मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकारण नहीं माना जाता, रविवारसे पूर्व सदा शनिवार रहता है, फिर भी वह रविवारका कारण नहीं होता । कार्य कारणसे पीछे होता है, इतना ही नहीं, किंतु कारणके द्वारा होता है । तर्कसंग्रहकारकी दृष्टिसे उपादानगोचरापरोक्ष ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिवाला चेतन ही कर्ता होता है, जैसे घटका निमित्तकारण कुलाल है, वही घटका कर्ता है । उसे घटके उपादानकारण मृत्तिकाका अपरोक्षनिकटतम ज्ञान है, उसकी चिकीर्षा है, घटनिर्माणकी इच्छा है और उसमे घट बनानेका प्रयत्न है । बिना ज्ञानके इच्छा और बिना इच्छाके कृति नहीं हो सकती । इस तरह 'जानाति इच्छति अथ करोति' किसी चीजको प्राणी पहले जानता है, फिर इच्छा करता है और फिर तद्विषयक प्रयत्न करता है । इस तरह ज्ञान, इच्छा और कृति जहाँ होती है, वही कर्ता होता है । अतः भले ही घटसे मिट्टी गिरती हो फिर भी वह मिट्टी गिरनेका कारण नहीं समझा जाता । प्रत्येक कार्यको कर्ताकी अपेक्षा होती है, ये नियम सभीके मस्तिष्कपर शासन करते हैं । अतः जहाँ किसी कार्यमें प्रत्यक्ष ज्ञान एवं इच्छाका सम्बन्ध नहीं दिखायी पड़ता वहाँ प्राणी अदृष्ट इच्छाशक्तिकी कल्पना करता है । किसी पुल या किलाको देखकर प्राणी यह अवश्य सोचता है कि किसीने अपनी ज्ञानेच्छा तथा कृतिसे इसे बनाया है । इसी तरह एक प्रफुल्लित कमलको भी देखकर बुद्धिमान् अवश्य सोचता है कि यह इतनी सुन्दर वस्तु बिना किसीकी इच्छा-कृतिके कैसे सम्पन्न हो सकती है ? बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता, इस दृष्टिका सृष्टिसे भी कारण होना अनिवार्य है । अतः सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ज्ञानेच्छा-कृतिसे ही सृष्टिकी रचना उचित है । कई लोग सृष्टिको आकस्मिक कहते हैं, परंतु वस्तुतः बिना हेतुके कोई भी घटना कभी हो ही नहीं सकती । यदि विभिन्न शक्तियोंद्वारा होनेवाले कार्योंके आकस्मिक सम्बन्धमात्रको आकस्मिक कहा जाय, जैसा कि काकतालीयन्याय कहलाता है ( काकका वृक्षपर बैठना-काकके प्रयत्नका फल है, तालफलका पतन अपने कारणोंसे सम्पन्न हुआ, परंतु दोनोंका मेल आकस्मिक हो गया ) तो इस पक्षमें निर्हेतुक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता, भले सृष्टिकी विभिन्न घटनाओका मेल कभी आकस्मिक भी हो तो भी सृष्टिका कोई कार्य निर्हेतुक नहीं सिद्ध होता । वस्तुतस्तु मनसे भी अचिन्त्य रचनारूप संसारका निर्माण सर्वज्ञ सर्व- शक्तिमान् चेतन कर्ताके बिना उपपन्न नहीं हो सकता और उस सर्वज्ञका कोई भी कार्य असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता । कुछ लोग स्वयम्भू प्रकृति या उसके परमाणुओंमे ही विश्वका निर्माण मानते हैं, किंतु सर्वज्ञ ईश्वरकी शक्ति, इच्छा एवं कृतिके बिना प्रकृति या परमाणुसे ससारका निर्माण कैसे हो सकता है ? बिना बुद्धि- प्रबन्धके परमाणु अपने-आप इतने विलक्षण ससारको बना सकते हैं, इससे बढ़कर युक्तिशून्य कोई बात हो नहीं सकती । किसी नास्तिक पितासे जब आस्तिक पुत्रने