मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८३२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रजाका प्रेम या असंतोष और अन्य राजाओके व्यवहार, इन बातोपर भलीभाँति विचार करना चाहिये । मध्यम ( अपने और शत्रुदेशके बीचका राजा ) का व्यवहार, विजिगीषु ( अपनेको जीतनेके लिये आनेवाले राजा ) का कर्म तथा उदासीन और शत्रु की कार्यवाहियोपर पूरी दृष्टि रखनी चाहिये । द्वादश राजन्य-मण्डलकी चार मूल-प्रकृतियाँ हैं— (१) मध्यस्थ, (२) विजिगीषु, (३) उदासीन और (४) शत्रु । अर्थात् इनके वशमें रहनेसे सभी राष्ट्र वशमें रहते हैं । आठ और प्रकृतियाँ हैं—मित्र, शत्रु-मित्र, मित्र-मित्र, अरि-मित्र, आक्रन्द, पाष्णिग्राह, आक्रन्दासार और पाष्णिग्राहासार । इन प्रत्येककी मन्त्री, राष्ट्र (प्रजा), दुर्ग, खजाना और शासन-विभाग—ये पाँच-पाँच प्रकृतियाँ होती हैं, इस तरह ६० प्रकृतियाँ हुई । और मूल १२ मिलकर सब ७२ हो गयीं । अपनी चारो ओरकी सीमाके राजा तथा उनके मित्रोंको शत्रु समझना चाहिये । उनसे आगेके राजाओको अपना मित्र और उनसे भी आगेके राजाओको उदासीन समझना चाहिये । इन सबको साम, दान, भेद और दण्ड—इन प्रत्येक उपायोसे अथवा सभी उपायोसे सबको अथवा अधिक-से-अधिक जितने बने रह सके, उनको मित्र बनाये रखना चाहिये । यद्यपि आज परिस्थिति बदली हुई है, तथापि रूपान्तरसे यह शत्रु-मित्रकी व्यवस्था आज भी अक्षुण्ण ही है । संधि, विग्रह (लड़ाई), यान (चढ़ाई), आसन (किलेके अदर ही बद रहना), द्वैधीभाव (भेद) और संश्रय (किसी बलवान्का आश्रय)—इन छः गुणोका बराबर विचार करना चाहिये । एक साथ काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना तथा पृथक्-पृथक् काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमे होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना—ये संधिके दो भेद हैं । शुद्ध संधिमूलक ही शान्ति होती है । आस्तिकता तथा धर्म-प्रधानताके बिना संधियाँ अनेक हेतुओसे अव्यवस्थित रहती हैं, इसीलिये शान्ति भी अव्यवस्थित रहती है । अतः धर्मनिष्ठा तथा आस्तिकता ही शुद्ध संधि एवं स्थिर शान्तिका मूल मन्त्र है । अपने विजयके लिये लड़ना और मित्रकी हानिके निमित्त मित्रके शत्रुसे लड़ना—ये विग्रहके दो भेद हैं । आपद्ग्रस्तशत्रुको देखकर उसपर अकेले चढ़ाई करना अथवा मित्रकी सहायतासे चढ़ाई करना—ये यानके दो भेद हैं । सैन्य-बल कमजोर देखकर किलामें रह जाना अथवा मित्रके अनुरोधसे किलामे रह जाना— ये आसनके दो भेद हैं । सेनामें फूट डाल देना अथवा दो मित्र राजाओमें फूट डाल देना—ये भेदनीतिके दो प्रभेद हैं । शत्रुसे पीड़ित होकर किसी बलवान्का आश्रय लेना अथवा शत्रु पीड़ा न पहुँचावे इसलिये किसी बलवान्का आश्रय लेना—यह दो प्रकारका संश्रय है ।