भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 571, कुल 866 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 571

कहा कि जो ससारको बनानेवाला है, वही परमेश्वर है । तो पिताने कहा कि परमाणुओके अपने आप ही एकत्रित हो जानेसे संसार बन जाता है । इसके लिये कोई सर्वज्ञ ईश्वर क्यो माना जाय ? दूसरे दिन पुत्रने बहुत सुन्दर हस्ती, अश्व, शुक, पिक, मयूरोके चित्र बनाकर उसके सामने कुछ विभिन्न रङ्गकी पेन्सिले रख दी । जब पिताने चित्रोका निर्माता पूछा तो पुत्रने कहा कि इन्हीं पेन्सिलोके परमाणु उड-उडकर कागजपर एकत्रित हो गये, उन्हींसे ये चित्र बन गये । पर पिताने इसे स्वीकार नही किया । तब पितासे पुत्रने कहा कि यदि परमाणुओके उड़- उड़कर एकत्रित हो जानेपर ऐसे चित्र भीनही बन सकते तो चन्द्रमण्डल और सूर्य- मण्डल, भूधर, सागर, मनुष्य, पशु आदि विलक्षण वस्तुएँ बुद्धिके सहयोग बिना केवल परमाणुओसे कैसे बन सकती है ? अतएव ऐसे-ऐसे अनुमान ईश्वर-सिद्धिमें उपस्थित किये जा सकते हैं । ( १ ) ससारका व्यवस्थित रूप देखकर अनुमान किया जा सकता है कि जगत्की व्यवस्था प्रशास्तृपूर्विका है, व्यवस्था होनेके कारण, राज्य-व्यवस्थाके समान । ( २ ) लोकोपकारी सूर्य-चन्द्रादिका निर्माण किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा ही हो सकता है । यद्यपि आजकल लोग सूर्य-चन्द्रादिको ईश्वरनिर्मित न मानकर स्वतःसिद्ध या प्रकृतिनिर्मित मानते हैं; परंतु यह असङ्गत है, क्योंकि दीपकादि बुद्धिमान् चेतनद्वारा ही बनाये जाते हैं। यह दृष्टान्त वादी-प्रतिवादी उभय- सम्मत है, परतु कोई वस्तु स्वतःसिद्ध है—इसमें उभय-सम्मत कोई दृष्टान्त नही है, क्योकि ईश्वरवादी सभी पदार्थोंको ईश्वरकर्तृक मानता है । प्रकृति भी जड होनेसे स्वतन्त्रकर्त्री नही हो सकती । अतः सूर्य, चन्द्र किसी विशिष्ट विज्ञानवान्के द्वारा निर्मित हैं, प्रकाश होनेके कारण, प्रदीपके समान । जैसे व्यवहारके लिये दीपक होता है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादि भी व्यवहारोपयोगी हैं । ( ३ ) सूर्य-चन्द्रकी विशिष्ट चेष्टा देखकर भी इसी तरह उनके नियन्ताका अनुमान होता है—'सूर्य-चन्द्र नियन्तृपूर्वक हैं, विशिष्ट चेष्टावाले होनेके कारण, भृत्यादिके समान । जैसे भृत्यकी नियमित प्रवृत्ति होती है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादिकी भी नियमित प्रवृत्ति होती है ।' उपर्युक्त अनुमानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरसे नियन्त्रित होनेके कारण ही सूर्य-चन्द्र स्वयं ईश्वर और स्वतन्त्र होते हुए भी उदयास्तमय एव वृद्धि-क्षयसे युक्त होकर प्रकाशादिकार्यमें संलग्न रहते है । ( ४ ) पृथिवीके विधारकके रूपमें भी प्रयत्नवान् ईश्वरकी सिद्धि होती है । विवादास्पद पृथिवी प्रयत्नवान्के द्वारा विधृत है, सावयव, गुरु, संयुक्त होनेपर भी अस्फुटित, अपतित, अवियुक्त होनेके कारण, हस्तन्यस्त पाषाणादिके समान ।