मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
सम्मान करते हैं तथा विनय ( जितेन्द्रियता, नम्रता ) भी प्राप्त होती है । अविनय ( उद्दण्डता ) से सुसमृद्ध राजा भी सपरिवार नष्ट हो जाते हैं और विनय- से जगलों में रहनेवाले कोषविहीन राजा भी राज्य पा लेते हैं । शिकार, द्यूत, दिवास्वप्न, निन्दा, स्त्री, मद ( नशा ), नृत्य, गीत, वादित्र और व्यर्थ घूमना ( हवाखोरी ), इन दश कामज व्यसनों तथा चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया ( गुणोंमें भी दोषदृष्टि ), दूसरेका धन छीन लेना, गाली-गलौज और मार-पीट— इन आठ क्रोधज व्यसनोंसे तथा इन दोनोंके मूल लोभसे राजाको अत्यन्त बचना चाहिये । कामज व्यसनमें मदिरापान, द्यूत, स्त्री और मृगया—ये चार तथा क्रोधज व्यसनमें गाली-गलौज, मारपीट और दूसरेका धन छीन लेना ये तीन बहुत ही भयंकर हैं । इनसे तो सर्वथा बचना चाहिये । अत्यन्त सुकर कर्म भी एक असहाय पुरुषद्वारा दुष्कर होता है । अतः राजाको शास्त्रज्ञानी शूर, लब्धप्रतिष्ठ, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री रखने चाहिये । संधि, विग्रह, सेना, खजाना, खेती, खान, रक्षा ( बन्दोवस्त ) आदिके विषयमें पृथक्-पृथक् प्रत्येककी राय जानकर विद्वान् ब्राह्मणके साथ विचारकर निर्णय करना चाहिये । राज्यका काम जितने लोगोंसे अच्छी तरहसे चल सके, उतने लोगोंको परीक्षा करके उपमन्त्री बनाना चाहिये । खान, चुंगी और कर वसूल करनेके लिये शूर पवित्र निर्लोभ लोगोंको और पापभीरु लोगोंको घर आदिके प्रबन्ध- सम्बन्धी काममें लगाना चाहिये । इसी तरह सर्वशास्त्र विशारद इङ्गित आकार और चेष्टा जाननेवाला पवित्र कुशल कुलीनको दूत बनाना चाहिये । दूत-अनुरक्त, पवित्र, चतुर, स्मृतिशाली, प्रतिभासम्पन्न, देश-काल—परिस्थितिका ज्ञाता, सुन्दर, निर्भीक और वाग्मी होना चाहिये । सेनापतिके अधीन चतुरङ्गिणी सेना, सेनाके अधीन युद्ध तथा विनय सिखाना, राजाके अधीन खजाना और राज्य तथा दूतके अधीन संधि विग्रह होते हैं । दो राजाओंमें मेल कराना या मिले हुए राजाओंको परस्पर लड़ा देना, यह दूतका काम है। कृषक जैसे खेतमेसे घासको निकालकर धान्यकी रक्षा करता है, उसी तरह राजा दुष्टोंका निग्रहकर प्रजाकी रक्षा करे । जैसे शरीरको कष्ट देनेसे प्राणोंका क्षय होता है, उसी तरह राष्ट्रको पीड़ा पहुँचानेसे राजाके प्राणोंका क्षय होता है । जो राजा अज्ञानवश राष्ट्रको पीड़ा पहुँचाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसमेत जीवनसे भ्रष्ट हो जाता है । राजाको लगानवसूली, नौकरोंका मासिक वेतन, मन्त्री आदिको बाहर भेजना, किसीको हानिकर काम करनेसे रोकना, किसी कामको कराना, मुकद्दमो- का निर्णय, अपराधियोंको दण्ड, पापियोंका प्रायश्चित्त, पाँच प्रकारके गुप्तचर,
८३२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रजाका प्रेम या असंतोष और अन्य राजाओके व्यवहार, इन बातोपर भलीभाँति विचार करना चाहिये । मध्यम ( अपने और शत्रुदेशके बीचका राजा ) का व्यवहार, विजिगीषु ( अपनेको जीतनेके लिये आनेवाले राजा ) का कर्म तथा उदासीन और शत्रु की कार्यवाहियोपर पूरी दृष्टि रखनी चाहिये । द्वादश राजन्य-मण्डलकी चार मूल-प्रकृतियाँ हैं— (१) मध्यस्थ, (२) विजिगीषु, (३) उदासीन और (४) शत्रु । अर्थात् इनके वशमें रहनेसे सभी राष्ट्र वशमें रहते हैं । आठ और प्रकृतियाँ हैं—मित्र, शत्रु-मित्र, मित्र-मित्र, अरि-मित्र, आक्रन्द, पाष्णिग्राह, आक्रन्दासार और पाष्णिग्राहासार । इन प्रत्येककी मन्त्री, राष्ट्र (प्रजा), दुर्ग, खजाना और शासन-विभाग—ये पाँच-पाँच प्रकृतियाँ होती हैं, इस तरह ६० प्रकृतियाँ हुई । और मूल १२ मिलकर सब ७२ हो गयीं । अपनी चारो ओरकी सीमाके राजा तथा उनके मित्रोंको शत्रु समझना चाहिये । उनसे आगेके राजाओको अपना मित्र और उनसे भी आगेके राजाओको उदासीन समझना चाहिये । इन सबको साम, दान, भेद और दण्ड—इन प्रत्येक उपायोसे अथवा सभी उपायोसे सबको अथवा अधिक-से-अधिक जितने बने रह सके, उनको मित्र बनाये रखना चाहिये । यद्यपि आज परिस्थिति बदली हुई है, तथापि रूपान्तरसे यह शत्रु-मित्रकी व्यवस्था आज भी अक्षुण्ण ही है । संधि, विग्रह (लड़ाई), यान (चढ़ाई), आसन (किलेके अदर ही बद रहना), द्वैधीभाव (भेद) और संश्रय (किसी बलवान्का आश्रय)—इन छः गुणोका बराबर विचार करना चाहिये । एक साथ काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना तथा पृथक्-पृथक् काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमे होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना—ये संधिके दो भेद हैं । शुद्ध संधिमूलक ही शान्ति होती है । आस्तिकता तथा धर्म-प्रधानताके बिना संधियाँ अनेक हेतुओसे अव्यवस्थित रहती हैं, इसीलिये शान्ति भी अव्यवस्थित रहती है । अतः धर्मनिष्ठा तथा आस्तिकता ही शुद्ध संधि एवं स्थिर शान्तिका मूल मन्त्र है । अपने विजयके लिये लड़ना और मित्रकी हानिके निमित्त मित्रके शत्रुसे लड़ना—ये विग्रहके दो भेद हैं । आपद्ग्रस्तशत्रुको देखकर उसपर अकेले चढ़ाई करना अथवा मित्रकी सहायतासे चढ़ाई करना—ये यानके दो भेद हैं । सैन्य-बल कमजोर देखकर किलामें रह जाना अथवा मित्रके अनुरोधसे किलामे रह जाना— ये आसनके दो भेद हैं । सेनामें फूट डाल देना अथवा दो मित्र राजाओमें फूट डाल देना—ये भेदनीतिके दो प्रभेद हैं । शत्रुसे पीड़ित होकर किसी बलवान्का आश्रय लेना अथवा शत्रु पीड़ा न पहुँचावे इसलिये किसी बलवान्का आश्रय लेना—यह दो प्रकारका संश्रय है ।
