनुसार जिस मण्डलका हमारी पृथ्वी एक अवयवमात्र है, वह अति विशाल, विचित्र तथा नियमित है। जिन ग्रहों, उपग्रहोंसे इसका निर्माण है उनका भी परिमाण बहुत विस्तृत है। हमारी पृथ्वी ही सूर्य-चन्द्र आदिसे इस प्रकार सम्बन्धित है कि बीज बोने, खेत काटनेके समयोंमें बाधा नहीं पडती । समुद्रके ज्वारभाटे कभी हमें धोखा नहीं देते। करोड़ों मण्डलोंमेंसे सूर्यमण्डल एक है। बहुत-से तो इससे असंख्यगुने बड़े हैं। फिर ये करोड़ों, अरबों सूर्य एव तारागण जो आकाशमें बिखरे हैं, परस्पर एक-दूसरेसे ऐसे सम्बद्ध तथा गणितके गूढतम नियमोंके इतने अनुकूल हैं कि उनसे प्रत्येककी रक्षा होती है और प्रत्येक स्थानमे साम्य तथा सौन्दर्य दिखायी देता है। प्रत्येक ग्रह दूसरेके मार्गपर प्रभाव डालता है। प्रत्येक कोई-न-कोई ऐसा कार्य कर रहा है, जिसके बिना न केवल वही किंतु समस्त मण्डल नष्ट हो सकता था। यह समस्त मण्डल बड़ी विलक्षणतासे बना हुआ है। जो घटनाएँ देखनेमे भयानक और विघ्नरूप प्रतीत होती हैं, वे वस्तुतः उसे नष्ट होनेसे रोकती एव विश्वकी दृढताका साधक होती हैं। क्योकि वे परस्पर अपनी शक्तियोंका इस प्रकार व्यय करती हैं कि एक नियत समयमें उनमें सहयोग हो जाता है। यह सहयोग ही विशाल जगत्के विशाल प्रयोजनका परिचायक है। एक छोटा-सा पुष्प जहाँ मनुष्योंकी आँखोंको तृप्त करता है, उसका सुगन्ध घ्राणोंको आनन्द देता है, वैद्य लोग उसका औषधमें भी प्रयोग करते हैं, चित्रकार उससे चित्रकारी सीखते हैं, रँगरेज रंग निकालते हैं, कवि काव्यमें उससे सहायता लेते हैं। भ्रमर उसका रसास्वादन करता है, शहदकी मक्खियाँ उसमे शहद निकालती हैं, तितलियाँ उन फूलोपर बैठकर अलग आनन्द लेती हैं। उसके बहुत-से ऐसे भी प्रयोजन हैं, जिन्हें मनुष्य नहीं जानता। इतना प्रयोजन सिद्ध करके भी वृक्षकी संततिरक्षाके लिये वह बीज उगाता है। यह एक छोटे-से फूलका कार्य है।
इसी प्रकार संसारकी सभी वस्तुओंके अनेक विशाल प्रयोजन हैं । संसार कितना विशाल है ? समुद्र, पहाड़, पृथ्वी--पृथ्वीसे बहुत बड़ा सूर्य, और फिर करोड़ों सूर्य, अरबों तारे वेदान्तमतानुसार पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशादि—सब उत्तरोत्तर एक दूसरेसे दस-दस गुने बड़े हैं । फिर ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड मायाके एक अंशमें हैं’ । वह माया भगवान्के एक अशमें ऐसी प्रतीत होती है, जैसे महा- काशके एक प्रदेशमें बादलका छोटा-सा टुकड़ा । स्थूलताके साथ ही संसारमे सूक्ष्मताका भी अत्यन्त महत्त्व है । जो जल आज बर्फ या नीलमणिके रूपमें स्थूलरूपसे उपलब्ध हो रहा है, वही कभी बादल और उससे भी पहले सूर्यकी रश्मियोमे था । सूर्य-रश्मिका वह नगण्य कण जिसे परमाणु कहा जा सकता है, उसका एक पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा था । उसके अल्पाशमें वायु और वायुके अल्पाशमें प्राण, प्राणके अल्पांशमें मन और मनमे ब्रह्माण्ड था । फिर ब्रह्माण्डके भीतर अनन्तकोटि प्राणी और मन थे, उन मनोंमें फिर भी उसी तरह ब्रह्माण्डकी सत्ता थी । इस तरह एक सूक्ष्म वटबीज-कणिकामे महान् वटवृक्षका अस्तित्व और उस