मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकहा कि जो ससारको बनानेवाला है, वही परमेश्वर है । तो पिताने कहा कि परमाणुओके अपने आप ही एकत्रित हो जानेसे संसार बन जाता है । इसके लिये कोई सर्वज्ञ ईश्वर क्यो माना जाय ? दूसरे दिन पुत्रने बहुत सुन्दर हस्ती, अश्व, शुक, पिक, मयूरोके चित्र बनाकर उसके सामने कुछ विभिन्न रङ्गकी पेन्सिले रख दी । जब पिताने चित्रोका निर्माता पूछा तो पुत्रने कहा कि इन्हीं पेन्सिलोके परमाणु उड-उडकर कागजपर एकत्रित हो गये, उन्हींसे ये चित्र बन गये । पर पिताने इसे स्वीकार नही किया । तब पितासे पुत्रने कहा कि यदि परमाणुओके उड़- उड़कर एकत्रित हो जानेपर ऐसे चित्र भीनही बन सकते तो चन्द्रमण्डल और सूर्य- मण्डल, भूधर, सागर, मनुष्य, पशु आदि विलक्षण वस्तुएँ बुद्धिके सहयोग बिना केवल परमाणुओसे कैसे बन सकती है ? अतएव ऐसे-ऐसे अनुमान ईश्वर-सिद्धिमें उपस्थित किये जा सकते हैं । ( १ ) ससारका व्यवस्थित रूप देखकर अनुमान किया जा सकता है कि जगत्की व्यवस्था प्रशास्तृपूर्विका है, व्यवस्था होनेके कारण, राज्य-व्यवस्थाके समान । ( २ ) लोकोपकारी सूर्य-चन्द्रादिका निर्माण किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा ही हो सकता है । यद्यपि आजकल लोग सूर्य-चन्द्रादिको ईश्वरनिर्मित न मानकर स्वतःसिद्ध या प्रकृतिनिर्मित मानते हैं; परंतु यह असङ्गत है, क्योंकि दीपकादि बुद्धिमान् चेतनद्वारा ही बनाये जाते हैं। यह दृष्टान्त वादी-प्रतिवादी उभय- सम्मत है, परतु कोई वस्तु स्वतःसिद्ध है—इसमें उभय-सम्मत कोई दृष्टान्त नही है, क्योकि ईश्वरवादी सभी पदार्थोंको ईश्वरकर्तृक मानता है । प्रकृति भी जड होनेसे स्वतन्त्रकर्त्री नही हो सकती । अतः सूर्य, चन्द्र किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा निर्मित हैं, प्रकाश होनेके कारण, प्रदीपके समान । जैसे व्यवहारके लिये दीपक होता है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादि भी व्यवहारोपयोगी हैं । ( ३ ) सूर्य-चन्द्रकी विशिष्ट चेष्टा देखकर भी इसी तरह उनके नियन्ताका अनुमान होता है—'सूर्य-चन्द्र नियन्तृपूर्वक हैं, विशिष्ट चेष्टावाले होनेके कारण, भृत्यादिके समान । जैसे भृत्यकी नियमित प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादिकी भी नियमित प्रवृत्ति होती है ।' उपर्युक्त अनुमानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरसे नियन्त्रित होनेके कारण ही सूर्य-चन्द्र स्वयं ईश्वर और स्वतन्त्र होते हुए भी उदयास्तमय एव वृद्धि-क्षयसे युक्त होकर प्रकाशादिकार्यमें संलग्न रहते है । ( ४ ) पृथिवीके विधारकके रूपमें भी प्रयत्नवान् ईश्वरकी सिद्धि होती है । विवादास्पद पृथिवी प्रयत्नवान्के द्वारा विधृत है, सावयव, गुरु, संयुक्त होनेपर भी अस्फुटित, अपतित, अवियुक्त होनेके कारण, हस्तन्यस्त पाषाणादिके समान ।