उपसंहार ८३३ संधि करनेसे भले ही थोड़ी तात्कालिक पीड़ा हो, किन्तु भविष्यमें लाभ हो तो संधि अवश्य कर लेनी चाहिये। जब सारी प्रकृति सन्तुष्ट हो और कोष तथा युद्धके साधन पर्याप्त हो, तब युद्ध करना चाहिये। जब अपनी सेना हृष्ट-पुष्ट- सन्तुष्ट हो और शत्रुसेना दुर्बल तथा असन्तुष्ट हो, तब भी युद्ध करना चाहिये। जब सेना, वाहन और कोष क्षीण हो तो शत्रुसे समझौतेकी बातचीत करते हुए अपने दुर्गमें ही रहना चाहिये। जब राजा देखे कि शत्रु बलवान् है तब अपनी सेनाका दो विभागकर एक विभाग लड़ाईपर भेजे और एक विभागको शत्रु की सेनामें भेजकर शत्रु-सेनाके लोगोंको अपनी ओर मिला लेना चाहिये। यदि राजा देखे कि शत्रु अब हमें जीत लेगा, तो झट किसी ऐसे बलवान् धर्मात्मा राजाका आश्रय ले ले जो अपनी दुष्ट प्रजा और शत्रुको भी दण्ड दे सकता हो तथा गुरुके समान प्रत्येक प्रकारसे उसकी सेवा करनी चाहिये। यदि उसका आश्रय लेनेपर भी कोई लाभ न हो, अपितु हानि होनेकी ही सम्भावना हो, तो बेखटके युद्ध ही करना चाहिये। गुण-दोष विचारकर भविष्यका निर्णय करनेवाले, वर्तमान-निर्णय
सन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसञ्ज्ञकः । स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ॥ अमात्यः साधु लिखितमित्येतद् प्राग् लिखेद्यम् । सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ॥ सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम् । अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ॥ अङ्गीकर्तव्यमिति- च युवराजो लिखेत् स्वयम् । लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहितः । स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ( शुक्रनीति २ । ३५५-३५९ ) मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोको लेकर विचार करना चाहिये । फिर जो बहुमत हो उसे स्वीकार करना चाहिये-- पृथक्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् । विमृशेत् स्वमतेनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम् ॥ जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है । जो प्रजाका रक्षक बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये-- अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः । स संहृत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ( शुक्रनीति ) इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृङ्खल नहीं होता था । आजके लोकतन्त्र-शासनका आधार मुण्ड-गणना है । इसके अनुसार योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता है । बहुमत जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमे शासनसूत्र आ जाता है । विधान-सभा एव लोक- सभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना । पर स्थिति यह है कि भारतमें सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं जो कानूनसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं । उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य वकीलोंका सहारा लेते हैं; परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं । साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदो एव मन्वादि धर्मशास्त्रोको ही राष्ट्रका संविधान एव कानून मानते हैं । उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञ एवं सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान-निर्णेत्री है, विधान-निर्मात्री नहीं । शासन-परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है । राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने-आपको शास्त्र एव आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा विनयसे युक्त बनाये । पुनः अपने पुत्रो, मन्त्रियोको विनययुक्त बनाये, पश्चात् भृत्यो एव प्रजाको विनययुक्त बनाये-
उपसंहार ८३५ आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत् । ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यान् ततो भृत्यान् ततः प्रजाः ॥ ( शुक्रनी० १ । ९८ ) राजाको व्यसनमुक्त होना चाहिये । कठोर भाषण, उग्र दण्ड, अर्थ- दूषण, सुरापान, स्त्री, मृगया और द्यूत--ये राजाके लिये भीषण व्यसन हैं । पीछे अष्टादश व्यसनोंकी चर्चा आयी ही है-- वाग्दण्डयोश्च पारुष्यमर्थदूषणमेव च । पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनानि महीपतेः ॥ ( कामन्दकीयनीतिसार १४ । ६ ) मन्त्रीके लिये भी ये सब दूषण हैं । आलस्य, स्तब्धता, घमण्ड, प्रमाद, वैरकारिता आदि ये और भी मन्त्रीके व्यसन हैं । दक्षता, शीघ्रता, अमर्ष, शौर्य एवं उत्साह आदि गुणोंसे युक्त ही राजा होना चाहिये-- दाक्ष्यं जैघ्र्यं तथामर्षः शौर्यं चोत्साहलक्षणम् । गुणैरेतैरुपेतः सन् राजा भवितुमर्हति ॥ ( कामन्दकीयनीति० ४ । २३ ) मन्त्रियोंके उपयोगी और भी बहुत-से गुण कहे गये हैं । जिनके बिना शासन करनेकी योग्यता ही नहीं हो सकती है । स्वावग्रहो जानपद कुलशीलग्लान्वितः । वाग्मी प्रगल्भश्चक्षुष्मानुत्साही प्रतिपत्तिमान् ॥ स्तम्भचापलहीनश्च मैत्रः क्लेशसहः शुचिः । सत्यसत्त्वधृतिस्थैर्यप्रभावारोग्यसंयुतः ॥ कृतशिल्पश्च दक्षश्च प्रज्ञावान् धारणान्वितः । दृढभक्तिरकर्ता च वैराणां मन्त्रिणो भवेत् ॥ स्मृतिस्तत्परतार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चयः । दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिसम्पत्प्रकीर्तिता ॥ ( कामन्दकीयनीति० ४ । २८-३१ ) आत्मनियन्त्रित, स्वदेशस्थ, कुलीन, शीलवान्, बलवान्, वाग्मी, निर्भीक, शास्त्रज्ञ, उत्साही, प्रत्युत्पन्नमति, निरभिमान, अचञ्चल, मैत्रीवर्धक, सहिष्णु, पवित्र, धैर्य-स्थैर्य-सत्य एवं सत्त्वसे युक्त, प्रतापी, नीरोग, शिल्पज्ञ, दक्ष, बुद्धिमान्, धारणावान्, स्वामिभक्त तथा उससे कभी वैर-विद्वेष न करनेवाला सचिव होता है । स्मृतिमान्, पुरुषार्थ-तत्पर, विचारशील, निश्चित ज्ञानवाला, दृढता, मन्त्रगुप्ति, क्षमता आदि गुणोंसे युक्त मन्त्री हो । मन्त्रियोंकी योग्यता राजाको स्वयं प्रत्यक्ष देखकर, परोक्ष ( परोपदेश ) से तथा अनुमानसे ( कार्य देखकर यह जान लेना कि कितना कार्य नहीं किया ) जाननी चाहिये--
‘प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया राजवृत्तिः । स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् । परोपदिष्टं परोक्षम् । कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम् ।’ ( कौ० अर्थ० १ । ९ । ११ - १३ ) वाद, जल्प, वितण्डा, रूप कथाके प्रसङ्गसे मन्त्रीकी प्रगल्भता, निर्भीकता, प्रतिभा एवं वाक्कुशलताको जाना जाता है । उसी प्रसङ्गसे सत्यवादिताका भी पता लग जाता है । अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसङ्गवशात् प्रत्यक्षसे ही जाना जा सकता है । आपत्तिके समय उत्साह, प्रभाव तथा क्लेश, सहिष्णुता, धैर्य, अनुराग, स्थिरताका परिज्ञान होता है । भक्ति, मैत्री तथा स्थिरताका परिज्ञान व्यवहारसे करना चाहिये— उत्साहं च प्रभावं च तथा क्लेशसहिष्णुताम् । धृतिं चैवानुरागं च स्थैर्यं चापदि लक्षयेत् ॥ भक्तिं मैत्रीं च शौचं च जानीयाद् व्यवहारात । ( काम० नीतिसार ४ । ३७-३८ ) मन्त्रीकी शास्त्रज्ञता एवं शिल्पज्ञता तत्-तद् विद्याओके विद्वानोंसे जानना चाहिये । उसके स्वजनोंसे कुल, स्थान एवं संयमका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । कर्ममें प्रयुक्तकर दक्षता, विज्ञान एवं धारयिष्णुताकी परीक्षा होती है । सहवासियों, पड़ोसियोंसे उसके बल, सत्त्व (शक्ति), आरोग्य, शील, अस्तब्धता एवं अचापलका ज्ञान हो सकता है । दारुण कृच्छ्र उत्पन्न होनेपर उसकी कुलीनताका ज्ञान हो सकता है, क्योंकि दारुण अवसरपर ही स्वच्छहृदय कुलीन अपनी विशेषताको दिखलाता है— साधुतैषाममात्यानां तद्विद्येभ्यस्तु बुद्धिमान् । चक्षुष्मत्तां च शिल्पं च परीक्षेत गुणद्वयम् ॥ स्वजनेभ्यो विजानीयात् कुलं स्थानमवग्रहम् । परिकर्मसु दाक्ष्यं च विज्ञानं धारयिष्णुताम् ॥ गुणत्रयं परीक्षेत प्रागल्भ्यं प्रतिभां तथा । संवासिभ्यो बलं सत्त्वमारोग्यं शीलमेव च । अस्तब्धतामचापल्यं वैरिणां चापि कर्तृताम् ॥ समुत्पन्नेषु कृच्छ्रेषु दारुणेष्वप्यसंशयम् । दर्शयत्यच्छहृदयः कुलीनश्चतुरस्रताम् ॥ ( काम० नी० ४ । ३४ - ३६; ३९, ६९ ) आचार्य, संत, महात्मा और विद्वान् ही विद्याओके प्रकाशक, प्रवर्तक तथा संचालक होते हैं । राजा भी विद्वानोंसे ही राजनीतिका विज्ञान प्राप्त करता है । इसीलिये स्वराज्यकी स्थापनामें मित्र-लाभादिसे भी प्रथम विद्या-चिन्तनका ही निर्देश किया गया है; क्योकि सम्पूर्ण लोकस्थिति ही विद्यापर निर्भर होती है । तत्रायं प्रथमोपाय. यद् विद्यावृद्धैः सार्धं विद्याचिन्ता । विद्याप्रति- बद्धत्वाल्लोकस्थितेः ॥ ( नीतिवाक्यामृत )
८३७ उपसंहार राजाको सक्रिय विद्वानोंके साथ बैठकर विनययुक्त होकर आन्वीक्षिकी, त्रयी वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्तां दण्डनीतिं च पार्थिवः । तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेद् विनयान्वितः ॥ (का० नी० २ । १) वात्स्यायनने भी भूमि, हिरण्य, पशु, धान्य, भाण्डोपस्कर मित्रादिके पहले विद्याके ही उपार्जन एवं वर्धनको अर्थ माना है—विद्याभूमिहिरण्यपशुधान्य- भाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जितस्य विवर्धनमर्थः । (वात्स्या० कामसूत्र १।२।१०) मधुकरकी वृत्तिसे राजाका संगृहीत कोष भी अपने उपभोगार्थ न होकर प्रजाहितार्थ ही होना चाहिये। शास्त्रधर्मनियन्त्रित शासन ही रामराज्य है। इसमें प्रजाकी रुचि तथा सम्मतिका पूरा ध्यान रखा जाता है, तथापि शास्त्र एवं धर्मविरुद्ध बहुमतके आधारपर कोई अनर्थ नहीं किया जाता । फिर भी जहाँ अनेक जाति उपजाति तथा सम्प्रदायके लोग बसते हों, वहाँ सबके धर्म, संस्कृतिकी रक्षा होनी चाहिये । किसीके देवस्थान, धर्मग्रन्थ, आचार्य एवं आचार व्यवहारकी अव- हेलना कदापि न होनी चाहिये । सभीके धर्मका निर्णय उन-उन सम्प्रदायोंके धर्मग्रन्थों तथा धर्माचार्योपर ही छोड़ा जाना चाहिये । शासनका उसमें हस्तक्षेप न होना चाहिये। राष्ट्रके परमोपकारक गोवंशका सभी दृष्टिसे पालन होना चाहिये । उसका वध सर्वथा अवरुद्ध होना रामराज्यकी विशेषता है। देशको सर्वथा अखण्ड रखना चाहिये । प्रान्तों या राज्योंको अपने घरेलू मामलोंमे स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । पर राष्ट्रहितके व्यापक कार्यमें सम्पूर्ण देशकी एक नीति रहनी चाहिये । राजा या राष्ट्रपति किंवा शासनपरिषद्के नीचे आठ विद्वानोंकी एक परिषद् होनी चाहिये । ये विद्वान् वेद, धर्मशास्त्र, राजनीति, समाजनीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि विद्याओं तथा विविध भाषाओ एवं देशविदेशकी नीतिके वेत्ता हों । यदि सभी सब विषयोंके ज्ञाता न भी हों तथापि पूरी परिषद् मिलकर उपर्युक्त विषयोंकी पूरी जानकारी अवश्य रखे । परिषद्के सदस्य अपनी सहायताके लिये पृथक्-पृथक् परामर्शसमिति भी रख सकते हैं। प्रजाकी सम्मति, रुचि तथा आन्तरिक स्थिति एवं शासनप्रणालीके सुपरिणाम, दुष्परिणाम जाननेके लिये एक लोकसभा होनी चाहिये । उसके सदस्य प्रजाप्रिय हों । उन्हें प्रजाकी सम्मतिसे उपर्युक्त अमात्य परिषद् ही नियुक्त करेगी । मुण्डगणनाके आधारपर यह कार्य न होना चाहिये । राजा, प्रजा, अमात्यमण्डल सभीमें ईश्वरपरायणता और धर्मनिष्ठा होनेसे शासनव्यवस्था ठीक चल सकेगी। वैसा न होनेसे छल, कपट तथा मिथ्या आचरणका ही बोलबाला रहेगा । धर्मनिष्ठाके बिना कानूनकी वञ्चना ही