वटवृक्षमें अपरिगणित बीज-कणिका और उन कणिकाओमे अनन्त वटवृक्षका अस्तित्व एक साधारण सी बात जँचने लगती है । इसी तरह विश्वके छोटे-छोटे नियमोंको देखते हैं, तो नियमोका समूह उसी ढंगसे एक विशाल नियम बन जाते हैं, जैसे छोटे-छोटे कणोंका समूह एक पहाड़ । समुद्र भी जलकणोंका समुदाय ही है । यद्यपि मनुष्यकृत वस्तुओंमें भी बड़ी-बड़ी विलक्षणता दिखायी देती है । बड़े-बड़े विशालकाय पुल, दुर्ग, बाँध चकित कर देते हैं । विद्युत्के विचित्र चाकचिक्य चन्द्र-सूर्यसे होड करते हैं । वायुयानका चमत्कार भी कुछ ऐसा ही है । फिर भी यह सब स्वाभाविक ईश्वरीय वस्तुओंका एक छोटा-सा अनुकरणमात्र है । कितना भी बड़ा विशाल एवं नियमबद्ध संसार कार्य ही है, इसकी कभी-न-कभी सृष्टि हुई है, यह मानना पड़ता है । किसी भी कार्यके लिये उपादान, निमित्त एव साधारण कारण अवश्य होते हैं । जैसे एक घटका मिट्टी उपादान, कुलाल निमित्त एवं देशकाल आदि साधारण कारण होते हैं । साधारण भी क्रिया छोटी-छोटी अनेक क्रियाओका समुदाय ही होती है । एक घट-निर्माणरूप क्रियामें कितनी ही चेष्टाओंका समुदाय है । संसारके अनन्त क्रिया- जालोंमें बहुत-सी क्रियाएँ मनुष्यकृत होती हैं, जैसे घट, पट, मठ आदिका बनाना, रोना, हँसना, चलना आदि । जब घटका निर्माण मनुष्यद्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं, तो किसी भी घटको देखकर उसका निर्माता कोई मनुष्य होगा, यह अनुमान कर लिया जाता है । इसी तरह किसी भी कार्यको देखकर उसके कर्ताका अनुमान होना स्वाभाविक है । बहुत-से कार्य हैं जिनका मनुष्यद्वारा निर्माण सम्भव नहीं,
जैसे वृक्षका उगना, सूर्यका निकलना, भूकम्पका आना आदि। यह सभी क्रियाएँ है, इनका भी कोई कर्ता होना आवश्यक है। नास्तिक मेजका बनाने- वाला बढ़ई तो अवश्य मानता है, परंतु वृक्षो, पहाड़ोंको बनानेवाला कर्ता आवश्यक नही मानता। लोटेका बनानेवाला ठठेरा जरूरी है परतु नदी, समुद्रके लिये कर्ता आवश्यक नहीं। ससारकी सभी क्रियाएँ दो ही प्रकारकी है। एक प्राणिकृत, दूसरी अप्राणिकृत। सिद्धकोटिकी वस्तुएँ दृष्टान्तकोटिमे आती है, साध्यकोटिकी नहीं। दृष्टान्त वही होता है, जो दोनो पक्षोको मान्य होता है। सूर्य, चन्द्र, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि सावयव होनेसे कार्य हैं। आस्तिक कह सकता है कि जैसे मेज आदि कर्तासे निर्मित होते हैं, वैसे ही कार्य होनेसे सूर्य आदि भी किसी (ईश्वर) कर्तासे निर्मित हैं। यहाँ मेजका दृष्टान्त आस्तिक-नास्तिक दोनोको ही मान्य है। नास्तिक कहता है कि चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके कर्ता आवश्यक नहीं हैं, जैसे नदी बहनेके लिये कोई कर्ता आवश्यक नहीं होता। परतु नास्तिकका दृष्टान्त सिद्धकोटिमे नहीं है; किंतु साध्यकोटिमें है। आस्तिकके लिये नदीका बहना, सूर्यका निकलना — दोनों ही एक कोटिमें हैं। जैसे सूर्य, चन्द्र आदिका उगना ईश्वरप्रेरणापूर्वक होता है, उसी तरह नदीका बहना भी ईश्वरकृत ही है। चार्वाकमतानुयायी कहते हैं कि 'अविनाभावसम्बन्ध दुर्ज्ञेय होता है' अतः अनुमानादि प्रमाण मान्य नहीं हैं। धूमादि ज्ञानके