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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पदार्थोंका निर्माण नहीं करते । अग्नि, लकड़ी, पानी, चीनी, आटा, घी, मिर्च आदि भिन्न-भिन्न पदार्थ भिन्न स्वभावके हैं। सब मिलकर स्वयं पक्वान्न नहीं बन सकते । वहाँ किसी चेतनकी अपेक्षा होती है । उसी तरह बिना किसी सर्वज्ञ चेतनके नारंगी, संतरे तथा आम्रका फल, गुलाबका मनोरम पुष्प अवश्य पञ्च- भूतोंका ही परिणाम है । फिर भी अपने आप पृथ्वी, जल, तेज मिलकर रूठे पुष्प या फलके रूपमें स्वयं परिणत हो जाते हों, यह न देखा ही जाता है न सम्भव ही है। किंतु कोई कार्य प्राणियोंद्वारा सम्पन्न होते हैं तो कोई सर्वज्ञ चेतन ईश्वरके द्वारा । विज्ञानके अनुसार 'स्वाभाविक शक्तियोंके द्वारा प्रपञ्च-निर्माणका आरम्भ या द्रव द्रव्यका गाढ़ा होकर पृथ्वी बनना आदि बिना किसी चेतनकी इच्छा और कृतिके सम्भव नहीं हो सकता ।' मान लिया, अग्नि और जल इंजिनमे पहुँचकर अद्भुत काम करने लगते हैं, परंतु इंजिन बनाकर उनमें डालकर भापद्वारा विभिन्न कार्य करनेका प्रबन्ध बिना चेतनके सम्पन्न नहीं होता । डार्विन, हक्सले, हेकल, लैमार्क आदिके विकाससम्बन्धी विचारपर इसकी पहले पर्याप्त समालोचना हो चुकी है । आल्फ्रेड रसेलवालेस वैज्ञानिक डार्विनका एक मुख्य सहयोगी था । डार्विनके पश्चात् भी वह विकासवादका ही पोषक रहा । उसने अपने अर्ध शताब्दीके अन्वेषणके पश्चात् 'दि वर्ल्ड आफ लाइफ' पुस्तककी भूमिकामें लिखा है कि मैने उन मौलिक नियमोंकी सरल तथा गम्भीर परीक्षा की है, जिनको डार्विनने अपने अधिकारके बाहर समझकर जान बूझकर अपने ग्रन्थोंमें नहीं लिखा । जीवन क्या है, उसके कौन-कौन कारण हैं और विशेषकर जीवनमे वृद्धि और सतानोत्पत्तकी जो विचित्र शक्तियाँ हैं, उनका क्या कारण है ? मै यह परिणाम निकालता हूँ कि इन पक्षियों, कीडोंके रंग आदिसे पहले तो एक उत्पादक शक्तिका परिचय होता है, जिसने प्रकृतिको इस प्रकार बनाया कि जिससे आश्चर्यजनक घटनाएँ सम्भव होती हैं। दूसरे एक संचालक बुद्धि भी मालूम पड़ती है जो वृद्धिकी प्रत्येक अवस्थामें आवश्यक होती है । विकासवादी ग्रन्थोंसे भिन्न भिन्न पौधो और कीट पतंग आदिके शरीरोंकी बनावट उनके स्वभाव, उनकी रीतियो की जानकारी होती है । डार्विनके पुत्र प्रोफेसर जार्ज डार्विनने १६ अगस्त सन् १९०५ मे कहा था कि जीवनका रहस्य अब भी उतना ही निगूढ है जितना कि पहले था । प्रो० पैट्रिक गेडीसने कहा है कि हम नहीं जानते कि मनुष्य कहाँसे आया, कैसे आया ? यह मान लेना चाहिये कि मनुष्य-विकासके प्रमाण संदिग्ध है, साइंसमें उनके लिये कोई स्थान नहीं है। ९ जून १९०५ में विकासवादियोंके वाद विवादके सम्बन्धमे 'टाइम्स'ने लिखा था कि 'ऐसी गड़बड़ पहले कभी नहीं देखी गयी ।' तमाशा यह कि लोग अपनेको विज्ञानका प्रतिनिधि बताते हैं । यद्यपि कुछ

कुछ भी शेष नहीं रहा । केवल युद्धक्षेत्रमें कुछ टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मनुष्यकी बन्दरसे उत्पत्तिके सम्बन्धमें सर जे० डब्लयू० डौसन कहते हैं—'बन्दर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका विज्ञानको कुछ पता नहीं है। मनुष्यकी प्राचीन तम अस्थियाँ भी मनुष्यकी सी हैं। इनसे उस विकासका कुछ भी पता नहीं लगता, जो मनुष्यशरीरके पहले हुआ है। प्रोफेसर औवेनका कहना है कि मनुष्य अपने प्रकारकी एकमात्र जाति है और अपनी जातिका एकमात्र प्रतिनिधि है। सिडनी कौलेटने अपनी पुस्तकमें लिखा है कि मनुष्य उन्नतिके बदले अवनतिकी ओर जा रहा है। सर जे० डब्लयू० डौसनने लिखा है कि 'मनुष्यकी आदिम अवस्था सबसे उच्च थी'। कुछ भी हो, साइंसके आधारपर एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वरकी सत्ताका अपलाप नहीं हो सकता । संसारमें अनेक प्रकारके नियम उपलब्ध होते हैं। उन्हींका अनुसरण करके प्राणी अपना-अपना काम चलाते हैं। नियमोंका निर्माता एवं पालक ईश्वर है। अन्य प्राणी नियमोंके अनुचर हैं। जो वस्तुएँ बिना विज्ञानके ही नियमपराधीन हैं। परंतु चेतन उन नियमोंको चुनकर उनके अनुसार काम करता है। जैसे खेतीका नियम पालन करनेसे गेहूँ, जौ पैदा किया जा सकता है। वायु- यान बनानेका नियम पालन करनेसे वायुयान बनाया जा सकता है; परंतु काष्ठादि नियमोंका चुनाव नहीं कर सकते । नियमोंका सञ्चालन करनेवाली शक्ति ईश्वर ही है, उसका प्रभाव सृष्टिमें व्यापक है। नैयायिक, वैशेषिक आदि ईश्वरको निमित्तकारण मानते हैं। परंतु नैयायिक आदि तो जीवात्माओंको भी व्यापक ही मानते हैं। आधुनिक कुछ लोग शङ्का करते हैं कि निमित्तकारण या कर्ता किसी कार्यमें व्यापक नहीं रहता । घड़ीसाज घड़ीमें व्यापक नहीं होता, मकान बनानेवाला मकानमें और कोट-पतलून बनाने- वाला दर्जी कोट-पतलूनमें भी व्यापक नहीं होता; फिर यदि परमात्मा संसारका निमित्तकारण है तो वह सम्पूर्ण कार्यमें कैसे व्यापक हो सकता है ? उसका आधु- निक ढङ्गके लोग समाधान करते हैं कि लौकिक क्रियाओंका कुलाल आदि निमित्त कारण अवश्य हैं, परंतु वह एक हदतक ही हैं, जैसे घड़ीसाजने घडी अवश्य बनाया, परंतु लोहेके परमाणुओंको जोड़कर रखना घड़ीसाजके हाथकी बात नहीं है। उसका निमित्तकारण ईश्वर ही होता है। संसारमें व्यापक अणु-अणु, परमाणु-परमाणु- की जो क्रियाएँ हैं, वे बहुत सूक्ष्म हैं। वे व्यापक ईश्वरके बिना उत्पन्न नहीं हो सकती । अतः ईश्वरको व्यापक मानना उचित ही है, परंतु वेदान्ती तो ईश्वरको ही अभिन्ननिमित्तोपादानकारण मानते हैं। सचमुच निमित्तकारणका कार्यमें व्यापक होना तर्कसङ्गत नहीं है। यदि निमित्तत्व व्यापकताका प्रयोजक हो तो कुलालादिमें भी व्यापकता होनी ही चाहिये, परंतु यह दृष्टविरुद्ध है। भले ही परमाणु, संयोग आदिमें कुलाल, घड़ीसाज आदि निमित्तकारण न हों फिर भी जिस कार्यमें जितने

