भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पदार्थोंका निर्माण नहीं करते । अग्नि, लकड़ी, पानी, चीनी, आटा, घी, मिर्च आदि भिन्न-भिन्न पदार्थ भिन्न स्वभावके हैं। सब मिलकर स्वयं पक्वान्न नहीं बन सकते । वहाँ किसी चेतनकी अपेक्षा होती है । उसी तरह बिना किसी सर्वज्ञ चेतनके नारंगी, संतरे तथा आम्रका फल, गुलाबका मनोरम पुष्प अवश्य पञ्च- भूतोंका ही परिणाम है । फिर भी अपने आप पृथ्वी, जल, तेज मिलकर रूठे पुष्प या फलके रूपमें स्वयं परिणत हो जाते हों, यह न देखा ही जाता है न सम्भव ही है। किंतु कोई कार्य प्राणियोंद्वारा सम्पन्न होते हैं तो कोई सर्वज्ञ चेतन ईश्वरके द्वारा । विज्ञानके अनुसार 'स्वाभाविक शक्तियोंके द्वारा प्रपञ्च-निर्माणका आरम्भ या द्रव द्रव्यका गाढ़ा होकर पृथ्वी बनना आदि बिना किसी चेतनकी इच्छा और कृतिके सम्भव नहीं हो सकता ।' मान लिया, अग्नि और जल इंजिनमे पहुँचकर अद्भुत काम करने लगते हैं, परंतु इंजिन बनाकर उनमें डालकर भापद्वारा विभिन्न कार्य करनेका प्रबन्ध बिना चेतनके सम्पन्न नहीं होता । डार्विन, हक्सले, हेकल, लैमार्क आदिके विकाससम्बन्धी विचारपर इसकी पहले पर्याप्त समालोचना हो चुकी है । आल्फ्रेड रसेलवालेस वैज्ञानिक डार्विनका एक मुख्य सहयोगी था । डार्विनके पश्चात् भी वह विकासवादका ही पोषक रहा । उसने अपने अर्ध शताब्दीके अन्वेषणके पश्चात् 'दि वर्ल्ड आफ लाइफ' पुस्तककी भूमिकामें लिखा है कि मैने उन मौलिक नियमोंकी सरल तथा गम्भीर परीक्षा की है, जिनको डार्विनने अपने अधिकारके बाहर समझकर जान बूझकर अपने ग्रन्थोंमें नहीं लिखा । जीवन क्या है, उसके कौन-कौन कारण हैं और विशेषकर जीवनमे वृद्धि और सतानोत्पत्तकी जो विचित्र शक्तियाँ हैं, उनका क्या कारण है ? मै यह परिणाम निकालता हूँ कि इन पक्षियों, कीडोंके रंग आदिसे पहले तो एक उत्पादक शक्तिका परिचय होता है, जिसने प्रकृतिको इस प्रकार बनाया कि जिससे आश्चर्यजनक घटनाएँ सम्भव होती हैं। दूसरे एक संचालक बुद्धि भी मालूम पड़ती है जो वृद्धिकी प्रत्येक अवस्थामें आवश्यक होती है । विकासवादी ग्रन्थोंसे भिन्न भिन्न पौधो और कीट पतंग आदिके शरीरोंकी बनावट उनके स्वभाव, उनकी रीतियो की जानकारी होती है । डार्विनके पुत्र प्रोफेसर जार्ज डार्विनने १६ अगस्त सन् १९०५ मे कहा था कि जीवनका रहस्य अब भी उतना ही निगूढ है जितना कि पहले था । प्रो० पैट्रिक गेडीसने कहा है कि हम नहीं जानते कि मनुष्य कहाँसे आया, कैसे आया ? यह मान लेना चाहिये कि मनुष्य-विकासके प्रमाण संदिग्ध है, साइंसमें उनके लिये कोई स्थान नहीं है। ९ जून १९०५ में विकासवादियोंके वाद विवादके सम्बन्धमे 'टाइम्स'ने लिखा था कि 'ऐसी गड़बड़ पहले कभी नहीं देखी गयी ।' तमाशा यह कि लोग अपनेको विज्ञानका प्रतिनिधि बताते हैं । यद्यपि कुछ