अनन्तर जो अग्न्यादिमें प्रवृत्ति होती है, वह प्रत्यक्षमूलक है अथवा भ्रान्तिसे ही समझनी चाहिये। क्योंकि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है—यह जानना दुष्कर है, क्योकि सर्वदेश, सर्वकालके धूम-वह्निका जिसे ज्ञान हो, वही ऐसी बात कह सकता है। परतु किसी भी मनुष्यको सर्वदेश- कालके धूम और वह्निका ज्ञान होता ही नही। फिर वह कैसे कह सकता है कि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ वह्नि होता है। कतिपय स्थलमें तो यह देखा गया है कि जहाँ-जहाँ वह्नि है, वहाँ-वहाँ धूम होता है, पर अग्नितप्त लौहपिण्डमें व्यभिचार दीखनेसे व्यभिचार निश्चित हो जाता है।' परतु चार्वाकका यह कहना भी तभी सम्भव होता है जब कि अनुमानादि प्रमाण मान्य हो, क्योंकि प्रत्यक्षसे भिन्न अनुमानादि प्रमाण नहीं हैं, यह कहना भी अज्ञ, संदिग्ध, विपर्यस्त तथा जिज्ञासुके प्रति ही उचित है। जिस किसीके प्रति वचन प्रयोगको पागलपनका ही परिणाम समझा जाता है। दूसरोंका अज्ञान, संशय, भ्रान्ति या जिज्ञासा दूसरेको प्रत्यक्ष प्रमाणसे कभी भी विदित नहीं हो सकती। अतः उनके वचनों, मुखाकृति या व्यवहारसे अन्यके संशय अज्ञान आदिका अनुमानादिसे बोध होता है तथा अज्ञान-संशयादि मिटानेके लिये वचनप्रयोग सार्थक होता है। चार्वाक अङ्गनालिङ्गनजन्य सुखको पुरुषार्थ कहता है। इससे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सुख और स्त्रीगमनका अविनाभाव सम्बन्ध है। यदि स्त्रीगमन
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और सुखका अविनाभाव सम्बन्ध न हो तो उस सुखको पुरुषार्थ कैसे कहा जा सकता है ? इसी प्रकार क्षुधा-निवृत्तिके लिये नियमतः भोजनमें प्रवृत्ति भी सिद्ध करती है कि प्राणी अनुमान-प्रमाण मानकर ही क्षुधा-निवृत्तिके लिये भोजन- निर्माणमें संलग्न होता है । उसी प्रकार कृषि, व्यापार आदि सभी कार्योंमें आनु- मानिक कार्यकारणभावका निश्चय करके ही प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है । बिना अनुमान-प्रमाण अङ्गीकार किये आस्तिक, नास्तिक, चार्वाक ही क्या—पशुतककी भी कोई प्रवृत्ति नहीं हो सकती । पूर्वकी प्रवृत्तियोंसे लाभ देखकर तादृश प्रवृत्तियोंसे लाभका अनुमान करके ही प्राणी प्रवृत्त होता है । अनुमान बिना माने प्रत्यक्ष भी व्यर्थ हो जाता है । अनुमानके आधारपर अप्राणिकृत कार्योंका भी कोई कर्ता अवश्य सिद्ध होता है । कारण, सिद्धकोटिके जितने भी दृष्टान्त हैं, सभी कर्तापूर्वक ही हैं । अतः जैसे प्राणिकृत क्रिया कर्तासे होती है, वैसे ही अप्राणिकृत क्रिया भी कर्तासे ही सिद्ध होती है । प्राणिकृत, अप्राणिकृत क्रियासे भिन्न कोई क्रिया है ही नहीं । यदि बिना घड़ीसाजके घड़ी नहीं बन सकती, बिना बढ़ईके मेज नहीं बन सकती तो यह भी मानना ही चाहिये कि बिना चेतनसत्ताके चन्द्र, सूर्य, पहाड़, नदियाँ आदि भी नहीं बन सकतीं । कई लोग 'क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्'--पृथ्वी, वृक्ष आदि सकर्तृक हैं, कार्य होनेसे घटादिके तुल्य—इस अनुमानमें शरीरजन्यत्वरूप उपाधि दोष बतलाते हैं । अर्थात् जहाँ-जहाँ शरीरजन्यता होती है, वहाँ-वहाँ सकर्तृकता होती है । घटादि शरीरजन्य हैं, अतः सकर्तृक हैं; परंतु कार्यत्व तो पृथ्वी-अङ्कुरादिमें भी होता है, पर वहाँ शरीरजन्यता नहीं है । साध्य-व्यापक, साधनाव्यापक धर्म- को ही उपाधि कहा जाता है । इस तरह उनके मतानुसार कार्यत्वहेतु सोपाधिक होनेसे साध्यसिद्धिमें समर्थ नहीं होगा । परंतु यह ठीक नहीं है; क्योकि उपाधिके द्वारा या तो व्याप्ति-व्यभिचारका अनुमान होता है या पक्षमें उपाध्यभावसे साध्याभावका अनुमान होता है । तभी प्रकृत अनुमान दूषित समझा जाता है । इस तरह यहाँपर शरीराजन्यत्वरूप उपाध्यभावसे सकर्तृकत्वाभावका अनुमान करना पड़ेगा । परंतु उसमें शरीर विशेषण व्यर्थ होगा । जब अजन्यत्वमात्रसे सकर्तृकत्वाभाव सिद्ध होता है तो शरीर विशेषण व्यर्थ ही है । पृथ्वी, वृक्ष आदिमें शरीराजन्यता होनेपर भी अजन्यता नहीं है । अतः अजन्यता न होनेसे सकर्तृकत्वा- भाव नहीं सिद्ध हो सकता । सुतरां कार्यत्वरूप हेतुसे पृथ्वी-वृक्षादिमें सकर्तृकत्व- सिद्धि निर्वाध है । कई लोग पौर्वापर्यको ही कार्य-कारणभावके स्थानपर बिठलाते हैं । उनके अनुसार सदा पूर्वमें रहनेवाला कारण और सदा पश्चात् होनेवाला कार्य है; परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि अन्धकार सदा सूर्योदयके पूर्व होता है, तो भी अन्धकार सूर्योदयका
कारण नहीं माना जाता, रविवारसे पूर्व सदा शनिवार रहता है, फिर भी वह रविवारका कारण नहीं होता । कार्य कारणसे पीछे होता है, इतना ही नहीं, किंतु कारणके द्वारा होता है । तर्कसंग्रहकारकी दृष्टिसे उपादानगोचरापरोक्ष ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिवाला चेतन ही कर्ता होता है, जैसे घटका निमित्तकारण कुलाल है, वही घटका कर्ता है । उसे घटके उपादानकारण मृत्तिकाका अपरोक्षनिकटतम ज्ञान है, उसकी चिकीर्षा है, घटनिर्माणकी इच्छा है और उसमे घट बनानेका प्रयत्न है । बिना ज्ञानके इच्छा और बिना इच्छाके कृति नहीं हो सकती । इस तरह 'जानाति इच्छति अथ करोति' किसी चीजको प्राणी पहले जानता है, फिर इच्छा करता है और फिर तद्विषयक प्रयत्न करता है । इस तरह ज्ञान, इच्छा और कृति जहाँ होती है, वही कर्ता होता है । अतः भले ही घटसे मिट्टी गिरती हो फिर भी वह मिट्टी गिरनेका कारण नहीं समझा जाता । प्रत्येक कार्यको कर्ताकी अपेक्षा होती है, ये नियम सभीके मस्तिष्कपर शासन करते हैं । अतः जहाँ किसी कार्यमें प्रत्यक्ष ज्ञान एवं इच्छाका सम्बन्ध नहीं दिखायी पड़ता वहाँ प्राणी अदृष्ट इच्छाशक्तिकी कल्पना करता है । किसी पुल या किलाको देखकर प्राणी यह अवश्य सोचता है कि किसीने अपनी ज्ञानेच्छा तथा कृतिसे इसे बनाया है । इसी तरह एक प्रफुल्लित कमलको भी देखकर बुद्धिमान् अवश्य सोचता है कि यह इतनी सुन्दर वस्तु बिना किसीकी इच्छा-कृतिके कैसे सम्पन्न हो सकती है ? बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता, इस दृष्टिका सृष्टिसे भी कारण होना अनिवार्य है । अतः सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ज्ञानेच्छा-कृतिसे ही सृष्टिकी रचना उचित है । कई लोग सृष्टिको आकस्मिक