मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 592, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंउपसंहार ८३३ संधि करनेसे भले ही थोड़ी तात्कालिक पीड़ा हो, किन्तु भविष्यमें लाभ हो तो संधि अवश्य कर लेनी चाहिये। जब सारी प्रकृति सन्तुष्ट हो और कोष तथा युद्धके साधन पर्याप्त हो, तब युद्ध करना चाहिये। जब अपनी सेना हृष्ट-पुष्ट- सन्तुष्ट हो और शत्रुसेना दुर्बल तथा असन्तुष्ट हो, तब भी युद्ध करना चाहिये। जब सेना, वाहन और कोष क्षीण हो तो शत्रुसे समझौतेकी बातचीत करते हुए अपने दुर्गमें ही रहना चाहिये। जब राजा देखे कि शत्रु बलवान् है तब अपनी सेनाका दो विभागकर एक विभाग लड़ाईपर भेजे और एक विभागको शत्रु की सेनामें भेजकर शत्रु-सेनाके लोगोंको अपनी ओर मिला लेना चाहिये। यदि राजा देखे कि शत्रु अब हमें जीत लेगा, तो झट किसी ऐसे बलवान् धर्मात्मा राजाका आश्रय ले ले जो अपनी दुष्ट प्रजा और शत्रुको भी दण्ड दे सकता हो तथा गुरुके समान प्रत्येक प्रकारसे उसकी सेवा करनी चाहिये। यदि उसका आश्रय लेनेपर भी कोई लाभ न हो, अपितु हानि होनेकी ही सम्भावना हो, तो बेखटके युद्ध ही करना चाहिये। गुण-दोष विचारकर भविष्यका निर्णय करनेवाले, वर्तमान-निर्णय