अंशमें जो निमित्तकारण हो उतने अंशमें तो उसे उस कार्यमें व्यापक होना ही चाहिये। इसके अतिरिक्त निरवयव एवं व्यापकमें क्या हलचल रूप क्रिया सम्भव हो सकती है ? यदि नहीं तो व्यापक ईश्वर किस तरह क्रियावान् हो सकेगा ? इस दृष्टिसे वेदान्तीका ही मत श्रेष्ठ है। मायाशक्तिद्वारा ही सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर माया, परिणाम-संकल्पके द्वारा ही विश्वका निर्माता होता है। वही तमःप्रधाना प्रकृतिसे विशिष्ट होकर उपादान कारण भी है, अतः व्यापक है। यह भी कहा जाता है कि यदि ईश्वर व्यापक न होता तो उसे सम्राट् आदिके समान अन्य सत्ताओसे काम लेना पड़ता और जैसे सम्राट्का कर्मचारियोंके मस्तिष्कपर जब नियन्त्रण नहीं होता तो वे कभी गड़बड भी करते हैं, इसी तरह ईश्वरके कर्मचारी भी ईश्वरकी इच्छाके विरुद्ध कार्य कर सकते हैं; किंतु ऐसा होता नहीं, अतः ईश्वर व्यापक है। सबपर उसका नियन्त्रण है। सब कार्य उसकी इच्छाके अनुसार ही होते हैं। परंतु यह ठीक नहीं हैं, क्योंकि ईश्वरकी सत्तासे भिन्न जीवोंद्वारा अनेक कार्य होते हैं। भले ही ईश्वर सर्वान्तर्यामी हैं; फिर भी जीवोंको अपनी इच्छानुसार शुभाशुभ कर्म करनेकी स्वतन्त्रता है। तभी उन्हें अपने किये कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यदि जीव किसी अन्यके परवश होकर ही कर्म करते होते तो उन्हें उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता। व्यापकताका मूल उपादानत्व ही है निमित्तत्व नहीं। जैसे मकड़ी जालका उपादान और निमित्त दोनों ही ही कारण है, उसी तरह ईश्वर ही प्रपञ्च-सृष्टिका उपादान और निमित्त दोनो ही कारण है। कुछ लोग कहते हैं कि 'वह ईश्वर निराकार ही हो सकता है, साकार नहीं। उनके अनुसार 'जिसे आँखसे देख सकते हैं, हाथसे छू सकते हैं, वह साकार है, जो ऐसा नहीं वह निराकार है।' वे कहते हैं कि 'सृष्टिमें दोनों प्रकारकी वस्तुएँ होती हैं, 'द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तञ्चैवामूर्तञ्च'—सृष्टिके दो रूप हैं—एक साकार, दूसरा निरा- कार।' परंतु यह ठीक नहीं, क्योंकि उपर्युक्त श्रुति यही कहती है कि ब्रह्मके दो रूप हैं। एक मूर्त अर्थात् साकार और दूसरा अमूर्त अर्थात् निराकार। कहा जाता है कि 'यदि ईश्वर आकाशकी तरह निराकार है, तब तो वह व्यापक हो सकता है, किंतु यदि वह साकार (स्थूल) है तो सूक्ष्ममें कैसे व्यापक होगा ? सर्वव्यापक न होनेसे सर्वकारण भी नहीं हो सकेगा। फिर ईश्वर ही नहीं सिद्ध हो सकेगा। ईश्वर साकार होता तो अवश्य दीखता। ईश्वरकी अति सूक्ष्म सत्ता हो तभी उसका नियन्त्रण सूक्ष्म नियमोंपर हो सकता है।' परंतु यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसे जीव सूक्ष्म होते हुए भी आकार ग्रहणकर साकार हो जाता है, इसी तरह ईश्वर सूक्ष्म निराकार होते हुए भी मायासे दिव्य गुणसम्पन्न ज्योतिर्मय आकार बनाकर साकार हो सकता है। सूक्ष्मरूपसे सर्वकारण सर्वव्यापक होनेपर भी साकार मा० रा० १२—

८१८ मार्क्सवाद और रामराज्य भक्तिसे ईश्वर साकार भी होता है । उसीका हिरण्मय, ज्योतिर्मय आदि रूप उपनिषदोंमें वर्णित है। ईश्वरका ज्योतिर्मय आकार होनेपर भी वह आकार दिव्य है । अतः सामान्य चर्मचक्षुको उसका दर्शन भले ही न हो, परंतु उपासना और तपस्या- के द्वारा दिव्य दृष्टिसम्पन्न लोगोंको उसका दर्शन आज भी होता है और हो सकता है। विष्णु, शिव आदि उसीके रूप हैं। जो ईश्वर अनन्त ब्रह्माण्डका निर्माण कर सकता है, अनन्त निराकार एवं सूक्ष्मजीवोंको अनन्त देह देकर साकार बना देता है, वह क्या अपने लिये दिव्य देहका निर्माण नहीं कर सकता ? और साकार नहीं बन सकता ? वस्तुतः जैसे निराकार अग्नि भी साकार हो सकती है, जैसे स्पर्शादिविहीन आकाश ही स्पर्शादियुक्त तेज-जलादि रूपमें प्रकट हो सकता है, वैसे ही निराकार परमेश्वर आकार ग्रहणकर साकार हो सकता है । सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी मायाकृत साकारता होनेपर भी उसकी निरा- कारता, सूक्ष्मता, व्यापकता एवं सर्वकारणतामें कोई अन्तर नहीं आता । कहा जाता है, संसारमें जितनी साकार वस्तुएँ हैं, वे सब परमाणुओंके संयोगसे ही बनती हैं; किंतु यह बात केवल आरम्भवादमें ही है, परिणामवादके लिये यह आवश्यक नहीं । परिणामवादमें जैसे दुग्धका ही दधिभाव होता है, मृत्तिकाका घटभाव होता है, वैसे ही प्रकृतिका ही अन्यथाभाव परिणाम होता है । वहाँ तो यही कहा जा सकता है कि सूक्ष्म एवं व्यापक वस्तु ही स्थूल एवं व्याप्य भिन्न-भिन्न पदार्थोंके रूपमें परिणत होती है। विवर्तवादमें सूक्ष्मतम ब्रह्मका ही अतात्त्विक अन्यथाभावरूप विवर्त सम्पूर्ण प्रपञ्च है । किंतु किसी भी पक्षमें ईश्वरके साकार होनेमें कोई आपत्ति नहीं होती । सर्वसम्मतिसे-जीवात्मा व्यापक हो या अणु, पर है निराकार ही । साकार रूप धारण करनेसे वह राकार होता है। यही बात ज्यों-की-त्यों ईश्वरके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है । भेद इतना ही है कि जीव इन सब बातोंमें कर्मपरतन्त्र है, ईश्वर स्वतन्त्र है । साकार होनेका यह कदापि अर्थ नहीं कि कूटस्थ ईश्वर विकृत होकर अपनी निराकारता, सूक्ष्मता, व्यापकताको खोकर साकाररूपमें परिणत हो जाता है। इसीलिये भापका पर- माणु बादल बन जाय या बादलका परमाणु जल बन जाय इत्यादि दृष्टान्तोंके लिये यहाँ कोई स्थान नहीं है । संसारमें विभिन्न वस्तुएँ विभिन्न शक्तिवाली होती हैं । चींटी, सिंह, हाथी, विभिन्न प्राणी भिन्न-भिन्न शक्ति रखते हैं। जो सबपर नियन्त्रण रखता है तथा सर्वशक्तिवाला है, वही ईश्वर है । भिन्न कारणोंमें अपने-अपने कार्योंके उत्पादनानुकूल शक्तियाँ होती हैं । ईश्वर सर्वकारण है, अतः उसमें सर्व- कार्योत्पादनानुकूल शक्तियाँ हैं; इसीलिये वह सर्वशक्तिमान् है । बहुत लोग कुतर्क करते हैं कि यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है, तो क्या वह अपने आपको नष्ट कर सकता है ? दूसरा ईश्वर बना सकता है ? वेश्याको कुमारी बना सकता है ? परंतु