८३८ मार्क्सवाद और रामराज्य जाती है। परंतु यदि धर्मनिष्ठा है, तो अपराधी स्वयं अपराध व्यक्त करके शुद्धिके लिये दण्ड माँगता है । भारतमें आज भी गोहत्या आदि होनेपर अपराधी 'मिताक्षरासे' व्यवस्था माँगने स्वयं जाता है । वैसे तो सभीको धर्मात्मा तथा ईश्वरविश्वासी होना चाहिये । विशेषकर अमात्यमण्डल और उससे भी अधिक राजाको वैसा अवश्य होना चाहिये । गुणवान् पुरुष थोड़े होनेसे दुर्लभ होते हैं । अतः जहाँतक हो सके, अधिकार थोड़े ही लोगोंके हाथमें होने चाहिये । इसीलिये राजा और अमात्योंका हर समय बदलते रहना ठीक नहीं, यही राजतन्त्रका अभिप्राय है । युद्ध आदिके समय लोकतन्त्रमें भी एकहीके हाथमें अधिकार देने पड़ते हैं। अधिक लोगोंकी अपेक्षा थोड़े लोगोंको साधु-सज्जन बनानेमें सरलता होती है । यदि वंशपरम्पराका राजा हो, तो वह अपने ऊपर अधिक जिम्मेदारीका अनुभव करता है । अतः यथासम्भव वैसा ही राजा होना चाहिये । यदि वैसा न मिले, तो किसी योग्य व्यक्तिको राष्ट्रपति बनाना चाहिये । शीघ्र बदलते रहनेसे किसी योग्य व्यक्तिको भी अपनी नीति कार्यान्वित करनेका पूरा समय नहीं मिल पाता । इसके अतिरिक्त सामान्य व्यक्तिको थोड़े ही दिनोंमें स्वार्थसिद्धिकी चिन्ता लग जाती है, जिससे प्रजाके कल्याणमें बाधा पड़ती है । अतः यह आवश्यक है कि राजा या राष्ट्रपतिको जीवनपर्यन्त या दीर्घकालके लिये नियुक्त किया जाय । किंतु कर्त्तव्यच्युत होनेपर उसको हटाना आवश्यक है। राजाके स्थानकी पूर्ति उसका योग्य उत्तराधिकारी न होनेपर मन्त्रियोंद्वारा होनी चाहिये । मन्त्रिमण्डलमें किसीकी मृत्यु होने अथवा किसीके हटानेपर शेष मन्त्रियोंके परामर्शसे राजाको नयी नियुक्ति करनी चाहिये । राजा, अमात्य, कोष, सेना और न्याय—ये राज्यके पाँच मुख्य विषय हैं। ग्राम, मण्डल, प्रान्तके भेदसे उत्तरोत्तर अधिक शक्तिशाली अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । कोषके लिये सर्वत्र कर-संग्रह विभाग रहने चाहिये । रक्षा- विभाग तथा न्यायविभागकी भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये । रक्षाके लिये सेना दो प्रकारकी होनी चाहिये—एक वह जो प्रतिदिनकी शान्ति स्थापित रखे अर्थात् पुलिस और दूसरी वह, जो विशेष अवसरपर शत्रुके साथ युद्ध करे । न्यायालय प्रत्येक विभागके लिये पृथक्-पृथक् होना चाहिये । मण्डल और प्रान्तमें बड़े-बड़े न्यायालय और सम्पूर्ण राष्ट्रका एक सर्वोच्च न्यायालय होना चाहिये । अन्तिम न्यायालयमें अमात्यमण्डल तथा राजाको न्याय करनेका अधिकार होना चाहिये । न्यायाध्यक्षके पदपर धर्मात्मा, विद्वान् तथा सदा- चारी व्यक्तियोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सम्पूर्ण स्थितिका पूर्ण परिचय रखनेके लिये गुप्तचरविभाग होना चाहिये । उसका कार्य केवल अपराधी या
उपसंहार ८३०
राजाके विरोधियोंका पता लगाना ही नहीं, किंतु लोकसेवी, परोपकारी, सदा- चारी विद्वानों तथा दुखी आर्तोके सम्बन्धमें भी सरकारको सूचित करते रहना चाहिये, जिससे निग्रहानुग्रह आदिमें पूरी सहायता मिल सके । कोषका उपयोग उपर्युक्त विभागोंके सचालन, शस्त्रास्त्रनिर्माण तथा सग्रह, यातायात- साधनोंका निर्माण तथा व्यवस्था और राष्ट्रके स्वास्थ्य तथा शिक्षा आदिमें होना चाहिये प्रचार, यातायात, परराष्ट्रसम्बन्ध एक विभागमे, डाक, तार, शिक्षा, स्वास्थ्य दूसरेसे और उद्योग, खाद्य आदि तीसरे विभागसे सम्बद्ध हों तो अच्छा है । इसी तरह कोष, न्याय एव सेनाकी व्यवस्था होनी चाहिये । आजकल एक सबसे बडा विभाग व्यवस्थापनका अर्थात् कानून बनानेका है, जिसके लिये धारासभाओका निर्वाचन होता है । परन्तु अपने यहाँ तो इसकी आवश्यकता ही नहीं। केवल विशिष्ट विद्वानोंकी एक निर्णेत्री परिषद् होनी चाहिये, जो मनु, याज्ञवल्क्य, वृहस्पति, नारद, अङ्गिरा, पराशर आदिके मतानुसार ठीक-ठीक व्यवस्था दे सके । अहिंदुओके लिये उनके धर्मशास्त्रा- नुसार उनके आचार्योंकी व्यवस्था होनी चाहिये । भारतीय धर्मशास्त्र और राजनीतिके सम्यक् विद्वान् ही व्यवहारमें शास्त्रार्थके अधिकारी होंगे । व्यवहार- निर्णायक न्यायाध्यक्ष स्वधर्मनिष्ठ एवं ईश्वर-विश्वासी होना चाहिये । अमात्य- मण्डलको राजाके आज्ञानुसार सभी कर्मचारियोके नियोजन, पृथक्करण, संशोधन आदिका अधिकार होना चाहिये । गुप्तचरोंके अतिरिक्त विशिष्ट व्यक्तियोंकी एक अन्वेषण-समितिद्वारा जटिल विषयोंकी जानकारी प्राप्त करनेका प्रयत्न होना चाहिये । अमात्यमण्डलके सदस्य और राजा सर्वसाधारणके लिये दुर्दर्श, दुर्लभ न होकर सुदर्श और सुलभ रहे, जिसमें प्रजा उनसे अपनी स्थिति निवेदन कर सके । ऐसे अनेक स्थान होने चाहिये, जहाँ नियतसमयपर अर्थी आकर अमात्यों या राजासे मिल सके । मन्त्री तथा राजाओंको भी गुप्त वेषसे प्रजाकी स्थिति तथा राजकर्मचारियोंका व्यवहार जानना चहिये । इस मार्गसे गुप्त तथा जटिल रहस्योंका भी पता लग सकता है । हिंसा मद्यपान, व्यभिचार, द्यूत आदिपर कडा नियन्त्रण होना चाहिये । प्रत्येक पदपर सच्चे और शुद्ध अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । पुलिस प्रजाकी सेवक बनकर नम्रतापूर्वक काम करे, पर साथ ही दुष्टदमनार्थ आवश्यक उग्रताका निषेध न होना चाहिये । प्राचीन ढगपर ग्रामपचायतें विधिवत् स्थापित होनी चाहिये । आपसी झगड़े वही तय हुआ करे, जिसमे न्यायालय जानेकी आवश्यकता ही न पड़े । पंचायतोंका काम ठीक होता है या नहीं, इसकी देख-रेखके लिये एक निरीक्षक-विभाग होना चाहिये । क्रय विक्रयके सम्बन्धमें यथासम्भव ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये कि अन्नवाले अन्न, तेलवाले तेल, गुड़वाले गुड़ दें । नाई, धोवी आदि अपना काम करें जिसके बदलेमें
८४० मार्क्सवाद और रामराज्य उन्हे अन्न मिले । यथासम्भव नकद क्रय-विक्रयके स्थानपर वस्तु-विनिमय होना चाहिये और जिसका जो परम्पराप्राप्त व्यवसाय है, उसे वही करना चाहिये । इस तरह परस्पर सम्बन्ध स्थापित रखनेमें सुविधा होगी । जहाँतक हो प्रजाको विशुद्ध क्षत्रियवंशका राजा, विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित तथा महामात्य बनाना चाहिये । न्यायाध्यक्ष तथा अध्यापकके पदपर भी ब्राह्मणोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सेनापतिके पदपर पवित्र वीर क्षत्रिय तथा सैनिक भी अधिक- तर कुलीन क्षत्रिय ही होने चाहिये । कोषाध्यक्ष वैश्य तथा सेवाध्यक्ष शूद्र होने चाहिये । चर्मके व्यापारो तथा यन्त्रोंके अध्यक्ष चर्मकार होने चाहिये । शुचिता (सफाई) विभागका अध्यक्ष अन्त्यज होना चाहिये । इसी तरह प्रायः सभी यन्त्र, शिल्प, कल-कारखाने आदिपर शूद्रोंका ही प्राधान्य