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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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बिना सफल नहीं होता। 'जानाति इच्छति अथ करोति' यह क्रम प्रसिद्ध है। जाननेसे इच्छा होती है, इच्छासे क्रिया होती है। 'यः क्रियावान् स पण्डितः' (सुभा० भं०) की कहावत प्रसिद्ध ही है। प्रयोगहीन शिल्पविज्ञान एवं शस्त्रादि- विज्ञानके तुल्य प्रयोगहीन राजनीति-विज्ञान भी व्यर्थ ही रहता है। क्रियाहीन तर्क-वितर्क एवं ज्ञान-विज्ञान, बुद्धि-व्यायाममात्र ही रह जाता है। रावणके समयमें ज्ञान-विज्ञानवाले ऋषियोंकी कमी न थी। फिर भी ऋषियोंका वध चालू था। रक्तघटका उपहार देनेपर भी रावणको संतोष नहीं हुआ था। ऋषियोंकी अस्थियोंका पहाड़ लग गया था। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछा मुनिन्ह लागि अति दाया॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥ (रामचरितमानस अरण्यकाण्ड) उस समय विश्वामित्रकी सक्रिय राजनीति ही सफल हुई। उसीके द्वारा राम मैदानमें आये और दुष्टोंका दर्प-दलन करके त्रयी-धर्मकी रक्षा एवं साधु- सत्पुरुषोंका पोषण किया। हाँ, जहाँ राजनीतिके योग्य प्रयोक्ता एवं प्रयोग-साधन ठीक उपलब्ध हों, वहाँ विद्वान् केवल उपदेशमात्र कर सकता है, परंतु जहाँ प्रयोक्ता, प्रयोग-साधन नहीं, वहाँ उनका अन्वेषण एवं निर्माण भी विद्वान्का ही काम है। राजाके अभावमें यह सब उत्तरदायित्व विद्वान्पर ही आता है। 'चाणक्य' ने यही सब किया था, समर्थ रामदासने भी यही किया। शुक्र, बृहस्पति आदि भी अनेक ढंगसे सक्रिय राजनीतिका प्रवर्तन करते थे। हाँ, विद्वान् राज्याधिकारके प्रलोभनमें न पड़े, यह अवश्य ठीक है। अतः ठीक राजनीति बिना त्रयी एव तत्प्रोक्त धर्म संकटग्रस्त हो जाता है। प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून्। ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ (मनुस्मृ० ९।३२७) प्रजापतिने सृष्टि रचकर वैश्योंको पशु दिया, ब्राह्मण एवं राजाको सारी प्रजा दी। अतः राजाके अभावमें विद्वानोंपर सर्वाधिक भार आ जाता है। विद्वान्, आस्तिक, सद्गृहस्थ एवं साधु-सत्पुरुषोंके बिना राजनीति सर्वथा उच्छृङ्खल लोगोंके हाथमें चली जाती है, फिर तो गुण्डागर्दीका ही शासन होने लगता है। अतः धार्मिक लोगोंके प्रवेशसे ही समस्या हल हो सकती है। यह ठीक है कि 'सच्छिक्षा एवं सद्विद्याके प्रचारसे सद्बुद्धि होती है, सद्बुद्धिसे सदिच्छा एवं सदिच्छासे सत्प्रयत्न होता है और सत्प्रयत्न ही सब प्रकारके सत्फलोंका स्रोत होता है। परंतु आज तो शिक्षा भी स्वतन्त्र विद्वानोंके हाथमें नहीं है। जिस विचारके शासक हैं, उसी विचारका समर्थन करनेवाली आजकी शिक्षा बनती जा रही है। स्वतन्त्र विद्वान्, स्वतन्त्र विद्यालय एवं उनके छात्र भी सरकारी-शिक्षाके प्रभावसे स्पष्ट ही प्रभावित हैं। कथावाचक, मण्डलेश्वर आदि भी उसी ढंगकी कथा कहनेमें लाभका अनुभव करते हैं। घोर नास्तिक उच्छृङ्खल मिनिस्टरों, सरकारी पदाधिका-

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