मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्मान करते हैं तथा विनय ( जितेन्द्रियता, नम्रता ) भी प्राप्त होती है । अविनय ( उद्दण्डता ) से सुसमृद्ध राजा भी सपरिवार नष्ट हो जाते हैं और विनय- से जगलों में रहनेवाले कोषविहीन राजा भी राज्य पा लेते हैं । शिकार, द्यूत, दिवास्वप्न, निन्दा, स्त्री, मद ( नशा ), नृत्य, गीत, वादित्र और व्यर्थ घूमना ( हवाखोरी ), इन दश कामज व्यसनों तथा चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया ( गुणोंमें भी दोषदृष्टि ), दूसरेका धन छीन लेना, गाली-गलौज और मार-पीट— इन आठ क्रोधज व्यसनोंसे तथा इन दोनोंके मूल लोभसे राजाको अत्यन्त बचना चाहिये । कामज व्यसनमें मदिरापान, द्यूत, स्त्री और मृगया—ये चार तथा क्रोधज व्यसनमें गाली-गलौज, मारपीट और दूसरेका धन छीन लेना ये तीन बहुत ही भयंकर हैं । इनसे तो सर्वथा बचना चाहिये । अत्यन्त सुकर कर्म भी एक असहाय पुरुषद्वारा दुष्कर होता है । अतः राजाको शास्त्रज्ञानी शूर, लब्धप्रतिष्ठ, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री रखने चाहिये । संधि, विग्रह, सेना, खजाना, खेती, खान, रक्षा ( बन्दोवस्त ) आदिके विषयमें पृथक्-पृथक् प्रत्येककी राय जानकर विद्वान् ब्राह्मणके साथ विचारकर निर्णय करना चाहिये । राज्यका काम जितने लोगोंसे अच्छी तरहसे चल सके, उतने लोगोंको परीक्षा करके उपमन्त्री बनाना चाहिये । खान, चुंगी और कर वसूल करनेके लिये शूर पवित्र निर्लोभ लोगोंको और पापभीरु लोगोंको घर आदिके प्रबन्ध- सम्बन्धी काममें लगाना चाहिये । इसी तरह सर्वशास्त्र विशारद इङ्गित आकार और चेष्टा जाननेवाला पवित्र कुशल कुलीनको दूत बनाना चाहिये । दूत-अनुरक्त, पवित्र, चतुर, स्मृतिशाली, प्रतिभासम्पन्न, देश-काल—परिस्थितिका ज्ञाता, सुन्दर, निर्भीक और वाग्मी होना चाहिये । सेनापतिके अधीन चतुरङ्गिणी सेना, सेनाके अधीन युद्ध तथा विनय सिखाना, राजाके अधीन खजाना और राज्य तथा दूतके अधीन संधि विग्रह होते हैं । दो राजाओंमें मेल कराना या मिले हुए राजाओंको परस्पर लड़ा देना, यह दूतका काम है। कृषक जैसे खेतमेसे घासको निकालकर धान्यकी रक्षा करता है, उसी तरह राजा दुष्टोंका निग्रहकर प्रजाकी रक्षा करे । जैसे शरीरको कष्ट देनेसे प्राणोंका क्षय होता है, उसी तरह राष्ट्रको पीड़ा पहुँचानेसे राजाके प्राणोंका क्षय होता है । जो राजा अज्ञानवश राष्ट्रको पीड़ा पहुँचाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसमेत जीवनसे भ्रष्ट हो जाता है । राजाको लगानवसूली, नौकरोंका मासिक वेतन, मन्त्री आदिको बाहर भेजना, किसीको हानिकर काम करनेसे रोकना, किसी कामको कराना, मुकद्दमो- का निर्णय, अपराधियोंको दण्ड, पापियोंका प्रायश्चित्त, पाँच प्रकारके गुप्तचर,