यह सर्वशक्तिमत्ताका अभिप्राय कदापि नहीं है। शक्ति शक्यमें ही होती है। स्वरूप- के अविरुद्ध ही शक्तियाँ होती हैं। वह्निमें दाहिका शक्ति होती है, परन्तु वह शक्ति काष्ठादि दाह्यका ही दहन करती है। अदाह्य आकाशादिका दहन नहीं कर सकती। इतनेपर भी अग्निके सर्वदाहकत्वमें कोई बाधा नहीं आती। इसी तरह यदि नित्यस्वरूपको नष्ट न कर सके तो इतनेसे ही ईश्वरके सर्वशक्तिमत्त्वमे बाधा नहीं पड़ सकती। इसी तरह नित्य अनाद्यनन्त सर्वशक्तिमान् अन्य ईश्वर- का निर्माण भी अशक्य है। वेश्याको उस जन्ममें नहीं तो जन्मान्तरमें कुमारी बना ही सकता है। अद्वैत वेदान्तकी दृष्टिसे परमेश्वर सर्वप्रपञ्चका उपादानकारण है, अत- एव वह सर्वशक्तिमान् है। उपादानकारणोंमें कार्यानुकूल शक्तियाँ होती हैं। मृत्तिकामें घटोत्पादनानुकूलशक्ति, तन्तुमें घटोत्पादनानुकूल शक्ति, दुग्धमें नवनीतो- त्पादनानुकूल शक्ति होती है—इस दृष्टिसे सर्वकारणमें सर्वोत्पादनानुकूल शक्ति होती है। जो वस्तु प्रमाणसिद्ध है, उसीके उत्पादनानुकूल शक्ति कारणमें हो सकती है। खपुष्प, शशशृङ्ग आदि अमत्पदार्थ प्रमाणसिद्ध ही नहीं हैं, अतः तदुत्पादनानुकूल शक्तिकी कल्पना ईश्वरमें नहीं की जा सकती। सर्वकारण एवं सर्वाधिष्ठान होनेके कारण चेतन ब्रह्म ईश्वर ही निरावरण होकर अपनेमें अध्यस्त सब प्रपञ्चका भासक होता है, इसीलिये वह सर्वज्ञ है। सर्वका चेतनके साथ आध्यासिक ही सम्बन्ध है। इसी सम्बन्धसे चेतनद्वारा सर्वप्रपञ्चका भान हो सकता है। इसीलिये सामान्य रूपसे, विशेषरूपसे सर्वप्रपञ्चको जाननेवाला ईश्वर सर्वज्ञ एव सर्ववित् है, अनन्त ब्रह्माण्ड एवं एक-एक ब्रह्माण्डके अनन्त जीव तथा एक-एक जीवके अनन्त जन्म, एक-एक जन्मके अनन्तानन्त कर्म एव अपरिगणित कर्मफलोंको जाननेवाला और विभिन्न ब्रह्माण्डोंके जीवोंके कर्मफलोंको दे सकनेकी क्षमता रखनेवाला ही ईश्वर है। इसीलिये ईश्वर सर्वज्ञ एव सर्वशक्तिमान् है। अनादि जीवोंके कल्याणके लिये ही उसकी सृष्टिनिर्माणमें प्रवृत्ति होती है। इसीलिये वह हितकारी भी कहा जाता है। समस्त प्राणियोंके लौकिक-पारलौकिक कल्याणके लिये उसके नि श्वासभूत वेदोंके द्वारा सबको उपदेश मिलता है— सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषम् कृणोमि वः । अन्यो अन्यमभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या ॥ ( अथर्ववेद ३ । ३० । १ ) जैसे गौ उत्पन्न बछड़ोंमें प्रेम करती तथा उनका हित चाहती है, वैसे ही ईश्वर भी सबको समान हृदय एवं शोभन हृदय तथा विद्वेषरहित अन्योन्य उपकारक बनाना चाहता है।

मार्क्स और ईश्वर ईश्वरके सम्बन्धमें भारतीय दर्शनोंके आधारपर मार्क्सवादियोंके विचार मार्क्सवादी हिंदू-दर्शन एवं भौतिकवादकी तुलना करते हुए कहते हैं कि 'हिंदू दर्शन ग्रन्थादि किसी एक ही मतके परिपोषक नहीं हैं । भौतिकवादके उल्लेखमात्रसे चार्वाकका नाम याद आता है । लेकिन चार्वाकसे बहुत पहले इसका वर्णन उपनिषदोंमें मिलता है कि सृष्टिका मूल क्या है ? आकाश । सब सृष्ट पदार्थ आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं तथा इसीमे विलीन होते हैं—'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाशः परायणम् ।' ( छान्दो० उप० १ । ९ । १ ) 'जिसको आकाश कहते हैं, वह सब नाम-रूपोंका द्योतक है ।'— आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता । (छान्दोग्य उपनिषद् ८ । १४ । १) इसी उपनिषद्मे ब्रह्मका भी उल्लेख है । इससे स्पष्ट है कि आकाश ब्रह्म नहीं है और यही सृष्टिका भौतिक कारण है । श्वेताश्वतर उपनिषद्की अग्नि वह स्वयम्भू है, जिससे भूतमात्रकी उत्पत्ति है । वह अग्नि भी ब्रह्म नहीं है । एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्निः सलिले संनिविष्टः । स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनिर्ज्ञः कालकारो गुणी सर्वविद्यः । (६ । १५-१६) कहना न होगा कि कई मार्क्सवादियोने भारतीय दर्शनोंका भौतिकवादसे मेल मिलाया है; किंतु अधूरे ज्ञानके कारण वे सदा ही अर्थका अनर्थ ही करते हैं । वस्तुतः उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका मूल आकाश कहा गया है वहाँ 'आकाश' शब्दका अर्थ है 'ब्रह्म' । 'आ समन्तात् काशते—प्रकाशते इत्याकाशः' प्रकाशमान अखण्ड बोधरूप परब्रह्म ही आकाश शब्दार्थ है । अतएव ब्रह्मसूत्रमे कहा गया है— 'आकाशस्तल्लिङ्गात्' (वेदान्तद० १ । १ । २२) — आकाश पदार्थ परमात्मा है, क्योकि जगदुत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-कारणतारूप लक्षण उस ब्रह्ममें ही घटता है, भूताकाशमे नहीं । क्योकि उन्हीं उपनिषदोंमें आकाशादि भूतोकी उत्पत्ति ब्रह्मसे कही गयी है, 'तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः' ( तै० उ० २ । १ ) उस अपरोक्ष आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति होती है । 'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते ॰ तद् ब्रह्म ।' ( तै० उ० ३ । १ ) जिस परमात्मासे सब भूत उत्पन्न होते हैं, वह ब्रह्म है । जो आकाश नाम-रूपका निर्वाहक है, वह आकाश भी वही ब्रह्म है । ( देखिये, छा० उ० ८ । १४ । १ शांकरभाष्य ) श्वेताश्वतरका

: 'है ।"-' or 'है ।'-'? It has a double quote or single quote? Wait, in L22: "बौद्धमत... (double quote opened). In L25: 'केवल विचारका... (single quote opened). In L27: है ।'- or है ।"-? There is ' then -? Look at L27: रह जाता है ।'- - wait, it is a single quote ' or double quote "? It looks like '- or "-? It has one or two apostrophes? Look closely at line 27: after है । there is '- or "-? There is one stroke or two? There are two small strokes: " or one? It looks like '- (single quote). Wait, look at the end of the paragraph (L34): does the double quote close there? No double quote at the end of L34! Wait, look at L31: 'बौद्ध- (single quote opened). Wait, why does L31 have 'बौद्ध-? Ah! Look at L31: रह जाता है । 'बौद्ध- Wait, let's look at the quotes in the whole passage: L22: "बौद्धमत स्वयं भारतीय भौतिकवादियोंका वैदिकधर्मके विरुद्ध एक विद्रोह L23: `है ।

