मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे वृक्षका उगना, सूर्यका निकलना, भूकम्पका आना आदि। यह सभी क्रियाएँ है, इनका भी कोई कर्ता होना आवश्यक है। नास्तिक मेजका बनाने- वाला बढ़ई तो अवश्य मानता है, परंतु वृक्षो, पहाड़ोंको बनानेवाला कर्ता आवश्यक नही मानता। लोटेका बनानेवाला ठठेरा जरूरी है परतु नदी, समुद्रके लिये कर्ता आवश्यक नहीं। ससारकी सभी क्रियाएँ दो ही प्रकारकी है। एक प्राणिकृत, दूसरी अप्राणिकृत। सिद्धकोटिकी वस्तुएँ दृष्टान्तकोटिमे आती है, साध्यकोटिकी नहीं। दृष्टान्त वही होता है, जो दोनो पक्षोको मान्य होता है। सूर्य, चन्द्र, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि सावयव होनेसे कार्य हैं। आस्तिक कह सकता है कि जैसे मेज आदि कर्तासे निर्मित होते हैं, वैसे ही कार्य होनेसे सूर्य आदि भी किसी (ईश्वर) कर्तासे निर्मित हैं। यहाँ मेजका दृष्टान्त आस्तिक-नास्तिक दोनोको ही मान्य है। नास्तिक कहता है कि चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके कर्ता आवश्यक नहीं हैं, जैसे नदी बहनेके लिये कोई कर्ता आवश्यक नहीं होता। परतु नास्तिकका दृष्टान्त सिद्धकोटिमे नहीं है; किंतु साध्यकोटिमें है। आस्तिकके लिये नदीका बहना, सूर्यका निकलना — दोनों ही एक कोटिमें हैं। जैसे सूर्य, चन्द्र आदिका उगना ईश्वरप्रेरणापूर्वक होता है, उसी तरह नदीका बहना भी ईश्वरकृत ही है। चार्वाकमतानुयायी कहते हैं कि 'अविनाभावसम्बन्ध दुर्ज्ञेय होता है' अतः अनुमानादि प्रमाण मान्य नहीं हैं। धूमादि ज्ञानके अनन्तर जो अग्न्यादिमें प्रवृत्ति होती है, वह प्रत्यक्षमूलक है अथवा भ्रान्तिसे ही समझनी चाहिये। क्योंकि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है—यह जानना दुष्कर है, क्योकि सर्वदेश, सर्वकालके धूम-वह्निका जिसे ज्ञान हो, वही ऐसी बात कह सकता है। परतु किसी भी मनुष्यको सर्वदेश- कालके धूम और वह्निका ज्ञान होता ही नही। फिर वह कैसे कह सकता है कि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ वह्नि होता है। कतिपय स्थलमें तो यह देखा गया है कि जहाँ-जहाँ वह्नि है, वहाँ-वहाँ धूम होता है, पर अग्नितप्त लौहपिण्डमें व्यभिचार दीखनेसे व्यभिचार निश्चित हो जाता है।' परतु चार्वाकका यह कहना भी तभी सम्भव होता है जब कि अनुमानादि प्रमाण मान्य हो, क्योंकि प्रत्यक्षसे भिन्न अनुमानादि प्रमाण नहीं हैं, यह कहना भी अज्ञ, संदिग्ध, विपर्यस्त तथा जिज्ञासुके प्रति ही उचित है। जिस किसीके प्रति वचन प्रयोगको पागलपनका ही परिणाम समझा जाता है। दूसरोंका अज्ञान, संशय, भ्रान्ति या जिज्ञासा दूसरेको प्रत्यक्ष प्रमाणसे कभी भी विदित नहीं हो सकती। अतः उनके वचनों, मुखाकृति या व्यवहारसे अन्यके संशय अज्ञान आदिका अनुमानादिसे बोध होता है तथा अज्ञान-संशयादि मिटानेके लिये वचनप्रयोग सार्थक होता है। चार्वाक अङ्गनालिङ्गनजन्य सुखको पुरुषार्थ कहता है। इससे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सुख और स्त्रीगमनका अविनाभाव सम्बन्ध है। यदि स्त्रीगमन