भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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८१० मार्क्सवाद और रामराज्य

और सुखका अविनाभाव सम्बन्ध न हो तो उस सुखको पुरुषार्थ कैसे कहा जा सकता है ? इसी प्रकार क्षुधा-निवृत्तिके लिये नियमतः भोजनमें प्रवृत्ति भी सिद्ध करती है कि प्राणी अनुमान-प्रमाण मानकर ही क्षुधा-निवृत्तिके लिये भोजन- निर्माणमें संलग्न होता है । उसी प्रकार कृषि, व्यापार आदि सभी कार्योंमें आनु- मानिक कार्यकारणभावका निश्चय करके ही प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है । बिना अनुमान-प्रमाण अङ्गीकार किये आस्तिक, नास्तिक, चार्वाक ही क्या—पशुतककी भी कोई प्रवृत्ति नहीं हो सकती । पूर्वकी प्रवृत्तियोंसे लाभ देखकर तादृश प्रवृत्तियोंसे लाभका अनुमान करके ही प्राणी प्रवृत्त होता है । अनुमान बिना माने प्रत्यक्ष भी व्यर्थ हो जाता है । अनुमानके आधारपर अप्राणिकृत कार्योंका भी कोई कर्ता अवश्य सिद्ध होता है । कारण, सिद्धकोटिके जितने भी दृष्टान्त हैं, सभी कर्तापूर्वक ही हैं । अतः जैसे प्राणिकृत क्रिया कर्तासे होती है, वैसे ही अप्राणिकृत क्रिया भी कर्तासे ही सिद्ध होती है । प्राणिकृत, अप्राणिकृत क्रियासे भिन्न कोई क्रिया है ही नहीं । यदि बिना घड़ीसाजके घड़ी नहीं बन सकती, बिना बढ़ईके मेज नहीं बन सकती तो यह भी मानना ही चाहिये कि बिना चेतनसत्ताके चन्द्र, सूर्य, पहाड़, नदियाँ आदि भी नहीं बन सकतीं । कई लोग 'क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्'--पृथ्वी, वृक्ष आदि सकर्तृक हैं, कार्य होनेसे घटादिके तुल्य—इस अनुमानमें शरीरजन्यत्वरूप उपाधि दोष बतलाते हैं । अर्थात् जहाँ-जहाँ शरीरजन्यता होती है, वहाँ-वहाँ सकर्तृकता होती है । घटादि शरीरजन्य हैं, अतः सकर्तृक हैं; परंतु कार्यत्व तो पृथ्वी-अङ्कुरादिमें भी होता है, पर वहाँ शरीरजन्यता नहीं है । साध्य-व्यापक, साधनाव्यापक धर्म- को ही उपाधि कहा जाता है । इस तरह उनके मतानुसार कार्यत्वहेतु सोपाधिक होनेसे साध्यसिद्धिमें समर्थ नहीं होगा । परंतु यह ठीक नहीं है; क्योकि उपाधिके द्वारा या तो व्याप्ति-व्यभिचारका अनुमान होता है या पक्षमें उपाध्यभावसे साध्याभावका अनुमान होता है । तभी प्रकृत अनुमान दूषित समझा जाता है । इस तरह यहाँपर शरीराजन्यत्वरूप उपाध्यभावसे सकर्तृकत्वाभावका अनुमान करना पड़ेगा । परंतु उसमें शरीर विशेषण व्यर्थ होगा । जब अजन्यत्वमात्रसे सकर्तृकत्वाभाव सिद्ध होता है तो शरीर विशेषण व्यर्थ ही है । पृथ्वी, वृक्ष आदिमें शरीराजन्यता होनेपर भी अजन्यता नहीं है । अतः अजन्यता न होनेसे सकर्तृकत्वा- भाव नहीं सिद्ध हो सकता । सुतरां कार्यत्वरूप हेतुसे पृथ्वी-वृक्षादिमें सकर्तृकत्व- सिद्धि निर्वाध है । कई लोग पौर्वापर्यको ही कार्य-कारणभावके स्थानपर बिठलाते हैं । उनके अनुसार सदा पूर्वमें रहनेवाला कारण और सदा पश्चात् होनेवाला कार्य है; परंतु यह ठीक नहीं; क्योकि अन्धकार सदा सूर्योदयके पूर्व होता है, तो भी अन्धकार सूर्योदयका