रहना चाहिये । सर्वसाधारणके व्यवहारमें आनेवाली राष्ट्रकी भाषा हिंदी होनी चाहिये । पर विशिष्ट विवरणोंमें संस्कृतका प्रयोग आवश्यक है । राजाको उदार, सौम्य, धार्मिक, निर्व्यसन, विद्वान्, शुद्ध तथा रहस्यज्ञ होना चाहिये । उसे वेदान्त, न्याय तथा दण्डनीतिका विद्वान् और अपने दोषोंका ज्ञाता होना चाहिये । कोई काम करनेके पहले उसपर उसे स्वयं तथा मन्त्रियोंके साथ एकान्तमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये । किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्यमें शुभ मुहूर्त्त, नीति और आथर्वणिक प्रयोगोंका उपयोग किया जा सकता है। अच्छा तो यह है कि राजा योग्य व्यक्तियोंद्वारा श्रौत-स्मार्त्त- कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे। राजाका कर्त्तव्य है कि वह अप्राप्त धन, भूमि आदि वस्तु धर्ममार्गसे प्राप्त करे, प्राप्तकी रक्षा करे तथा उन्हे बढाये और फिर उन्हे पात्रोमे प्रदान भी करे । दत्त वस्तुओंका आगामी राजाओंद्वारा भी पालन होता रहे, इसलिये दानपत्र आदिका उचित उल्लेख होना चाहिये । राज- धानी ऐसे प्रदेशमें होनी चाहिये जो रम्य हो और जहाँ मनुष्योंके लिये अन्न तथा पशुओके लिये चारा पर्याप्त मिल सके । वहाँ विस्तृत दुर्ग (किला) बनवाना चाहिये, जिसमें जन, धनकी पूर्ण रक्षा हो सके । राजाको चाहिये कि वह विद्वान् ब्राह्मणोंके प्रति क्षमाशील, शत्रुओंके प्रति क्रोधयुक्त और भृत्यवर्ग तथा प्रजाओके प्रति पिताके समान हो । प्रजाके पुण्यका छठा भाग राजाको मिलता है, अतः न्यायसे प्रजाका पालन ही राजाके लिये सबसे बड़ा धर्म और दान है । अन्यायियोंसे ठीक रक्षा न कर सकनेके कारण प्रजाके पापोंका आधा भाग राजाको मिलता है, अतः उसे सदा सावधान रहना चाहिये । राजनीतिके अयोग्यौँ, नास्तिकोंके हाथमें जाते ही विद्वानोंके भी मुँह बंद हो जाते हैं । शुक्राचार्यके पुत्र षण्डामर्क-जैसे योग्य विद्वान् भी हिरण्यकशिपु-जैसोंको ही ईश्वर बतलाने लगते हैं । वे किसी अयोग्य शासकको भी 'त्वमर्कस्त्वं सोमः' (शिवमहिम्न०) कहने लगते हैं । शासकोसे भयभीत विद्वान् स्पष्ट सत्य कहनेमे हिचकने लगते हैं ।
आचार्य, साधु-संत भी या तो चुप साध लेते हैं, या सरकारी साधुसमाजमें प्रविष्ट होकर ईश्वर गुणगानके बदले सरकारका गुणगान करने लगते हैं । गोहत्या, धर्म- हत्या, शास्त्रहत्या जैसे जघन्य कृत्योंको होते देखकर भी वे मौन रह जाते हैं और इन सबके प्रवर्तक, प्रेरक सरकारका गुणगान करते हैं। रावणकी मायासे बने अनेकों हनुमान् देखकर जैसे बन्दर भ्रममें पड़ गये कि इनमेंसे कौन रामके हनुमान् हैं, कौन रावणके हनुमान्, उसी तरह जनता भी भ्रममें पड़ जाती है कि कौन रामके साधुसंत हैं और कौन सरकारी साधुसंत ? शास्त्र एवं धर्मके नियन्त्रण शून्य उच्छृङ्खल शासक जनताके धर्मके साथ धनका भी अपहरण कर लेते हैं। राष्ट्रिय- करण, समाजीकरण आदि नामोंसे जनताकी व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदि छीन लेते हैं। जनताके व्यक्ति शासनयन्त्रके नगण्य पुर्जे बन जाते हैं। शासन- यन्त्र तानाशाह शासकोंके हाथका खिलौना बन जाता है। उच्छृङ्खल शासकोंकी इच्छा ही कानून-कायदा बन जाती है। सनातन सत्य, न्याय, विवेक, शास्त्र-मन्त्र लुप्त हो जाते हैं। धनहीन होनेके कारण जनतामे ऐसे शासनके विरोधकी भी शक्ति नहीं रह जाती। आजके सरकारी साधुसमाजका यह प्रस्ताव कि 'साधुसमाज गोहत्या- बन्दी आन्दोलनका समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि वह ऐसे अपराधी साधुओं द्वारा चलाया गया है जिनसे साधु-समाजकी सत्ताको बहुत ठेस पहुँची है' आँख खोल देनेवाला है। विश्वनाथमन्दिर-हरिजनप्रवेश, हिन्दू-विवाह, तलाक आदि प्रश्नोंपर सरकारी साधुओं एवं सरकारी पण्डितोंका चुप रहना भी एक विचित्र बात है। आचार्य कहे जानेवाले लोगोंकी भीषण निद्रा या जान-बूझकर आँख मीचनेकी बात भी इसी ओर संकेत करती है कि राजनीतिके विप्लुत होनेके बाद सब विद्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं।
राजनीतिमें किसका अधिकार
कई लोग कहते हैं कि विद्वानों, महात्माओंको राजनीतिमें नहीं पड़ना चाहिये, परंतु राजनीतिका विद्वान् होना चाहिये । वे समारोहके साथ सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं कि राजनीतिका विद्वान् होना ही विद्वान्का अन्तिम कृत्य है, पर प्रत्यक्ष राजनीतिमें भाग लेना नहीं। वे समर्थ रामदास और चाणक्यकी प्रशंसा करते हुए भी उनके कर्तृत्वको दुर्लक्ष्य करते हैं। वे लोग 'मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्' (म० शां० ६३ । २८) का भी यही अर्थ करते हैं कि 'राजनीतिके जाने बिना त्रयी डूब जाती है'। पर 'दण्डनीति' का 'दण्डनीतिज्ञान' अर्थ करना असङ्गत है। वे इस बातपर ध्यान नहीं देते कि ब्रह्मज्ञानसे भिन्न सभी ज्ञान पराङ्ग ही होते हैं, स्वतन्त्र नहीं । भट्टपादकुमारिलका स्पष्ट कहना है कि 'सर्वमेव हि विज्ञानं संस्कारत्वेन गम्यते। पराङ्गं चात्मविज्ञानादन्यमित्यवधार्यताम्॥' (त प्रवार्तिक) पीछे कहा गया है कि सक्रिय विद्वानोंसे ही राजाको आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एव दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— 'तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेत' का० नी० २ । २) ब्रह्मात्मविज्ञान तो स्वसत्तामात्रसे अविद्या, तत्कार्यका निवर्तक होनेसे पुरुषार्थरूप है । ऐसे कतिपय स्थलोंको छोड़कर अन्यत्र सर्वत्र ही ज्ञान कर्तव्यके