कहते हैं, परंतु वस्तुतः बिना हेतुके कोई भी घटना कभी हो ही नहीं सकती । यदि विभिन्न शक्तियोंद्वारा होनेवाले कार्योंके आकस्मिक सम्बन्धमात्रको आकस्मिक कहा जाय, जैसा कि काकतालीयन्याय कहलाता है ( काकका वृक्षपर बैठना-काकके प्रयत्नका फल है, तालफलका पतन अपने कारणोंसे सम्पन्न हुआ, परंतु दोनोंका मेल आकस्मिक हो गया ) तो इस पक्षमें निर्हेतुक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता, भले सृष्टिकी विभिन्न घटनाओका मेल कभी आकस्मिक भी हो तो भी सृष्टिका कोई कार्य निर्हेतुक नहीं सिद्ध होता । वस्तुतस्तु मनसे भी अचिन्त्य रचनारूप संसारका निर्माण सर्वज्ञ सर्व- शक्तिमान् चेतन कर्ताके बिना उपपन्न नहीं हो सकता और उस सर्वज्ञका कोई भी कार्य असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । कुछ लोग स्वयम्भू प्रकृति या उसके परमाणुओंमे ही विश्वका निर्माण मानते हैं, किंतु सर्वज्ञ ईश्वरकी शक्ति, इच्छा एवं कृतिके बिना प्रकृति या परमाणुसे ससारका निर्माण कैसे हो सकता है ? बिना बुद्धि- प्रबन्धके परमाणु अपने-आप इतने विलक्षण ससारको बना सकते हैं, इससे बढ़कर युक्तिशून्य कोई बात हो नहीं सकती । किसी नास्तिक पितासे जब आस्तिक पुत्रने
कहा कि जो ससारको बनानेवाला है, वही परमेश्वर है । तो पिताने कहा कि परमाणुओके अपने आप ही एकत्रित हो जानेसे संसार बन जाता है । इसके लिये कोई सर्वज्ञ ईश्वर क्यो माना जाय ? दूसरे दिन पुत्रने बहुत सुन्दर हस्ती, अश्व, शुक, पिक, मयूरोके चित्र बनाकर उसके सामने कुछ विभिन्न रङ्गकी पेन्सिले रख दी । जब पिताने चित्रोका निर्माता पूछा तो पुत्रने कहा कि इन्हीं पेन्सिलोके परमाणु उड-उडकर कागजपर एकत्रित हो गये, उन्हींसे ये चित्र बन गये । पर पिताने इसे स्वीकार नही किया । तब पितासे पुत्रने कहा कि यदि परमाणुओके उड़- उड़कर एकत्रित हो जानेपर ऐसे चित्र भीनही बन सकते तो चन्द्रमण्डल और सूर्य- मण्डल, भूधर, सागर, मनुष्य, पशु आदि विलक्षण वस्तुएँ बुद्धिके सहयोग बिना केवल परमाणुओसे कैसे बन सकती है ? अतएव ऐसे-ऐसे अनुमान ईश्वर-सिद्धिमें उपस्थित किये जा सकते हैं । ( १ ) ससारका व्यवस्थित रूप देखकर अनुमान किया जा सकता है कि जगत्की व्यवस्था प्रशास्तृपूर्विका है, व्यवस्था होनेके कारण, राज्य-व्यवस्थाके समान । ( २ ) लोकोपकारी सूर्य-चन्द्रादिका निर्माण किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा ही हो सकता है । यद्यपि आजकल लोग सूर्य-चन्द्रादिको ईश्वरनिर्मित न मानकर स्वतःसिद्ध या प्रकृतिनिर्मित मानते हैं; परंतु यह असङ्गत है, क्योंकि दीपकादि बुद्धिमान् चेतनद्वारा ही बनाये जाते हैं। यह दृष्टान्त वादी-प्रतिवादी उभय- सम्मत है, परतु कोई वस्तु स्वतःसिद्ध है—इसमें उभय-सम्मत कोई दृष्टान्त नही है, क्योकि ईश्वरवादी सभी पदार्थोंको ईश्वरकर्तृक मानता है । प्रकृति भी जड होनेसे स्वतन्त्रकर्त्री नही हो सकती । अतः सूर्य, चन्द्र किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा निर्मित हैं, प्रकाश होनेके कारण, प्रदीपके समान । जैसे व्यवहारके लिये दीपक होता