मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरियोंकी भी विद्वान्, महन्त, मण्डलेश्वर प्रशंसा करते फिरते हैं। इस दृष्टिसे नास्तिकोंके हाथसे राजनीतिका उद्धार करना योग्य धार्मिक, सुशील लोगोंके हाथमें राजनीति लानेके लिये विद्वान्का प्रयत्न अत्यावश्यक है ही। महाभारतका स्पष्ट वचन है— क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्त पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ (महा० शां० ६४ । १०१) परमेश्वरसे सर्वप्रथम राजधर्मका ही आविर्भाव हुआ। उसके पीछे राजधर्मके अङ्गभूत अन्य धर्मोंका प्रादुर्भाव हुआ । अतः राजधर्म—राजनीतिके नष्ट होनेपर त्रयीधर्मके डूब जानेकी बात आती है । अराजकता या उच्छृङ्खल राजाके धर्महीन अधार्मिक राज्यमें कोई धर्म पनप ही नहीं सकता । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वके लौकिक-पारलौकिक, अभ्युदय एव निःश्रेयसके सम्पादन- में होनेवाले सब प्रकारके विघ्नोंको रोककर सब प्रकारकी सुविधा उपस्थित करना भारतीय राजधर्म, राजनीति या क्षात्र-धर्मका मूलमन्त्र है । भले ही कभी राजनीति राजाओ, राजमन्त्रियों एव राजकीय पुरुषोंतक ही सीमित रहे, उसमें सर्वसाधारणका प्रवेश आवश्यक भी ठहरे, तब भी विशिष्ट विद्वानोंके लिये तो कभी भी राजनीति उपेक्ष्य नहीं रही है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वको लौकिक पारलौकिक विनाशसे बचाना, उनको अभ्युदय, निःश्रेयस- प्राप्तिसे वञ्चित होनेसे बचाना क्षात्र या राजाका धर्म है । वही क्षात्रधर्म है, वही राजनीति है। इसीलिये राजाकी प्रशंसा है— 'नराणां च नराधिपम्' (गी० १०।२७) 'नाविष्णुः पृथिवीपतिः।' (दे० भा०) 'महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ।' (मनु० ७।८) 'राजा ईश्वररूप है, नरोंमें नराधिप ईश्वरीय विभूति है, विष्णुके अतिरिक्त पृथिवीपति नहीं हो सकता, वह कोई मनुष्यरूपमे विशेष दिव्य शक्ति है इत्यादि'। उस प्रकारके राजधर्मका पालन श्रुताध्ययनसम्पन्न धर्मज्ञ, सत्यवादी, रागद्वेषविहीन, विद्वानोंकी सहायता विना राजा भी नहीं कर सकता। इसीलिये राजाके लिये आवश्यक है कि वह ऐसे विद्वानोंको अपना सभासद् बनाये-- श्रुताध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञाः सत्यवादिन । राज्ञा सभासदः कार्या रिपौ मित्रे च ये समाः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २ । २) शासनाारूढ शासककी भूल या प्रमादको रोकनेके लिये परम निरपेक्ष विरक्त विद्वान् भी लोककल्याण-कामनासे राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे । इतना ही नहीं, कभी-कभी तो वेन-जैसे अन्यायी राजाको, जो समझाने-बुझानेसे भी न माने, शासनाधिकारसे च्युत या नष्ट भी कर देते थे एव उनके स्थानमें पृथु-जैसे योग्य शासकको प्रतिष्ठित करते थे। यह भी लोक-कल्याणार्थ विद्वानोंके राजनीतिमें हस्तक्षेपका उदाहरण है। 'इतिहास' बतलाता है कि हमारे प्रमुख राजनीतिज्ञ