बिना सफल नहीं होता। 'जानाति इच्छति अथ करोति' यह क्रम प्रसिद्ध है। जाननेसे इच्छा होती है, इच्छासे क्रिया होती है। 'यः क्रियावान् स पण्डितः' (सुभा० भं०) की कहावत प्रसिद्ध ही है। प्रयोगहीन शिल्पविज्ञान एवं शस्त्रादि- विज्ञानके तुल्य प्रयोगहीन राजनीति-विज्ञान भी व्यर्थ ही रहता है। क्रियाहीन तर्क-वितर्क एवं ज्ञान-विज्ञान, बुद्धि-व्यायाममात्र ही रह जाता है। रावणके समयमें ज्ञान-विज्ञानवाले ऋषियोंकी कमी न थी। फिर भी ऋषियोंका वध चालू था। रक्तघटका उपहार देनेपर भी रावणको संतोष नहीं हुआ था। ऋषियोंकी अस्थियोंका पहाड़ लग गया था। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछा मुनिन्ह लागि अति दाया॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥ (रामचरितमानस अरण्यकाण्ड) उस समय विश्वामित्रकी सक्रिय राजनीति ही सफल हुई। उसीके द्वारा राम मैदानमें आये और दुष्टोंका दर्प-दलन करके त्रयी-धर्मकी रक्षा एवं साधु- सत्पुरुषोंका पोषण किया। हाँ, जहाँ राजनीतिके योग्य प्रयोक्ता एवं प्रयोग-साधन ठीक उपलब्ध हों, वहाँ विद्वान् केवल उपदेशमात्र कर सकता है, परंतु जहाँ प्रयोक्ता, प्रयोग-साधन नहीं, वहाँ उनका अन्वेषण एवं निर्माण भी विद्वान्का ही काम है। राजाके अभावमें यह सब उत्तरदायित्व विद्वान्पर ही आता है। 'चाणक्य' ने यही सब किया था, समर्थ रामदासने भी यही किया। शुक्र, बृहस्पति आदि भी अनेक ढंगसे सक्रिय राजनीतिका प्रवर्तन करते थे। हाँ, विद्वान् राज्याधिकारके प्रलोभनमें न पड़े, यह अवश्य ठीक है। अतः ठीक राजनीति बिना त्रयी एव तत्प्रोक्त धर्म संकटग्रस्त हो जाता है। प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून्। ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ (मनुस्मृ० ९।३२७) प्रजापतिने सृष्टि रचकर वैश्योंको पशु दिया, ब्राह्मण एवं राजाको सारी प्रजा दी। अतः राजाके अभावमें विद्वानोंपर सर्वाधिक भार आ जाता है। विद्वान्, आस्तिक, सद्गृहस्थ एवं साधु-सत्पुरुषोंके बिना राजनीति सर्वथा उच्छृङ्खल लोगोंके हाथमें चली जाती है, फिर तो गुण्डागर्दीका ही शासन होने लगता है। अतः धार्मिक लोगोंके प्रवेशसे ही समस्या हल हो सकती है। यह ठीक है कि 'सच्छिक्षा एवं सद्विद्याके प्रचारसे सद्बुद्धि होती है, सद्बुद्धिसे सदिच्छा एवं सदिच्छासे सत्प्रयत्न होता है और सत्प्रयत्न ही सब प्रकारके सत्फलोंका स्रोत होता है। परंतु आज तो शिक्षा भी स्वतन्त्र विद्वानोंके हाथमें नहीं है। जिस विचारके शासक हैं, उसी विचारका समर्थन करनेवाली आजकी शिक्षा बनती जा रही है। स्वतन्त्र विद्वान्, स्वतन्त्र विद्यालय एवं उनके छात्र भी सरकारी-शिक्षाके प्रभावसे स्पष्ट ही प्रभावित हैं। कथावाचक, मण्डलेश्वर आदि भी उसी ढंगकी कथा कहनेमें लाभका अनुभव करते हैं। घोर नास्तिक उच्छृङ्खल मिनिस्टरों, सरकारी पदाधिका-
रियोंकी भी विद्वान्, महन्त, मण्डलेश्वर प्रशंसा करते फिरते हैं। इस दृष्टिसे नास्तिकोंके हाथसे राजनीतिका उद्धार करना योग्य धार्मिक, सुशील लोगोंके हाथमें राजनीति लानेके लिये विद्वान्का प्रयत्न अत्यावश्यक है ही। महाभारतका स्पष्ट वचन है— क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्त पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ (महा० शां० ६४ । १०१) परमेश्वरसे सर्वप्रथम राजधर्मका ही आविर्भाव हुआ। उसके पीछे राजधर्मके अङ्गभूत अन्य धर्मोंका प्रादुर्भाव हुआ । अतः राजधर्म—राजनीतिके नष्ट होनेपर त्रयीधर्मके डूब जानेकी बात आती है । अराजकता या उच्छृङ्खल राजाके धर्महीन अधार्मिक राज्यमें कोई धर्म पनप ही नहीं सकता । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वके लौकिक-पारलौकिक, अभ्युदय एव निःश्रेयसके सम्पादन- में होनेवाले सब प्रकारके विघ्नोंको रोककर सब प्रकारकी सुविधा उपस्थित करना भारतीय राजधर्म, राजनीति या क्षात्र-धर्मका मूलमन्त्र है । भले ही कभी राजनीति राजाओ, राजमन्त्रियों एव राजकीय पुरुषोंतक ही सीमित रहे, उसमें सर्वसाधारणका प्रवेश आवश्यक भी ठहरे, तब भी विशिष्ट विद्वानोंके लिये तो कभी भी राजनीति उपेक्ष्य नहीं रही है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वको लौकिक पारलौकिक विनाशसे बचाना, उनको अभ्युदय, निःश्रेयस- प्राप्तिसे वञ्चित होनेसे बचाना क्षात्र या राजाका धर्म है । वही क्षात्रधर्म है, वही राजनीति है। इसीलिये राजाकी प्रशंसा है— 'नराणां च नराधिपम्' (गी० १०।२७) 'नाविष्णुः पृथिवीपतिः।' (दे० भा०) 'महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ।' (मनु० ७।८) 'राजा ईश्वररूप है, नरोंमें नराधिप ईश्वरीय विभूति है, विष्णुके अतिरिक्त पृथिवीपति नहीं हो सकता, वह कोई मनुष्यरूपमे विशेष दिव्य शक्ति है इत्यादि'। उस प्रकारके राजधर्मका पालन श्रुताध्ययनसम्पन्न धर्मज्ञ, सत्यवादी, रागद्वेषविहीन, विद्वानोंकी सहायता विना राजा भी नहीं कर सकता। इसीलिये राजाके लिये आवश्यक है कि वह ऐसे विद्वानोंको अपना सभासद् बनाये-- श्रुताध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञाः सत्यवादिन । राज्ञा सभासदः कार्या रिपौ मित्रे च ये समाः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २ । २) शासनाारूढ शासककी भूल या प्रमादको रोकनेके लिये परम निरपेक्ष विरक्त विद्वान् भी लोककल्याण-कामनासे राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे । इतना ही नहीं, कभी-कभी तो वेन-जैसे अन्यायी राजाको, जो समझाने-बुझानेसे भी न माने, शासनाधिकारसे च्युत या नष्ट भी कर देते थे एव उनके स्थानमें पृथु-जैसे योग्य शासकको प्रतिष्ठित करते थे। यह भी लोक-कल्याणार्थ विद्वानोंके राजनीतिमें हस्तक्षेपका उदाहरण है। 'इतिहास' बतलाता है कि हमारे प्रमुख राजनीतिज्ञ
शासकोंने अपनी राजनीतिका बागडोर तपःपूत, लोक-हितैषी, राग-द्वेषविहीन ऋषियोंके ही हाथमें दे रक्खा था। देवराज इन्द्रकी राजनीति देवगुरु बृहस्पतिके हाथमें थी, दैत्यराज बलिकी राजनीति महर्षि शुक्राचार्यके हाथमें थी तथा रामचन्द्र- की राजनीति वसिष्ठके हाथमें थी। धर्मराज युधिष्ठिरकी राजनीति धौम्य, व्यास, कृष्ण, विदुर आदिके हाथमें थी। चन्द्रगुप्तकी राजनीति महर्षि चाणक्यके हाथमें थी तथा शिवाकी राजनीति भी समर्थ रामदासके हाथमें थी। वस्तुतः जैसे बिना अङ्कुशके हस्ती, बिना लगामके घोडा आदि हानिकारक होते हैं, वैसे ही अङ्कुश एवं नियन्त्रणके बिना शासन भी हानिकारक होता है। राज्यश्रीसम्पन्न राजापर भी अङ्कुश होना ही चाहिये। इसी अर्थमें राजापर धर्मका नियन्त्रण होना चाहिये। यही बृहदारण्यक 'क्षत्रस्य क्षत्रम्' (१।४।१४) के अनुसार धर्मनियन्त्रित राजतन्त्रका सिद्धान्त है। धर्म- कर्म, संस्कृति, धर्मसंस्थाकी रक्षा तभी हो सकती है, जब धर्म-नियन्त्रित शासक हो। अन्यथा उच्छृङ्खल शासक सबको ही चौपट कर देता है।
