मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और ईश्वर ८६३ यदि किसी चेतनमे धारण न हो तो उसमें पतन स्फुटन होना अनिवार्य होता, बिना किसी धारकके कोई भी गुरु पदार्थ टिक नहीं सकता। परस्परकर्षणसे भी स्थिति असम्भव है, क्योंकि स्थिति और गति अन्योन्याश्रित नहीं होतीं। कहा जाता है, मानवी मस्तिष्ककी सहायता बिना भी यदि कोई अंग्रेजी भाषाके अक्षरोंको उछालता रहे तो कभी शेक्सपीयरका नाटक निर्मित हो सकता है। यदि थोड़ी देरके लिये यह मान भी लिया जाय तो भी संसारके विलक्षण प्रपञ्चका विधान बिना सर्वज्ञ बुद्धिके नहीं हो सकता। भले ही किन्हीं अक्षरोंको अनन्त बार उछालो, परंतु उनके द्वारा विचार व्यक्त हो सकना असम्भव ही है। विचार व्यक्त करनेकी बात तो दूर रही, सही-सही एक पंक्तिका भी निर्माण असम्भव है। फिर अक्षरोंको उछालनेवाला भी कोई चेतन ही होता है। फिर बिना चेतनके जड़-परमाणुओंसे विश्वका निर्माण कहाँतक सम्भव है? फिर क्या आजतक कोई अक्षरोंको उछाल-उछालकर किसी छोटे-से ग्रन्थका भी निर्माण कर सका? संसारमें रोटी बनानेसे लेकर मकान, पुल, दुर्ग आदिका निर्माण बिना बुद्धिके अपने-आप ही ईंट, चूना, पत्थर, लोहा-लकड़ आदि कर लेते हों, यह नहीं देखा जाता। फिर अकस्मात् ही परमाणुओंके द्वारा संसारका निर्माण और अकस्मात् ही परमाणुओंका निष्क्रिय हो जाना या संसारका नष्ट हो जाना आदि कैसे संगत होगा? फिर यदि परमाणुके बिना सर्वज्ञ चेतनके प्रयत्नसे अपने-आप ही सूर्य, समुद्र, नदी, पर्वत बन सकते हैं, तब अन्य उपयोगके दुर्ग, पुल, गृहादिका निर्माण भी उसी तरह क्यों नहीं होता? तदर्थ मनुष्योंको प्रयत्न क्यों करना पड़ता है? यदि पहाड़ अकस्मात् बन सकता है; तब कोई पुल या किला अपने-आप क्यों नहीं बन सकता? स्वभाववादी स्वभावसे ही सृष्टिका निर्माण मानता है, परंतु स्वभाव यदि शक्तिशाली कोई चेतन है तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ। यदि सृष्टि नियमसे ही संसार- का निर्माण माना जाय तो वह भी ठीक नहीं, क्योंकि नियमके निर्माता प्रयोक्ता बिना नियम अकिञ्चित्कर ही होता है। भूगर्भतत्त्ववेत्ता पुरानी वस्तुओंको देख- कर बुद्धिमानोंकी कारीगरीका अनुमान करते हैं। महेन्जोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईमें मिलनेवाली वस्तुओंके आधारपर सभ्यताकी कल्पना की जाती है। यदि सब वस्तुएँ स्वभावसे ही बनती हैं, तब उन कल्पनाओंका कोई स्थान ही नहीं रह जाता। वस्तुतः किसी प्रकारके नियम ही सिद्ध करते हैं कि कोई समझदार पूर्वा- परदर्शी बुद्धिमान् ही नियम बनाता है और वही नियामक भी है। नियामक बिना नियमोंका कुछ मूल्य भी नहीं होता। अतः नियमोंके रहते हुए भी ज्ञानयुक्त उपयुक्त चुनावसे ही सुप्रबन्ध होता है। मिट्टी जलादिसे घट बननेका नियम है सही पर जबतक कोई कुम्भकार नियमोंके अनुसार कार्य नहीं करेगा तबतक घट-निर्माण