८३२ || मार्क्सवाद और रामराज्य

“योगबल और अलौकिक शक्ति—यहाँ योगादिके विषयमें एक बात कहना असङ्गत न होगा। क्या तपस्या, योग, क्रिया आदिसे मनुष्य अलौकिक कार्य सम्पन्न कर सकता है ? जो कुछ पहले कहा जा चुका है, उससे उत्तर स्पष्ट है— कदापि नहीं। योगकी शास्त्रीय परिभाषाओसे भी उसके ऊपर प्रकाश पड़ता है। पातञ्जलसूत्रकी परिभाषा है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ( १ । २) पर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध -यह स्वयं ही एक असम्भव क्रिया है; इसलिये एक असम्भव क्रियासे असम्भव फल प्राप्त होता है या नहीं यह प्रश्न स्वयं ही अपना उत्तर है। गीताकी परिभाषा है— 'योगः कर्मसु कौशलम्' (२।५०)। तिलकने इसी परिभाषापर जोर दिया है। स्पष्ट ही यह परिभाषा योगको अलौकिक क्षेत्रसे उतारकर व्यवहार-क्षेत्रमें लानेका प्रयत्न है। व्यावहारिक अर्थमें ही एक मार्क्सवादी गीताके उस श्लोककी प्रशंसा कर सकता है—जिसमें मनुष्यको समदर्शी होनेका उपदेश दिया गया है। लाभ और हानि, जय और पराजय, दोनोंमें ही उसको अविचलित रहनेको कहा गया है, लेकिन मार्क्सवाद और गीताकी प्रेरणाएँ भिन्न हैं। गीताकी प्रेरणा है— कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।' (२।४७) लेकिन मार्क्सके दर्शनमें ईश्वरको फल सौंपनेकी बात नहीं आती, क्योंकि यह एक निरीश्वरवादी दर्शन है। ईश्वरमें विश्वाससे ही अलौकिक शक्तिकी कल्पना आती है। जन्मान्तर-रहस्य इसीका एक अङ्ग है। ऐसे प्रश्नोंका उत्तर 'Dialectics of nature' नामक पुस्तकके एक अध्यायमें एजिल्सने दिया है। प्रेतात्मा बुलानेवालोंकी कारस्तानियों अदालतोंमे कैसे खुलीं, उन घटनाओंका उल्लेख करते हुए एजिल्सने अलौकिक शक्तिकी असम्भावनाओंको प्रमाणित किया है।” मार्क्सवादी आदर्शवादके रूपमें अद्वैतवादको ही क्यो देखना चाहता है ? अनेक अध्यात्मवादी चेतनके समान ही अचेतनको भी वास्तव ही मानते हैं। अद्वैतवादी वृत्तिविशिष्ट चैतन्यरूप दृष्टिको व्यावहारिक सत्य मानते हैं और विषय- को भी उसी कोटिका मानते हैं। बिना चेतन-सत्ता स्वीकार किये क्रियाशीलता ही नहीं बन सकती, फिर क्रान्तिकारी क्रियाशीलताकी बात तो दूरकी है। क्रियात्मक सत्यता अवश्य प्रयोगसापेक्ष है; परंतु वस्तुसत्ता प्रयोगकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे अगर कूटस्थ सत्, परमार्थ आत्मा सत्य है, तो उसके लिये प्रयोग अपेक्षित नही वहाँ तो अज्ञान-निवृत्त्यर्थ ज्ञानमात्र अपेक्षित है। क्रिया पुरुषतन्त्र हो सकती है, परंतु ज्ञान तो पुरुषतन्त्र न होकर वस्तुतन्त्र ही होता है। जो विभाज्य एवं विपरीत होता है, वह परमार्थ सत्य होता ही नहीं। सत्यताकी मुख्य परीक्षा प्रमाणसे होती है। प्रयोग भी प्रमाणका अङ्ग होकर ही परीक्षामें उपयुक्त हो सकता है। विचार, क्रिया— दोनों ही एक कर्ता-प्रयोक्ताद्वारा सम्पन्न होते हैं—यह तो ठीक है, परंतु 'एक ही सत्यकी विपरीत दिशाएँ हैं', यह निरर्थक वागाडम्बरमात्र है।

मार्क्स और ईश्वर ८२३

"परिस्थितियोंकी उपज मनुष्य है या मनुष्यकी उपज परिस्थितियाँ ?" यह विषय सदासे ही विचारणीय रहा है फिर भी सिद्धान्तत मनुष्य चेतन है। परिस्थितियाँ जड हैं। मनुष्य ही परिस्थितियोंका निर्माता ह और भीष्मजीने कहा है काल या परिस्थितियाँ राजाका कारण हैं या राजा कालका कारण है— यह संशय न होना चाहिये, क्योंकि राजा ही कालका कारण होता है— कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्। इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्।' (महा० उद्योगपर्व १३२ । १६) अस्तु, हीगेलके निर्विशेष मानस और वेदान्तके ब्रह्ममें महान् अन्तर है। मन एक भौतिक वस्तु है, किंतु ब्रह्म नित्य कूटस्थ अनुभवस्वरूप है। वृहि धातुसे ब्रह्मकी निष्पत्ति अवश्य होती है, परंतु वर्धित होना 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ नहीं है। निरतिशय बृहत् तत्त्व ही ब्रह्म है। वह देश-काल-वस्तुसे अपरिच्छिन्न है। निरतिशय पदार्थ ही बृहत् कहा जा सकता है। भौतिक जड अनृत मर्त्यको निरतिशय बृहत् नहीं कहा जा सकता, अतएव सत्य चैतन्य त्रिकालाबाध्य अमृत कूटस्थ अपरिच्छिन्न अनन्त अखण्ड ज्ञान ही ब्रह्म-शब्दार्थ ठहरता है। वर्धन-हेतु होनेसे प्राणमें भी ब्रह्म शब्दका प्रयोग होता है; क्योंकि प्राण रहनेपर ही शरीरकी वृद्धि आदि होती है। औपनिषद परब्रह्ममें तो 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंके अनुरोधसे निरतिशय बृहत्तत्त्वके अर्थमें ही ब्रह्म-शब्दका प्रयोग होता है। यह भी कहा जा चुका है कि जिसमें वास्तविक विभाजन होता है, वह ब्रह्म नहीं होता। अनिर्वचनीय मायाके अध्याससे ही उसमे अनेक प्रकारके विभागोंका अध्यारोप होता है। इसी तरह यह भी कहना गलत है कि मायावादी दर्शनकी असङ्गतियोंको दूर करनेके लिये गौडपादने ब्रह्म या आत्माको मूलमें रखकर भूत जगत्को उसका फलस्वरूप बतलाकर सत्यकी मर्यादा रखी है। क्योंकि अनादि-अपौरुषेय वेद, उपनिषद् आदिके द्वारा ही ब्रह्मवादका प्रतिपादन किया जाता है। अद्वैतवादी शंकरने तो गौडपादके ही मतका अनुसरण करके प्रस्थानत्रयीपर भाष्य किया है। गौडपादका सिद्धान्त तो 'अजातवाद' है। उनके यहाँ तो भूत-जगत् कभी हुआ ही नहीं। 'आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ (माण्डूक्यकारिका ४।३१) जो आदिमें नहीं और अन्तमें नहीं होता, वह वर्तमानमे भी वैसा ही होता है। भूत, जगत्, वितथ, स्वप्न, माया आदिवितथ पदार्थों- के सदृश अवितथ से प्रतीत होते हैं, इस दृष्टिसे ब्रह्म-तत्त्व ही त्रिकालाबाधित सत्य है। न्याय मीमांसा आदि दर्शनोंने भूत सत्ता अवश्य स्वीकार की है, परंतु चेतन आत्मा एव अनादि-अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोका प्रामाण्य तथा शास्त्रोक्त धर्म अधर्म आदिका अस्तित्व भी उन्हे स्वीकृत है। फिर उन आस्तिक दर्शनोंमे जडवादी

८२४ मार्क्सवाद और रामराज्य भौतिक दर्शनोंकी सिद्धि कैसे हो सकेगी ? वृत्तिरूप ज्ञान प्रमाणसापेक्ष होता है— यह वेदान्तदर्शनको भी मान्य है । सौत्रान्तिक, योगाचार, वैभाषिक, माध्यमिक— चारों प्रकारके बौद्ध कम-से-कम प्रत्यक्षप्रमाणके अतिरिक्त अनुमानप्रमाण भी मानते हैं; किंतु भौतिकवादी चार्वाक आदि तो अनुमानप्रमाण भी नहीं मानते । बौद्ध भी देहभिन्न क्षणिक विज्ञानकी आलयधाराको आत्मा मानते हैं; किंतु चार्वाक एव मार्क्स आदि तो जीवित देहको ही आत्मा मानते हैं । बौद्ध भले ही वैदिक-धर्मके विरोधी हो फिर भी उनके यहाँ आत्मा तथा पुण्य, पाप, सत्य, तपस्या तथा प्रमाण आदि मान्य हैं । जडवादी तो सबसे गये-बीते हैं। कणाद एव गौतम परमाणु, ईश्वर तथा जीवात्माओके पुण्यापुण्यरूप अदृष्टको जगत्-कारण मानते हैं, अतः इनका भी भौतिकवादियोसे कोई मेल नहीं है । कपिल, पतञ्जलि भी प्रत्यक्ष, अनुमान एव आगमको प्रमाण मानते हैं, तदनुसार असङ्ग अनन्त नित्य चेतन आत्मा तथा महदादि प्रपञ्चका कारण प्रकृति एवं धर्माधर्म उन्हें मान्य हैं । ये लोग ईश्वर भी स्वीकार करते हैं । अवश्य कपिल आदि बाह्यार्थवादी हैं, परंतु उनके असङ्ग चेतन आत्माकी सिद्धि बाह्यार्थपर अवलम्बित नहीं है; क्योंकि कपिल, पतञ्जलि, गौतम, कणाद आदि सभीका आत्मा नित्य है। जो नित्य होता है उसकी सिद्धि अन्यसापेक्ष नही होती । यहाँतक कि चारो प्रकारके बौद्ध एवं जैन आत्माको बाह्यार्थ-सापेक्ष नहीं मानते, बल्कि बौद्धोकी दृष्टिसे तो बाह्यार्थ विज्ञानका परिणाम है । उनका स्पष्ट कहना है कि जैसे मृत्तिकाके रहनेपर ही घटादिका उपलम्भ होता है, अन्यथा नहीं— ‘सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः’ अतः विज्ञान एवं बाह्यार्थका अभेद ही होता है । सौत्रान्तिक, वैभाषिककी दृष्टिमे बाह्यार्थ भी मान्य है । वैसे वेदान्ती भी व्याव- हारिक, प्रातिभासिक-दो प्रकारका बाह्यार्थ मानते ही हैं । जिस कोटिका प्रमाण एवं प्रमाता है, उसी कोटिका बाह्यार्थ भी है, परंतु भौतिकवाद-मतकी पुष्टि इन किन्हीं दर्शनोंसे नहीं होती । इन मतोंमें मन, ज्ञान, भूत अथवा देहके परिणाम नहीं मान्य हैं । इसी तरह योग आदिके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंका टाँग अड़ाना भी अनधि- कारपूर्ण चेष्टा है । जैसे बंदरको अदरखका स्वाद अज्ञेय होता है, शाकवणिक्‌लोगों को बहुमूल्य रत्नोंका माहात्म्यज्ञान दुःशक है, वही स्थिति योगके सम्बन्धमे मार्क्स- वादियोकी है । जो सत्य, अहिंसा, संयम, न्यायको भी स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं होता है, जो वर्ग-संघर्ष, वर्ग विध्वंसके मार्गपर चलकर केवल धनको ही सर्वस्व मानकर उसे ही अपना ध्येय मानता है, उसके यहाँ त्याग, संयम, अपरिग्रह, तपस्यादिमूलक योगकी बातोंका क्या महत्त्व हो सकता है ?

चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको मार्क्सवादी एक असम्भव चीज मानते हैं । अतएव असम्भव चीजसे होनेवाले फलोंको भी असम्भव मानते हैं । परंतु यदि योग या वेदान्तानुसार पाञ्चभौतिक मन या चित्त एक परिणामी वस्तु है और उसका परिणाम सहेतुक है तो परिणाम-निरोध भी क्यों नहीं हो सकता ? सुषुप्तिमें चित्तका शब्दाद्याकार परिणाम निरोध मान्य है, तब फिर समाधिमें भी चित्तके वृत्ति-परिणामराहित्य होनेमें क्या आपत्ति है ? वृत्तिद्वयकी मधिमें चित्त- का निर्वृत्तिक होना तर्कसङ्गत भी है ! चित्तके एक व्यापारसे एक वृत्ति होती है । एक व्यापारके अनन्तर अन्य व्यापार-प्रारम्भसे पूर्व क्षणमें चित्तके निर्व्यापार एव निर्वृत्तिक माननेमें कोई भी अड़चन नही हो सकती, जैसे अलातचक्रकी तीव्र गति होती है, वैसे ही मन्द गति भी होती है । साथ ही गति-राहित्यका भी कोई समय हो ही सकता है, उसी तरह चित्तकी तीव्र, मन्द गति एव गति-राहित्य भी सम्भव है । इस तरह जब योग असम्भव वस्तु नहीं है तो उसका फल भी असम्भव वस्तु नहीं है । 'योगः कर्मसु कौशलम्' (गी० २।५०) का तिलकद्वारा वर्णित अर्थ गलत है । वस्तुतः कर्म-कौशलको योग नहीं कहा जाता है, किंतु योग ही कर्मोंमे दक्षता है । योगकी परिभाषा स्पष्ट की गयी है—'समत्वं योग उच्यते' (गी० २।४८) सिद्धि-असिद्धिमें समता योग है । इस तरह समत्वबुद्धिसे युक्त कर्म भी गीतामें योग कहा गया है । तिलकने भी भले ही कर्मोंमें कौशलको योग कहा हो, तो भी उन्होंने पातञ्जलयोग एवं उसके फलका अपलाप नहीं किया है । मार्क्सवादीके लिये गीताकी प्रशंसाका कोई अर्थ ही नहीं; क्योंकि गीतामें तो स्वयं ही निर्वातस्थित निश्चल दीपके तुल्य योगीके यत चित्तका निश्चल होना बतलाया है— 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ (गी० ६।१९) मार्क्स स्पष्ट ही निरीश्वरवादी है, फिर उसकी दृष्टिसे कर्मोंका ईश्वरमें समर्पण करना, फलकी आकाङ्क्षा बिना ईश्वराराधन बुद्धिसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करना आदि सब बाते व्यर्थ हैं । धनको ही सर्वस्व माननेवाले भौतिकवादीके लिये हानि- लाभ, जय-पराजयको समान समझना कहाँतक सम्भव है । किसी दाम्भिकके दम्भके भण्डाफोड़ होनेसे किसी युक्ति-शास्त्रसम्मत सिद्धान्तका अपलाप नहीं किया जा सकता । एजिल्सके 'डायलेक्ट्स आफ नेचर' पुस्तककी बाते भी पुरानी पड़ गयी हैं । वस्तुतः वैज्ञानिकोने ही प्रचलित जड़वाद एव विकासवादकी युक्तियोंका खण्डन करके एक अलौकिक शक्तिका महत्त्व सिद्ध किया है, जिसे हम विकासवादके खण्डन- के प्रसङ्गमें विस्तारसे दिखला चुके हैं ।

त्रयोदश परिच्छेद उपसंहार भारतीय राजनीतिक दर्शन पाश्चात्त्य देशोंमें दर्शन एवं शास्त्र शब्द बड़ा ही सस्ता बन गया है। किसी भी विचारको, जैसे गर्भशास्त्र, प्राणिशास्त्र, मार्क्सदर्शन आदिकी वे शास्त्र संज्ञा देते हैं। किंतु विश्वविख्यात भारतीय विद्वानोंने तो शास्त्र शब्दका प्रयोग मुख्य रूपसे अनादि अपौरुषेय वेदमें ही किया है। उन्हींमें प्रत्यक्षानुमानसे अनधि- गत धर्म, ब्रह्मादि तत्त्वबोधन क्षमता है--'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते। एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥', 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्र० सू० १।१।३) में शास्त्र शब्दका ऋग्वेदादि अर्थ ही उक्त है। जैसे रूप आदिके सम्बन्धमें चक्षु आदि स्वतन्त्र प्रमाण हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म आदि अतीन्द्रिय-अचिन्त्य विषयोंमें स्वतन्त्ररूपसे अपौरुषेय वेद ही प्रमाण हैं। अन्य तदाश्रित तदुपबृंहित आर्ष धर्मग्रन्थोंमें तो प्रत्यक्षानुमानागमादि मूलकत्वेनैव प्रामाण्य है । अतएव शास्त्रत्व भी वेद- मूलक होनेसे ही उनमें सिद्ध होता है। प्रमाण, प्रमेय, साधन फलका प्रामाणिक निर्देश दर्शनका स्वरूप होता है। औत्सुक्यनिवृत्ति-जिज्ञासोपशान्तिमात्र पाश्चात्त्य दर्शनोंका उद्देश्य है। तद्भिन्नपरस्पराविरोधेन धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्ति एवं अव्यभिचरित तत्साधनोंका सम्यक् ज्ञान भारतीय दर्शनोंका उद्देश्य है । आजकलके कुछ समालोचकोंका कहना है कि 'पाश्चात्त्य देशोंके राजनीतिक दर्शन हैं, किंतु भारतमें कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। कारण, 'पाश्चात्त्य देशोंके विद्वान् राजनीतिक एवं दार्शनिक दोनों ही थे; किंतु भारतके राजनीतिज्ञ दार्शनिक नहीं थे ।' परंतु उनका यह कहना सर्वथा निराधार है । सबसे पहली बात तो यह है कि सर्वदर्शनोंका शिरोमणि वेदान्त है। वेदोंमें वेदान्त भी है, राजनीति भी है। मनु, याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्रोंमें दर्शन भी है, राजनीति भी है। व्यास सबसे बड़े दार्शनिक और सबसे बड़े राजनीतिज्ञ हैं । वेदान्तदर्शनके रचयिता व्यास ही महाभारतके रचयिता हैं । महाभारतका मोक्षधर्म, गीताका दर्शन और शान्तिपर्वका राजधर्म पढ़े तो उक्त मत सर्वथा निर्मूल सिद्ध हो जायगा । बृहस्पति, कणिक, कौटल्य, कामन्दक आदि सभी राजनीतिक दार्शनिक थे । योगवासिष्ठके वशिष्ठ महादार्शनिक एवं महाराजनीतिज्ञ थे । सूर्यवंशकी राजनीतिके वे ही कर्णधार थे । वस्तुस्थिति यह है कि पदवाक्यप्रमाणपारावारीण विद्वान् शब्द-शुद्धि आदिका कार्य पाणिन्यादि व्याकरणसे चलाते हैं, वाक्यार्थ निर्णयके लिये पूर्वोत्तर- मीमांसाका उपयोग करते हैं, अनुमान आदिके सम्बन्धमें न्याय वैशेषिकका उपयोग करते हैं तथा वे ही तत्त्व-संख्यान, चित्त-निरोध आदिमें सांख्य एवं योगका उपयोग कर लेते हैं। वे अगतार्थ अपूर्व वस्तुका ही प्रतिपादन करते हैं। पाश्चात्त्य लोग गतार्थ वस्तुओंका भी निरूपण करके स्वतन्त्र दार्शनिक बननेकी चेष्टा करते हैं ।