सत्पुरुषोंसे एक निवेदन
कुछ लोग कहते हैं कि उपासना या ज्ञान तो मनकी चीज है। सब कुछ गड़बड़ होनेपर भी महात्मा या विद्वान्को इन टंटोंसे दूर रहकर भजन ही करना चाहिये। ठीक है, परन्तु शास्त्र एवं धर्म-स्थान नष्ट हो जानेपर विद्वानो या महात्माओंका षण्डामर्कके तुल्य सरकारीकरण हो जानेपर भजन करनेका, धार्मिक होनेका मन भी कैसे बन सकेगा ? आखिर धार्मिक, आध्यात्मिक भावनाओंसे ओत- प्रोत मन भी तो शास्त्रों एवं सत्पुरुषोंकी कृपासे ही बनता है, बिना शास्त्रादिके वैसा मन भी नही बन सकता है। यदि प्रह्लादने भी यही सोचा होता कि चलो पितासे विवाद कौन करे ? मनमें ही रामनाम जपते रहेंगे, ऊपरसे पिताकी ही बात मान ले तो आज कोई राम-नाम लेनेवाला रह सकता था ? परंतु जब सच्चाईके साथ प्रह्लादने अपने जीवनको संकटमे डालकर भी सिद्धान्तकी रक्षा की, तभी संसारमें सिद्धान्तकी स्थिरता रह सकी है। इस तरह विद्वान् एवं महात्मा राजतन्त्र शासन- मे भी राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे, फिर अब तो जनतन्त्र-शासन है। इस सिद्धान्त- के अनुसार तो शासनकी सर्वोच्चसत्ता जनतामें ही निहित होती है। अतः वास्तविक राजा जनता ही होती है, अतः राजनीतिक दक्षता सम्पादन करना प्रत्येक व्यक्तिका परम कर्तव्य है, फिर तो जनताके धन एवं धर्मकी रक्षाका उत्तरदायित्व जनतापर ही होता है। इसलिये जनताके प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य होता है कि वह उदारता, गम्भीरता और दक्षताके साथ राष्ट्र एवं धर्मका हिताहित देखकर कर्तव्यका निर्धारण एवं पालन करे। जहाँ न राजतन्त्र हो, न जनतन्त्र हो; किंतु अधिनायकतन्त्र डिक- टेटरशिप हो, वहाँपर तो विशिष्ट दक्ष राजनीतिज्ञ विद्वानो एव महात्माओके सिवा दूसरा कोई कुछ कर ही नहीं सकता है। जनताका संग्रह, उसे प्रोत्साहन देना एवं क्रान्तिके लिये उसे तैयार करना भी राजनीतिज्ञोके ही वशकी बात है। ऐसे समयमें धर्म एवं धर्मशास्त्रोंकी रक्षाके लिये विद्वानोंको सामने आना पड़ता है। इसी अभिप्रायसे कहा गया है कि—
उपसंहार ८३५ स्थापयध्वमिमं मार्गं प्रयत्नेनापि हे द्विजाः । स्थापिते वैदिके मार्गे सकलं सुस्थिरं भवेत् ॥ (सूतसंहिता, ज्ञानयोगख० २० । ५४) विद्वानोंको वैदिक धर्मकी स्थापनाके लिये सुदृढ प्रयत्न करना चाहिये । वैदिक-धर्मके स्थिर होनेपर सब कुछ स्थिर हो जायगा । यही यह भी कहा गया है कि जो समर्थ होनेपर भी सर्व प्रकारसे धर्मरक्षार्थ प्रयत्नशील नहीं होता, वह पापका भागी होता है । माता-पिताकी, गुरुजनोंकी या जनसमूहके धन धर्म एवं प्राणोंका विनाश हो रहा हो, कोई समर्थ पुरुष बैठे-बैठे तमाशा देखे, कुछ प्रयत्न न करे, यह प्रत्यक्ष ही पाप है— यश्च स्थापयितुं शक्तो नैव कुर्याद् विमोहितः । तस्य हन्ता न पापीयानिति वेदान्तनिर्णयः ॥ (सूतसंहिता, २ । २० । ५५) किंतु जो समर्थ न होनेपर भी यथाशक्ति धर्मशास्त्र मर्यादाकी रक्षाके लिये प्रयत्न करता है, वह उसी पुण्यके प्रभावसे सब पापोंसे मुक्त होकर सम्यक् ज्ञानका भागी होता है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम कहे जाते हैं । यह निवृत्तिमार्गानुसारियोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं । शौच, संतोष, स्वाध्याय आदिमें कुछ गड़बड़ी क्षम्य भी हो सकती है, परंतु यमके सेवनमें तो पूर्ण तत्परता होनी चाहिये । इसीलिये कहा गया है—'यमान् सेवेत सततं नियमान् मत्परः क्वचित्' (श्रीमद्भा०) यमोंका सेवन सर्वदा ही करना चाहिये। नियमोंमें सातत्य न होनेपर भी काम चल सकता है। अहिंसा आदिका अभिप्राय है—मनसा, वाचा, कर्मणा, प्राणिरक्षण करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना। यही लोकरक्षण, प्राणिरक्षण, धर्मरक्षण राजनीतिका मुख्य लक्ष्य है, यही क्षत-त्राण है। इसी कारण महात्माओंकी इन कार्योंमें प्रवृत्ति होती थी । कालकवृक्षीय-जैसे अरण्यवासी, चाणक्य-जैसे बालब्रह्मचारी, समर्थ स्वामी-जैसे निवृत्तिनिष्ठ लोग भी उस काममें संलग्न हुए । फिर भले ही इस काममें सफलता मिले अथवा न मिले, समुचित प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता । उसका अदृष्ट फल तो अवश्य ही प्राप्त हो जाता है, तभी तो भगवान् कृष्णने कहा था— यः स्थापयितुमुद्युक्तः श्रद्धयैवाक्षमोऽपि सन् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग् ज्ञानमवाप्नुयात् ॥ धर्मकार्यं यतञ्छक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानवः । प्राप्तो भवति तत्पुण्यमत्र मे नास्ति संशयः ॥ (महा० उद्यो० ७३ । ३) इन सब बातोंसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान दुस्समयपर जब कि जनताके धन धर्मपर संकट उपस्थित है, विशिष्ट विद्वानों, महात्माओं तथा धार्मिक सद्गृहस्थोंको भी राजनीतिसे न डरकर आगे आना चाहिये और धर्म-रक्षणके लिये जो भी आवश्यक कार्य हो करना चाहिये । परिणाम निश्चयेन शुभ ही होगा । शिवमस्तु सर्वजगतः । शम् ॥