है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादि भी व्यवहारोपयोगी हैं । ( ३ ) सूर्य-चन्द्रकी विशिष्ट चेष्टा देखकर भी इसी तरह उनके नियन्ताका अनुमान होता है—'सूर्य-चन्द्र नियन्तृपूर्वक हैं, विशिष्ट चेष्टावाले होनेके कारण, भृत्यादिके समान । जैसे भृत्यकी नियमित प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादिकी भी नियमित प्रवृत्ति होती है ।' उपर्युक्त अनुमानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरसे नियन्त्रित होनेके कारण ही सूर्य-चन्द्र स्वयं ईश्वर और स्वतन्त्र होते हुए भी उदयास्तमय एव वृद्धि-क्षयसे युक्त होकर प्रकाशादिकार्यमें संलग्न रहते है । ( ४ ) पृथिवीके विधारकके रूपमें भी प्रयत्नवान् ईश्वरकी सिद्धि होती है । विवादास्पद पृथिवी प्रयत्नवान्के द्वारा विधृत है, सावयव, गुरु, संयुक्त होनेपर भी अस्फुटित, अपतित, अवियुक्त होनेके कारण, हस्तन्यस्त पाषाणादिके समान ।
मार्क्स और ईश्वर ८६३ यदि किसी चेतनमे धारण न हो तो उसमें पतन स्फुटन होना अनिवार्य होता, बिना किसी धारकके कोई भी गुरु पदार्थ टिक नहीं सकता। परस्परकर्षणसे भी स्थिति असम्भव है, क्योंकि स्थिति और गति अन्योन्याश्रित नहीं होतीं। कहा जाता है, मानवी मस्तिष्ककी सहायता बिना भी यदि कोई अंग्रेजी भाषाके अक्षरोंको उछालता रहे तो कभी शेक्सपीयरका नाटक निर्मित हो सकता है। यदि थोड़ी देरके लिये यह मान भी लिया जाय तो भी संसारके विलक्षण प्रपञ्चका विधान बिना सर्वज्ञ बुद्धिके नहीं हो सकता। भले ही किन्हीं अक्षरोंको अनन्त बार उछालो, परंतु उनके द्वारा विचार व्यक्त हो सकना असम्भव ही है। विचार व्यक्त करनेकी बात तो दूर रही, सही-सही एक पंक्तिका भी निर्माण असम्भव है। फिर अक्षरोंको उछालनेवाला भी कोई चेतन ही होता है। फिर बिना चेतनके जड़-परमाणुओंसे विश्वका निर्माण कहाँतक सम्भव है? फिर क्या आजतक कोई अक्षरोंको उछाल-उछालकर किसी छोटे-से ग्रन्थका भी निर्माण कर सका? संसारमें रोटी बनानेसे लेकर मकान, पुल, दुर्ग आदिका निर्माण बिना बुद्धिके अपने-आप ही ईंट, चूना, पत्थर, लोहा-लकड़ आदि कर लेते हों, यह नहीं देखा जाता। फिर अकस्मात् ही परमाणुओंके द्वारा संसारका निर्माण और अकस्मात् ही परमाणुओंका निष्क्रिय हो जाना या संसारका नष्ट हो जाना आदि कैसे संगत होगा? फिर यदि परमाणुके बिना सर्वज्ञ चेतनके प्रयत्नसे अपने-आप ही सूर्य, समुद्र, नदी, पर्वत बन सकते हैं, तब अन्य उपयोगके दुर्ग, पुल, गृहादिका निर्माण भी उसी तरह क्यों नहीं होता? तदर्थ मनुष्योंको प्रयत्न क्यों करना पड़ता है? यदि पहाड़ अकस्मात् बन सकता है; तब कोई पुल या किला अपने-आप क्यों नहीं बन सकता? स्वभाववादी स्वभावसे ही सृष्टिका निर्माण मानता है, परंतु स्वभाव यदि शक्तिशाली कोई चेतन है तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ। यदि सृष्टि नियमसे ही संसार- का निर्माण माना जाय तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि नियमके निर्माता प्रयोक्ता बिना नियम अकिञ्चित्कर ही होता है। भूगर्भतत्त्ववेत्ता पुरानी वस्तुओंको देख- कर बुद्धिमानोंकी कारीगरीका अनुमान करते