उपसंहार [पृ. ८२७]

राजनीतिक शास्त्र या दर्शनका कार्य राजाओं, शासकों एव तच्छासित भूखण्ड या अखण्ड भूमण्डल या प्रपञ्चमण्डलके प्राणियोंके लिये ऐहिक आमुष्मिक अभ्युदय एवं परम निःश्रेयस-प्राप्तिका प्रशस्त मार्ग और अनुष्ठान-सुविधा-प्रत्युपस्थापन करना है। तत्प्रबोधक अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्षग्रन्थ-मनु, नारद, शुक्र, वृहस्पति, अग्नि-मत्स्य-विष्णुधर्मादि पुराण, रामायण, महाभारत आदि राजनीतिक शास्त्र या दर्शन हैं। इस शास्त्रके अभिमत प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्था- पत्ति, अनुपलब्धि-ये छः प्रमाण हैं। मूलरूपमें सत्य-अनृत, चेतन अचेतन दो ही तत्त्व हैं। चेतनमें भी ब्रह्म, ईश्वर, जीव—तीन भेद हैं। अचेतनमें प्रकृति महान्, अहङ्कार आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण—पञ्च ज्ञाने- न्द्रियाँ, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, प्राण, अपान, उदान व्यान, समान—पञ्चप्राण, मनोबुद्धिचित्ताहङ्कारात्मक अन्तःकरण—ये २४ भेद हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चतुर्वर्ग-प्राप्ति फल है। आचार्यपरम्परासे पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र तथा षडङ्ग वेदों एवं अन्य आर्षग्रन्थोंके आधारसे कर्त्तव्या- कर्त्तव्य-ज्ञानपूर्वक कर्त्तव्यपालन, अकर्त्तव्य-परिवर्जनसे धर्मकी प्राप्ति होती है । धर्माविरुद्ध अर्थशास्त्रोक्त उद्योगपरायण होनेसे अर्थकी प्राप्ति होती है, धर्मार्थाविरुद्ध कामशास्त्रोक्त मार्गसे शब्दादि साधनसामग्रीद्वारा काम-प्राप्ति होती है। औपनिषद परब्रह्मके तत्त्वविज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। आन्वीक्षिकी, न्यायोपबृंहित वेदान्तविद्या—ब्रह्मविद्या, त्रयी वेदोक्त धर्मविद्या, वार्त्ता, अर्थविद्या आदि सर्वपुरुषार्थोपयोगिनी विद्याओं का रक्षण एकमात्र राजनीतिसे ही सम्भव होता है । उसके बिना सभी विद्याएँ नष्ट हो जाती हैं । राजनीतिकी स्वरूपभूता दण्डनीतिके विप्लुत होनेसे सभी विद्याएँ विप्लुत हो जाती हैं । 'आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता सतीविद्याः प्रचक्षते। सत्योऽपि हि न सत्यस्याद्दण्डनीतेस्तु विभ्रमे।' (काम०नी० २।८) 'मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्।' (महा० शा० ६३।२८) आर्यमर्यादाकी रक्षा, वर्णाश्रम-व्यवस्था तथा त्रयीके प्रोत्साहनसे लोक- प्रसाद होता है अन्यथा लोकावसाद होता है । 'व्यवस्थितार्यमर्यादः कृतवर्णाश्रम- स्थितिः। त्रय्या हि रक्षितो लोकः प्रसीदति न सीदति ॥ (कौटलीय अर्थ० १।३।१७) देहेन्द्रिय मनोबुद्धि आदिसे भिन्न परलोकगामी कर्त्ता भोक्ता, आत्मा तथा परलोकमें विश्वासके अनन्तर ही धर्ममें प्रवृत्ति होती है कर्तृत्व-भोक्तृत्वशून्य, अच्छेद्य, अभेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, ब्रह्मात्मविज्ञानसे परम कैवल्यमोक्ष तथा जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है तथा निःसन्देह एव निर्भय होकर समष्टि विश्वहितसाधनार्थ राजनीतिक सन्धि-विग्रहादिमें सफल प्रवृत्ति हो सकती है। इसीलिये गीतामें 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि' आदिसे नित्य, शुद्ध, बुद्ध, आत्मस्वरूपका वर्णन है और राजर्षियोंको इस ब्रह्मविद्याका वेत्ता-वेदयिता बतलाया गया है । विश्व, विराट्, तैजस, हिरण्यगर्भ, प्राज्ञ, ईश्वर, कूटस्थ, ब्रह्मरूप व्यष्टि समष्टिके अभेद-बोधसे ही आत्महित एव विश्वहितमें एकता होती है । व्यष्टि

अभिमानरूप सङ्कीर्णताको बाधित करने तथा समष्टि-अभिमान उपोद्वलित होनेसे ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का भाव उदित होता है। आत्मीयताके अभिमानके परिपाकसे आत्मत्वाभिमान या समष्टिमें अहंग्रहोपासना सम्पन्न होती है। व्यष्टि समष्टि, स्थूल-सूक्ष्म कारणकी अभेदभावना उपासना-कोटिमें परिगणित है। कूटस्थ ब्रह्मकी अभेदभावना तत्त्वसाक्षात्कार-पर्य्यवसायिनी ही होती है। व्यवहारदशामे भी इन भावनाओके फलस्वरूप कुल, गोत्र, जाति, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व आदि समष्टि जगत्के सम्बन्धमें आत्मीय हित तथा आत्महितके समान ही हिताचरण एवं अहितनिवारणार्थ निरासङ्ग प्रवृत्ति होती है।

शास्त्रीय शासनविधान

सभी प्राणी अमृतस्वरूप परमेश्वरके ही पुत्र हैं—'अमृतस्य पुत्राः' (श्वेता० उ० २।५) अर्थात् सभी देहादिभिन्न चेतन, अमल, सहज, सुखस्वरूप जीवात्मा स्वप्रकाश सच्चिदानन्द परमेश्वरके ही अंश हैं। जैसे महाकाशके अंश घटाकाश, अग्निके विस्फुलिङ्ग, गङ्गाजलके तरङ्ग आदि अंश हैं, वैसे ही अखण्डबोधस्वरूप परमेश्वरका बोधस्वरूप जीवात्मा अंश है। अतः सबकी सहज समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ता ही माननीय है। जैसे मलिन भूमिके सम्पर्कसे निर्मल जल मलिन हो जाता है, कतक, निर्मली आदि औषधके सम्पर्कसे पुनः शुद्ध हो जाता है, वैसे ही अविद्याश्रयकर्मके सम्पर्कसे जीवात्मा मलिन होता है तथा कर्मोपासना, ज्ञान आदिसे पुनः प्रसन्न-निर्मल-निष्कळङ्क हो जाता है। भ्रातृत्ता, आत्मीयता तथा आत्मैक्यताके कारण सर्वजनहिताय-सर्वजनसुखाय राजनीति आवश्यक है। न वै राज्यं न राजासीन्न दण्डो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ (म० शां० ५९) कृतयुगमें सभी तत्त्ववित्, धर्मनिष्ठ, विवेकी तथा सात्त्विक होते हैं। सब एक दूसरेके पोषक, रक्षक, हितचिन्तक होते हैं। कोई किसीका शोषक नही होता। सब धर्मनियन्त्रित होकर परस्पर एक दूसरेके पूरक बनते हैं। तामस, राजस- भावकी वृद्धि, अधर्म-अनाचारके विस्तारसे सत्त्व एवं धर्मका ह्रास होता है। अतः मोहके प्रभावसे ब्रह्मात्मविज्ञान संकुचित होता है, काम-क्रोधका विस्तार होता है, तभी मात्स्यन्याय फैलता है। उस मात्स्यन्यायको रोककर सर्वसामञ्जस्य सर्वहित- सम्पादनार्थ राज्य-व्यवस्था होती है। अहिंसा, सत्यादि धर्मका प्रतिष्ठापन, ब्रह्मविज्ञान- विस्तार और दण्डविधान—ये ही मात्स्यन्याय निरोधके मूल उपाय हैं, यह कहा जा चुका है। चाणक्यके अनुसार 'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलमर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यम्, राज्यमूलमिन्द्रियजयः, इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः, विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा' (चाणक्य-सूत्र १–६)। सातिशय, निरतिशय—सर्वविधसुखका मूल धर्म है, परंतु धर्मका मूल अर्थ है। अर्थ रहनेपर ही धर्मानुष्ठान सम्भव होता है। अर्थका मूल राज्य है, राज्यका मूल इन्द्रियजय है, इन्द्रियजयका मूल विनय है, विनयका मूल वृद्धसेवा

