मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसञ्ज्ञकः । स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ॥ अमात्यः साधु लिखितमित्येतद् प्राग् लिखेद्यम् । सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ॥ सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम् । अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ॥ अङ्गीकर्तव्यमिति- च युवराजो लिखेत् स्वयम् । लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहितः । स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ( शुक्रनीति २ । ३५५-३५९ ) मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोको लेकर विचार करना चाहिये । फिर जो बहुमत हो उसे स्वीकार करना चाहिये-- पृथक्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् । विमृशेत् स्वमतेनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम् ॥ जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है । जो प्रजाका रक्षक बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये-- अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः । स संहृत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ( शुक्रनीति ) इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृङ्खल नहीं होता था । आजके लोकतन्त्र-शासनका आधार मुण्ड-गणना है । इसके अनुसार योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता है । बहुमत जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमे शासनसूत्र आ जाता है । विधान-सभा एव लोक- सभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना । पर स्थिति यह है कि भारतमें सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं जो कानूनसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं । उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य वकीलोंका सहारा लेते हैं; परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं । साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदो एव मन्वादि धर्मशास्त्रोको ही राष्ट्रका संविधान एव कानून मानते हैं । उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञ एवं सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान-निर्णेत्री है, विधान-निर्मात्री नहीं । शासन-परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है । राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने-आपको शास्त्र एव आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा विनयसे युक्त बनाये । पुनः अपने पुत्रो, मन्त्रियोको विनययुक्त बनाये, पश्चात् भृत्यो एव प्रजाको विनययुक्त बनाये-