हैं। महेन्जोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईमें मिलनेवाली वस्तुओंके आधारपर सभ्यताकी कल्पना की जाती है। यदि सब वस्तुएँ स्वभावसे ही बनती हैं, तब उन कल्पनाओंका कोई स्थान ही नहीं रह जाता। वस्तुतः किसी प्रकारके नियम ही सिद्ध करते हैं कि कोई समझदार पूर्वा- परदर्शी बुद्धिमान् ही नियम बनाता है और वही नियामक भी है। नियामक बिना नियमोंका कुछ मूल्य भी नहीं होता। अतः नियमोंके रहते हुए भी ज्ञानयुक्त उपयुक्त चुनावसे ही सुप्रबन्ध होता है। मिट्टी जलादिसे घट बननेका नियम है सही पर जबतक कोई कुम्भकार नियमोंके अनुसार कार्य नहीं करेगा तबतक घट-निर्माण
८३४ मार्क्सवाद और रामराज्य
असम्भव ही है । धरणि, अनिल, जलके संयोगसे बीजोंके अङ्कुरित होनेका नियम है तथापि जबतक किसान उन नियमोंका प्रयोग करके काम नहीं करेगा तबतक गेहूँ-यवादिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । पृथिवीकी आकर्षणशक्ति भले ही प्रत्येक परमाणुपर शासन करती रहे तथापि सहयोग एवं सुदृढताके साथ प्रबन्ध बिना उसका कोई भी सदुपयोग नहीं हो सकता । आस्तिकोंका कहना है कि जिसने हंसके अङ्गमें शुक्लरंगका निर्माण किया, शुकके अङ्गका हरा रंग बनाया, मयूरोंको चित्रित किया और फूलोंपर बैठनेवाली तितलियो- को चमकीली साड़ी बनाकर पहनाया—वही ईश्वर है। वही सबको वृत्ति देता है— येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः । मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥ ( हितोपदेश १ । १७९ ) परन्तु स्वभाववादियोका कहना है कि— शिखिनश्चित्रयेत्को वा कोकिलान् कः प्रकूजयेत् । स्वभावव्यतिरेकेण विद्यते नात्र कारणम् ॥ ( चार्वाकदर्शन ) 'मयूरोंको कौन चित्रित करता है ? कोकिलोको कौन मधुरालाप सिखाता हे ? जैसे अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता, वायुमें वहनशीलता स्वभावसे ही होती है, उसी तरह स्वभावसे ही शुक, हंसादिके रंग तथा मयूरादिका चित्रण होता है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं कि यदि परमाणुओंका स्वभाव सृष्टिरचना है, तब कभी सृष्टि-विघटन नहीं होना चाहिये । यदि कहा जाय कि किन्हींका स्वभाव मिलनेका है, किन्हींका विघटनका है, तो भी जैसे परमाणुओंका बाहुल्य होगा, तदनुकूल ही काम भी होगा । परंतु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय भी यथा- समय होता है। यह सब बिना सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके नहीं हो सकता । स्वभाव यदि असत् है, तो उसमें कार्यकारणक्षमता नहीं हो सकती । यदि सत् है तो भी चेतन है या अचेतन । यदि चेतन है तो नामान्तरसे ईश्वर ही हुआ । यदि अचेतन है तो उसमें भी विलक्षण कार्यकारिता नहीं हो सकती । अचेतन वस्तु स्वतः कोई कार्य नहीं कर सकती । यदि चेतनके सहारे कोई कार्य कर सके तो भी एक ही प्रकारका कार्य कर सकेगी । चेतनमें ही यह स्वतन्त्रता होती है कि वह कार्य करे, न करे, अन्यथा करे । कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं जो समर्थ होता है वही कर्ता होता है। घड़ीकी सूई स्वयं नहीं चल सकती । जब चेतन घड़ीसाजके प्रयत्नसे सूई चलती है तो वैसे ही चलती रहती है। सूईयोंको यदि पीछे चलाना होता है तो फिर किसी मनुष्यकी अपेक्षा पड़ती है। घड़ी या सूई स्वयं आगे-पीछे चलने, न चलने, बंद होने और फिर चल पड़नेमे स्वतन्त्र नहीं। संसारमें भिन्न-भिन्न स्वभावकी भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं। परंतु वे सब अपने-आप स्वभावतः भिन्न