उपसंहार ८२९ है । वृद्धोंकी सेवाका भी मूल विज्ञान है; इसलिये विज्ञानसम्पन्न होकर, जितात्मा होकर सर्वसुखार्थ प्रवृत्त होना आवश्यक है । मनुके अनुसार— आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतानि वृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः ॥ (मनु० १ । ५-६) सम्पूर्ण जगत् सृष्टिके प्रथम नाम-रूपरहित, कल्पनातीत, अलक्षण, सर्वतःप्रसुप्त, तमोमय अर्थात् अनिर्वचनीय अज्ञान-विशिष्ट चिन्मात्र था । सर्वकारण परब्रह्म परमेश्वर स्वयम्भू भगवान् ही तमको अभिभूत करके इस अव्यक्त जगत्‌को व्यक्त करते हुए प्रादुर्भूत होते हैं । जैसे वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंके बदलनेपर ऋतुलिङ्ग प्रकट होते हैं, उसी तरह प्राणी समयानुसार अपने-अपने कर्मोंको प्राप्त होते हैं । कर्मानुसार ही चराचर विश्वका उत्पादन भगवान् करते हैं—'यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम्' (मनु० १ । ४८) । कर्मानुसार ही विविध योनियोंमें प्राणियोंके जन्म होते हैं । कर्ममूलक सृष्टिका विस्तार वर्णाश्रम- व्यवस्थाका प्रतिपादन करके मनु कहते हैं कि समाजमें अराजकता होनेपर सारी प्रजा घबड़ाकर भयसे इधर-उधर भागने लगी, तब उसकी (प्रजाकी) रक्षाके लिये प्रजापतिने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र और कुबेर—इन आठ लोकपालोंके अंशसे राजाका निर्माण किया— अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ (मनु० ७ । ३-४) देवताओंके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण ही राजा अपने तेजसे सब प्राणियोंको दबा लेता है । राजा बालक हो तो भी मनुष्य समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिये । उस राजाके लिये भगवान्‌ने सब प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले धर्मस्वरूप ब्रह्मतेजोमय दण्डका निर्माण किया । उस दण्डके भयसे ही स्थावर-जङ्गम सभी प्राणी अपने पदार्थोंका उचित उपभोग कर पाते हैं तथा अपने कर्त्तव्यसे विचलित भी नहीं होते— तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । भयाद् भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ (मनु० ७ । १५) दण्ड ही राजा, पुरुष, नेता, शासक और चारों आश्रमोंके धर्मका साक्षी है— स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः। चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ (मनु० ७ । १७)

८३० मार्क्सवाद और रामराज्य दण्ड ही सब प्रजाका शासक एव रक्षक है। सबके सोनेपर दण्ड ही जागता है। विद्वानोने दण्डको ही धर्म कहा है। विचारपूर्वक प्रयुक्त हुआ दण्ड प्रजाका अनुरञ्जन करनेवाला और अविचारित दण्डे प्रजाका विनाशक होता है। यदि राजा आलस्य छोड़कर दण्डका विधान न करे तो बलवान् प्राणी दुर्बलोंको वैसे-ही पकाकर खा जायें, जैसे लोग मछलियोको भूनकर खा जाते हैं। कौवा पुरोडाश खाने लग जाय, कुत्ता हवि चाटने लग जाय—किसी पदार्थपर किसीका स्वत्व न रहे और छोटे-बड़े तथा बड़े-छोटे हो जायें। सभी वर्ण दूषित हो जायें, मर्यादाएँ भङ्ग हो जायें और सारे ससारमें उथल-पुथल मच जाय— दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥ समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः। असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः॥ यदि न प्रणयेद् राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः। शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः॥ अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद् हविस्तथा। स्वाम्यं च न स्यात् कस्मिंश्चित् प्रवर्तेताधरोत्तरम्॥ दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिन्द्येरन् सर्वसेतवः। सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद् दण्डस्य विभ्रमात्॥ ( मनु ७ । १८-२१; २४ ) राजा दण्डका ठीक-ठीक विधान करनेवाला, सत्यवादी, विचारपूर्वक काम करनेवाला, बुद्धिमान् धर्म, अर्थ, और कामका ज्ञाता होना चाहिये, ऐसा मनु आदि धर्मशास्त्रकारोका मत है— तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्। समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥ ( मनु० ७ । २६ ) दण्ड बड़ा तेजस्वी है। अजितेन्द्रिय लोग ठीक-ठीक उसका विधान नही कर सकते । वह धर्मविचलित राजाको बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कर देता है । तथा दुर्ग, राज्य, स्थावर-जङ्गम जगत्, आकाशचारी देवगण और ऋषिगणको भी पीड़ित करता है। राजा या शासकको न्यायपूर्वक अपने राज्यकी प्रजाका पालन करना चाहिये । शत्रुओको उग्र दण्ड देना चाहिये । मित्रोके साथ छल-कपटका व्यवहार नहीं करना चाहिये । प्रेमीजनो और सज्जनोंके साथ सहिष्णुता रखनी चाहिये । ऐसा व्यवहार करनेवाला राजा भले ही कोषरहित हो, उसका यश ऐसा फैलता है, जैसे जलपर तैल-बिन्दु । राजाको चाहिये कि वह पवित्र विद्वान्, ब्राह्मण एवं वृद्धोंकी नित्य सेवा करे। ऐसा करनेसे राक्षस भी राजाका

सम्मान करते हैं तथा विनय ( जितेन्द्रियता, नम्रता ) भी प्राप्त होती है । अविनय ( उद्दण्डता ) से सुसमृद्ध राजा भी सपरिवार नष्ट हो जाते हैं और विनय- से जगलों में रहनेवाले कोषविहीन राजा भी राज्य पा लेते हैं । शिकार, द्यूत, दिवास्वप्न, निन्दा, स्त्री, मद ( नशा ), नृत्य, गीत, वादित्र और व्यर्थ घूमना ( हवाखोरी ), इन दश कामज व्यसनों तथा चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया ( गुणोंमें भी दोषदृष्टि ), दूसरेका धन छीन लेना, गाली-गलौज और मार-पीट— इन आठ क्रोधज व्यसनोंसे तथा इन दोनोंके मूल लोभसे राजाको अत्यन्त बचना चाहिये । कामज व्यसनमें मदिरापान, द्यूत, स्त्री और मृगया—ये चार तथा क्रोधज व्यसनमें गाली-गलौज, मारपीट और दूसरेका धन छीन लेना ये तीन बहुत ही भयंकर हैं । इनसे तो सर्वथा बचना चाहिये । अत्यन्त सुकर कर्म भी एक असहाय पुरुषद्वारा दुष्कर होता है । अतः राजाको शास्त्रज्ञानी शूर, लब्धप्रतिष्ठ, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री रखने चाहिये । संधि, विग्रह, सेना, खजाना, खेती, खान, रक्षा ( बन्दोवस्त ) आदिके विषयमें पृथक्-पृथक् प्रत्येककी राय जानकर विद्वान् ब्राह्मणके साथ विचारकर निर्णय करना चाहिये । राज्यका काम जितने लोगोंसे अच्छी तरहसे चल सके, उतने लोगोंको परीक्षा करके उपमन्त्री बनाना चाहिये । खान, चुंगी और कर वसूल करनेके लिये शूर पवित्र निर्लोभ लोगोंको और पापभीरु लोगोंको घर आदिके प्रबन्ध- सम्बन्धी काममें लगाना चाहिये । इसी तरह सर्वशास्त्र विशारद इङ्गित आकार और चेष्टा जाननेवाला पवित्र कुशल कुलीनको दूत बनाना चाहिये । दूत-अनुरक्त, पवित्र, चतुर, स्मृतिशाली, प्रतिभासम्पन्न, देश-काल—परिस्थितिका ज्ञाता, सुन्दर, निर्भीक और वाग्मी होना चाहिये । सेनापतिके अधीन चतुरङ्गिणी सेना, सेनाके अधीन युद्ध तथा विनय सिखाना, राजाके अधीन खजाना और राज्य तथा दूतके अधीन संधि विग्रह होते हैं । दो राजाओंमें मेल कराना या मिले हुए राजाओंको परस्पर लड़ा देना, यह दूतका काम है। कृषक जैसे खेतमेसे घासको निकालकर धान्यकी रक्षा करता है, उसी तरह राजा दुष्टोंका निग्रहकर प्रजाकी रक्षा करे । जैसे शरीरको कष्ट देनेसे प्राणोंका क्षय होता है, उसी तरह राष्ट्रको पीड़ा पहुँचानेसे राजाके प्राणोंका क्षय होता है । जो राजा अज्ञानवश राष्ट्रको पीड़ा पहुँचाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसमेत जीवनसे भ्रष्ट हो जाता है । राजाको लगानवसूली, नौकरोंका मासिक वेतन, मन्त्री आदिको बाहर भेजना, किसीको हानिकर काम करनेसे रोकना, किसी कामको कराना, मुकद्दमो- का निर्णय, अपराधियोंको दण्ड, पापियोंका प्रायश्चित्त, पाँच प्रकारके गुप्तचर,