श्रीहरिः श्रीहरिकृष्णदासजी गोयन्दकाद्वारा अनुवादित संस्कृत पुस्तकें १-श्रीमद्भगवद्गीता शांकरभाष्य-[ हिंदी-अनुवादसहित ] इसमें मूल श्लोक, भाष्य, हिंदीमें भाष्यार्थ, टिप्पणी तथा अन्तमें शब्दानुक्रमणिका भी दी गयी है। साइज २२x२९ आठपेजी, पृष्ठ ५२०, तिरंगे चित्र ३, मूल्य २.७५ २-श्रीमद्भगवद्गीता रामानुजभाष्य-[ हिंदी-अनुवादसहित ] आकार डिमाई आठपेजी, पृष्ठ-संख्या ६०८, तीन बहुरंगे चित्र, कपड़ेकी जिल्द, मूल्य .. २.५० इसमें भी शांकरभाष्यकी तरह ही श्लोक, श्लोकार्थ, मूल भाष्य तथा उसके सामने ही हिंदी अर्थ दिया है। कई जगह टिप्पणी भी दी गयी है। ३-वेदान्त-दर्शन-[ हिंदी-व्याख्यासहित ] इसमे ब्रह्मसूत्रका सरल भाषामें अनुवाद तथा व्याख्या दी गयी है। साइज डिमाई आठपेजी, पृष्ठ ४१६, तिरंगा चित्र, सजिल्द मूल्य २.०० ४-पातञ्जलयोगदर्शन-[ हिंदी-व्याख्यासहित ] इसमें महर्षि पतञ्जलिकृत योगदर्शन सम्पूर्ण मूल, उसका शब्दार्थ एवं प्रत्येक सूत्रका दूसरे सूत्रसे सम्बन्ध दिखाते हुए उन सूत्रों- की सरल भाषामें व्याख्या की गयी है। अकारादि-क्रमसे सूत्रोंकी वर्णानुक्रमणिका भी दी गयी है। आकार २०x३०-१६ पेजी, पृष्ठ १९२, मूल्य .७५ पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर) सूचीपत्र मुफ्त मँगवाइये।
श्रीहरिः गीताप्रेस, गोरखपुरकी गीताएँ श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्वविवेचनी—'कल्याण' के 'गीता-तत्त्वाङ्क' में प्रकाशित गीता विषयक २५१५ प्रश्न और उनके उत्तरके रूपमें विवेचनात्मक ढंगकी हिंदी-टीकाका संशोधित संस्करण, टीकाकार—श्रीजयदयालजी गोयन्दका, पृष्ठ ६८४, रंगीन चित्र ४, मूल्य ४.०० श्रीमद्भगवद्गीता-[ श्रीशांकरभाष्यका सरल हिंदी-अनुवाद ] इसमें मूल भाष्य तथा भाष्यके सामने ही अर्थ लिखकर पढ़ने और समझनेमे सुगमता कर दी गयी है । पृष्ठ ५२०, चित्र ३, मूल्य .. २.७५ श्रीमद्भगवद्गीता-[ श्रीरामानुजभाष्यका सरल हिंदी अनुवाद ] आकार डिमाई आठपेजी, पृष्ठ ६०८, तीन तिरंगे चित्र, सजिल्द मूल्य २.७० श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, पदच्छेद, अन्वय, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी, प्रधान और सूक्ष्म विषय एवं 'त्यागसे भगवत्प्राप्ति' लेखसहित, मोटा टाइप, कपड़ेकी जिल्द, पृष्ठ ५७२, रंगीन चित्र ४, मूल्य १.२५ श्रीमद्भगवद्गीता-[ मझली ] प्रायः सभी विषय १।) वाली नं० ४ के समान, विशेषता यह है कि श्लोकोंके सिरेपर भावार्थ छुपा हुआ है, साइज और टाइप कुछ छोटे, पृष्ठ ४६८, रंगीन चित्र ४, मूल्य .. .७० श्रीमद्भगवद्गीता-प्रत्येक अध्यायके माहात्म्यसहित, सटीक, मोटे अक्षरोंमें, लाहौरी ढंगकी, तिरंगा चित्र, पृष्ठ ४२४, मूल्य .. .८७ श्रीमद्भगवद्गीता-श्लोक, साधारण भाषाटीका, टिप्पणी, प्रधान विषय, मोटा टाइप, पृष्ठ २१६, मूल्य .. .५० श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, मोटे अक्षरवाली, सचित्र, पृष्ठ २१६, मूल्य अजिल्द .३१ श्रीमद्भगवद्गीता-केवल भाषा, अक्षर मोटे हैं, १ चित्र, पृष्ठ १९२, मूल्य .२५ श्रीमद्भगवद्गीता-पञ्चरत्न, मूल, सचित्र, मोटे टाइप, गुटका साइज, पृष्ठ १८४, मूल्य .२० श्रीमद्भगवद्गीता-साधारण भाषाटीका, पाकेट साइज, सचित्र, पृष्ठ ३५२, मूल्य .१६ श्रीमद्भगवद्गीता-मूल, तावीजी साइज २×२।। इंच, पृष्ठ २९६, सजिल्द मूल्य .६२ श्रीमद्भगवद्गीता-विष्णुसहस्रनामसहित, पृष्ठ १२८, सचित्र, मूल्य .. पता—गीताप्रेस, गो० गीताप्रेस ( गोरखपुर )
संस्कृतकी कुछ मूल तथा सानुवाद पुस्तकें श्रीमद्भगवद्गीता-तत्त्वविवेचनी-पृष्ठ ६८४, चित्र ४, सजिल्द, मूल्य ˙ ˙ ˙ ४.०० श्रीमद्भगवद्गीता [बड़ी]-पृष्ठ ५७२, चित्र ४ सजिल्द, मूल्य ˙ १.२५ ईशावास्योपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ ५२, मूल्य .२० केनोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १४२, मूल्य ˙ ˙ .५० कठोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १७८, मूल्य ˙ ˙ .५६ प्रश्नोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १२८, मूल्य ˙ .४५ मुण्डकोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ १२२, मूल्य .४५ माण्डूक्योपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २८४, मूल्य १.०० ऐतरेयोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, पृष्ठ १०४, मूल्य ˙ .३७ तैत्तिरीयोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २५२, मूल्य .८१ श्वेताश्वतरोपनिषद्-सानुवाद, शाङ्करभाष्यसहित, सचित्र, पृष्ठ २६८, मूल्य .८७ ईशावास्योपनिषद्-अन्वय तथा सरल हिंदी-व्याख्यासहित, पृष्ठ १६, मूल्य .०६ श्रीमद्भागवतमहापुराण-दो खण्डोमे, सटीक, पृष्ठ २०३२, चित्र रंगीन २६, १५.०० श्रीमद्भागवतमहापुराण-मूल मोटा टाइप, पृष्ठ ६९२, चित्र १, सजिल्द मू० ६.०० श्रीमद्भागवतमहापुराण-मूल, गुटका, सजिल्द, पृष्ठ ७६८, सचित्र, मूल्य ३.०० श्रीविष्णुपुराण-सानुवाद, पृष्ठ ६२४, चित्र ८, सजिल्द, मूल्य ४.०० अध्यात्मरामायण-सानुवाद, पृष्ठ ४००, सचित्र, कपड़ेकी जिल्द, मूल्य ३.०० पातञ्जलयोगदर्शन-मूल, पृष्ठ २०, मूल्य ˙ ˙ ˙ ˙ .०२ श्रीदुर्गासप्तशती-सानुवाद, पृष्ठ २४०, सचित्र, मूल्य .७५ श्रीदुर्गासप्तशती-मूल, पृष्ठ १५२, सचित्र, मूल्य ˙ .५० लघुसिद्धान्तकौमुदी-(संस्कृतके विद्यार्थियोंके लिये) पृष्ठ ३६८, मूल्य .७५ सूक्ति-सुधाकर-सुन्दर श्लोक-संग्रह, सानुवाद, पृष्ठ २६६, मूल्य ˙ ˙ ˙ .६२ स्तोत्ररत्नावली-चुने हुए स्तोत्र, सानुवाद, सचित्र, पृष्ठ ३२०, मूल्य ˙ ˙ ˙ .५० प्रेमदर्शन-नारद-भक्ति-सूत्रोकी विस्तृत टीका, सचित्र, पृष्ठ १९२, मूल्य .३१ विवेक-चूडामणि-सानुवाद, सचित्र, पृष्ठ १८४, मूल्य ˙ ˙ .३१ अपरोक्षानुभूति-शङ्करस्वामिकृत सानुवाद, पृष्ठ ४०, सचित्र, मूल्य ˙ ˙ ˙ .१६ मनुस्मृति-द्वितीय अध्याय, सार्थ, .१० | संध्या-विधिसहित, पृष्ठ १६, मूल्य .०३ श्रीविष्णुसहस्रनाम-सटीक .१० | शारीरकमीमांसादर्शन-मूल, .०५ श्रीविष्णुसहस्रनाम-मूल, पृष्ठ ४८, .०५ | श्रीरामगीता-सटीक, पृष्ठ ४०, .०५ शाण्डिल्यभक्तिसूत्र-सटीक, .१० | प्रश्नोत्तरी-सटीक, पृष्ठ ३२, .०३ मूलरामायण-सानुवाद, पृष्ठ २४ .०८ | नारद-भक्ति-सूत्र-सटीक, पृष्ठ २४, .०२ गोविन्द-दामोदर-स्तोत्र-सटीक, .०६ | सहस्रश्लोकी गीता-सटीक ०१ संध्योपासनविधि-अर्थसहित, .०६ | पता—गीताप्रेस, पो० गीताप्रेस (गोरखपुर)
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