भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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८३४ मार्क्सवाद और रामराज्य

असम्भव ही है । धरणि, अनिल, जलके संयोगसे बीजोंके अङ्कुरित होनेका नियम है तथापि जबतक किसान उन नियमोंका प्रयोग करके काम नहीं करेगा तबतक गेहूँ-यवादिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती । पृथिवीकी आकर्षणशक्ति भले ही प्रत्येक परमाणुपर शासन करती रहे तथापि सहयोग एवं सुदृढताके साथ प्रबन्ध बिना उसका कोई भी सदुपयोग नहीं हो सकता । आस्तिकोंका कहना है कि जिसने हंसके अङ्गमें शुक्लरंगका निर्माण किया, शुकके अङ्गका हरा रंग बनाया, मयूरोंको चित्रित किया और फूलोंपर बैठनेवाली तितलियो- को चमकीली साड़ी बनाकर पहनाया—वही ईश्वर है। वही सबको वृत्ति देता है— येन शुक्लीकृता हंसाः शुकाश्च हरितीकृताः । मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति ॥ ( हितोपदेश १ । १७९ ) परन्तु स्वभाववादियोका कहना है कि— शिखिनश्चित्रयेत्को वा कोकिलान् कः प्रकूजयेत् । स्वभावव्यतिरेकेण विद्यते नात्र कारणम् ॥ ( चार्वाकदर्शन ) 'मयूरोंको कौन चित्रित करता है ? कोकिलोको कौन मधुरालाप सिखाता हे ? जैसे अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता, वायुमें वहनशीलता स्वभावसे ही होती है, उसी तरह स्वभावसे ही शुक, हंसादिके रंग तथा मयूरादिका चित्रण होता है।' परंतु यह कहना ठीक नहीं कि यदि परमाणुओंका स्वभाव सृष्टिरचना है, तब कभी सृष्टि-विघटन नहीं होना चाहिये । यदि कहा जाय कि किन्हींका स्वभाव मिलनेका है, किन्हींका विघटनका है, तो भी जैसे परमाणुओंका बाहुल्य होगा, तदनुकूल ही काम भी होगा । परंतु जगत्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय भी यथा- समय होता है। यह सब बिना सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके नहीं हो सकता । स्वभाव यदि असत् है, तो उसमें कार्यकारणक्षमता नहीं हो सकती । यदि सत् है तो भी चेतन है या अचेतन । यदि चेतन है तो नामान्तरसे ईश्वर ही हुआ । यदि अचेतन है तो उसमें भी विलक्षण कार्यकारिता नहीं हो सकती । अचेतन वस्तु स्वतः कोई कार्य नहीं कर सकती । यदि चेतनके सहारे कोई कार्य कर सके तो भी एक ही प्रकारका कार्य कर सकेगी । चेतनमें ही यह स्वतन्त्रता होती है कि वह कार्य करे, न करे, अन्यथा करे । कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं जो समर्थ होता है वही कर्ता होता है। घड़ीकी सूई स्वयं नहीं चल सकती । जब चेतन घड़ीसाजके प्रयत्नसे सूई चलती है तो वैसे ही चलती रहती है। सूईयोंको यदि पीछे चलाना होता है तो फिर किसी मनुष्यकी अपेक्षा पड़ती है। घड़ी या सूई स्वयं आगे-पीछे चलने, न चलने, बंद होने और फिर चल पड़नेमे स्वतन्त्र नहीं। संसारमें भिन्न-भिन्न स्वभावकी भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं। परंतु वे सब अपने-आप स्वभावतः भिन्न