पदार्थोंका निर्माण नहीं करते । अग्नि, लकड़ी, पानी, चीनी, आटा, घी, मिर्च आदि भिन्न-भिन्न पदार्थ भिन्न स्वभावके हैं। सब मिलकर स्वयं पक्वान्न नहीं बन सकते । वहाँ किसी चेतनकी अपेक्षा होती है । उसी तरह बिना किसी सर्वज्ञ चेतनके नारंगी, संतरे तथा आम्रका फल, गुलाबका मनोरम पुष्प अवश्य पञ्च- भूतोंका ही परिणाम है । फिर भी अपने आप पृथ्वी, जल, तेज मिलकर रूठे पुष्प या फलके रूपमें स्वयं परिणत हो जाते हों, यह न देखा ही जाता है न सम्भव ही है। किंतु कोई कार्य प्राणियोंद्वारा सम्पन्न होते हैं तो कोई सर्वज्ञ चेतन ईश्वरके द्वारा । विज्ञानके अनुसार 'स्वाभाविक शक्तियोंके द्वारा प्रपञ्च-निर्माणका आरम्भ या द्रव द्रव्यका गाढ़ा होकर पृथ्वी बनना आदि बिना किसी चेतनकी इच्छा और कृतिके सम्भव नहीं हो सकता ।' मान लिया, अग्नि और जल इंजिनमे पहुँचकर अद्भुत काम करने लगते हैं, परंतु इंजिन बनाकर उनमें डालकर भापद्वारा विभिन्न कार्य करनेका प्रबन्ध बिना चेतनके सम्पन्न नहीं होता । डार्विन, हक्सले, हेकल, लैमार्क आदिके विकाससम्बन्धी विचारपर इसकी पहले पर्याप्त समालोचना हो चुकी है । आल्फ्रेड रसेलवालेस वैज्ञानिक डार्विनका एक मुख्य सहयोगी था । डार्विनके पश्चात् भी वह विकासवादका ही पोषक रहा । उसने अपने अर्ध शताब्दीके अन्वेषणके पश्चात् 'दि वर्ल्ड आफ लाइफ' पुस्तककी भूमिकामें लिखा है कि मैने उन मौलिक नियमोंकी सरल तथा गम्भीर परीक्षा की है, जिनको डार्विनने अपने अधिकारके बाहर समझकर जान बूझकर अपने ग्रन्थोंमें नहीं लिखा । जीवन क्या है, उसके कौन-कौन कारण हैं और विशेषकर जीवनमे वृद्धि और सतानोत्पत्तकी जो विचित्र शक्तियाँ हैं, उनका क्या कारण है ? मै यह परिणाम निकालता हूँ कि इन पक्षियों, कीडोंके रंग आदिसे पहले तो एक उत्पादक शक्तिका परिचय होता है, जिसने प्रकृतिको इस प्रकार बनाया कि जिससे आश्चर्यजनक घटनाएँ सम्भव होती हैं। दूसरे एक संचालक बुद्धि भी मालूम पड़ती है जो वृद्धिकी प्रत्येक अवस्थामें आवश्यक होती है । विकासवादी ग्रन्थोंसे भिन्न भिन्न पौधो और कीट पतंग आदिके शरीरोंकी बनावट उनके स्वभाव, उनकी रीतियो की जानकारी होती है । डार्विनके पुत्र प्रोफेसर जार्ज डार्विनने १६ अगस्त सन् १९०५ मे कहा था कि जीवनका रहस्य अब भी उतना ही निगूढ है जितना कि पहले था । प्रो० पैट्रिक गेडीसने कहा है कि हम नहीं जानते कि मनुष्य कहाँसे आया, कैसे आया ? यह मान लेना चाहिये कि मनुष्य-विकासके प्रमाण संदिग्ध है, साइंसमें उनके लिये कोई स्थान नहीं है। ९ जून १९०५ में विकासवादियोंके वाद विवादके सम्बन्धमे 'टाइम्स'ने लिखा था कि 'ऐसी गड़बड़ पहले कभी नहीं देखी गयी ।' तमाशा यह कि लोग अपनेको विज्ञानका प्रतिनिधि बताते हैं । यद्यपि कुछ