८३२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रजाका प्रेम या असंतोष और अन्य राजाओके व्यवहार, इन बातोपर भलीभाँति विचार करना चाहिये । मध्यम ( अपने और शत्रुदेशके बीचका राजा ) का व्यवहार, विजिगीषु ( अपनेको जीतनेके लिये आनेवाले राजा ) का कर्म तथा उदासीन और शत्रु की कार्यवाहियोपर पूरी दृष्टि रखनी चाहिये । द्वादश राजन्य-मण्डलकी चार मूल-प्रकृतियाँ हैं— (१) मध्यस्थ, (२) विजिगीषु, (३) उदासीन और (४) शत्रु । अर्थात् इनके वशमें रहनेसे सभी राष्ट्र वशमें रहते हैं । आठ और प्रकृतियाँ हैं—मित्र, शत्रु-मित्र, मित्र-मित्र, अरि-मित्र, आक्रन्द, पाष्णिग्राह, आक्रन्दासार और पाष्णिग्राहासार । इन प्रत्येककी मन्त्री, राष्ट्र (प्रजा), दुर्ग, खजाना और शासन-विभाग—ये पाँच-पाँच प्रकृतियाँ होती हैं, इस तरह ६० प्रकृतियाँ हुई । और मूल १२ मिलकर सब ७२ हो गयीं । अपनी चारो ओरकी सीमाके राजा तथा उनके मित्रोंको शत्रु समझना चाहिये । उनसे आगेके राजाओको अपना मित्र और उनसे भी आगेके राजाओको उदासीन समझना चाहिये । इन सबको साम, दान, भेद और दण्ड—इन प्रत्येक उपायोसे अथवा सभी उपायोसे सबको अथवा अधिक-से-अधिक जितने बने रह सके, उनको मित्र बनाये रखना चाहिये । यद्यपि आज परिस्थिति बदली हुई है, तथापि रूपान्तरसे यह शत्रु-मित्रकी व्यवस्था आज भी अक्षुण्ण ही है । संधि, विग्रह (लड़ाई), यान (चढ़ाई), आसन (किलेके अदर ही बद रहना), द्वैधीभाव (भेद) और संश्रय (किसी बलवान्‌का आश्रय)—इन छः गुणोका बराबर विचार करना चाहिये । एक साथ काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना तथा पृथक्-पृथक् काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमे होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना—ये संधिके दो भेद हैं । शुद्ध संधिमूलक ही शान्ति होती है । आस्तिकता तथा धर्म-प्रधानताके बिना संधियाँ अनेक हेतुओसे अव्यवस्थित रहती हैं, इसीलिये शान्ति भी अव्यवस्थित रहती है । अतः धर्मनिष्ठा तथा आस्तिकता ही शुद्ध संधि एवं स्थिर शान्तिका मूल मन्त्र है । अपने विजयके लिये लड़ना और मित्रकी हानिके निमित्त मित्रके शत्रुसे लड़ना—ये विग्रहके दो भेद हैं । आपद्ग्रस्तशत्रुको देखकर उसपर अकेले चढ़ाई करना अथवा मित्रकी सहायतासे चढ़ाई करना—ये यानके दो भेद हैं । सैन्य-बल कमजोर देखकर किलामें रह जाना अथवा मित्रके अनुरोधसे किलामे रह जाना— ये आसनके दो भेद हैं । सेनामें फूट डाल देना अथवा दो मित्र राजाओमें फूट डाल देना—ये भेदनीतिके दो प्रभेद हैं । शत्रुसे पीड़ित होकर किसी बलवान्‌का आश्रय लेना अथवा शत्रु पीड़ा न पहुँचावे इसलिये किसी बलवान्‌का आश्रय लेना—यह दो प्रकारका संश्रय है ।

उपसंहार ८३३ संधि करनेसे भले ही थोड़ी तात्कालिक पीड़ा हो, किन्तु भविष्यमें लाभ हो तो संधि अवश्य कर लेनी चाहिये। जब सारी प्रकृति सन्तुष्ट हो और कोष तथा युद्धके साधन पर्याप्त हो, तब युद्ध करना चाहिये। जब अपनी सेना हृष्ट-पुष्ट- सन्तुष्ट हो और शत्रुसेना दुर्बल तथा असन्तुष्ट हो, तब भी युद्ध करना चाहिये। जब सेना, वाहन और कोष क्षीण हो तो शत्रुसे समझौतेकी बातचीत करते हुए अपने दुर्गमें ही रहना चाहिये। जब राजा देखे कि शत्रु बलवान् है तब अपनी सेनाका दो विभागकर एक विभाग लड़ाईपर भेजे और एक विभागको शत्रु की सेनामें भेजकर शत्रु-सेनाके लोगोंको अपनी ओर मिला लेना चाहिये। यदि राजा देखे कि शत्रु अब हमें जीत लेगा, तो झट किसी ऐसे बलवान् धर्मात्मा राजाका आश्रय ले ले जो अपनी दुष्ट प्रजा और शत्रुको भी दण्ड दे सकता हो तथा गुरुके समान प्रत्येक प्रकारसे उसकी सेवा करनी चाहिये। यदि उसका आश्रय लेनेपर भी कोई लाभ न हो, अपितु हानि होनेकी ही सम्भावना हो, तो बेखटके युद्ध ही करना चाहिये। गुण-दोष विचारकर भविष्यका निर्णय करनेवाले, वर्तमान-निर्णय

सन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसञ्ज्ञकः । स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ॥ अमात्यः साधु लिखितमित्येतद् प्राग् लिखेद्यम् । सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ॥ सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम् । अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ॥ अङ्गीकर्तव्यमिति- च युवराजो लिखेत् स्वयम् । लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहितः । स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ( शुक्रनीति २ । ३५५-३५९ ) मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोको लेकर विचार करना चाहिये । फिर जो बहुमत हो उसे स्वीकार करना चाहिये-- पृथक्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् । विमृशेत् स्वमतेनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम् ॥ जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है । जो प्रजाका रक्षक बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये-- अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः । स संहृत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ( शुक्रनीति ) इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृङ्खल नहीं होता था । आजके लोकतन्त्र-शासनका आधार मुण्ड-गणना है । इसके अनुसार योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता है । बहुमत जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमे शासनसूत्र आ जाता है । विधान-सभा एव लोक- सभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना । पर स्थिति यह है कि भारतमें सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं जो कानूनसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं । उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य वकीलोंका सहारा लेते हैं; परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं । साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदो एव मन्वादि धर्मशास्त्रोको ही राष्ट्रका संविधान एव कानून मानते हैं । उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञ एवं सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान-निर्णेत्री है, विधान-निर्मात्री नहीं । शासन-परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है । राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने-आपको शास्त्र एव आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा विनयसे युक्त बनाये । पुनः अपने पुत्रो, मन्त्रियोको विनययुक्त बनाये, पश्चात् भृत्यो एव प्रजाको विनययुक्त बनाये-