भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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८३२ || मार्क्सवाद और रामराज्य

“योगबल और अलौकिक शक्ति—यहाँ योगादिके विषयमें एक बात कहना असङ्गत न होगा। क्या तपस्या, योग, क्रिया आदिसे मनुष्य अलौकिक कार्य सम्पन्न कर सकता है ? जो कुछ पहले कहा जा चुका है, उससे उत्तर स्पष्ट है— कदापि नहीं। योगकी शास्त्रीय परिभाषाओसे भी उसके ऊपर प्रकाश पड़ता है। पातञ्जलसूत्रकी परिभाषा है— योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः ( १ । २) पर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध -यह स्वयं ही एक असम्भव क्रिया है; इसलिये एक असम्भव क्रियासे असम्भव फल प्राप्त होता है या नहीं यह प्रश्न स्वयं ही अपना उत्तर है। गीताकी परिभाषा है— 'योगः कर्मसु कौशलम्' (२।५०)। तिलकने इसी परिभाषापर जोर दिया है। स्पष्ट ही यह परिभाषा योगको अलौकिक क्षेत्रसे उतारकर व्यवहार-क्षेत्रमें लानेका प्रयत्न है। व्यावहारिक अर्थमें ही एक मार्क्सवादी गीताके उस श्लोककी प्रशंसा कर सकता है—जिसमें मनुष्यको समदर्शी होनेका उपदेश दिया गया है। लाभ और हानि, जय और पराजय, दोनोंमें ही उसको अविचलित रहनेको कहा गया है, लेकिन मार्क्सवाद और गीताकी प्रेरणाएँ भिन्न हैं। गीताकी प्रेरणा है— कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।' (२।४७) लेकिन मार्क्सके दर्शनमें ईश्वरको फल सौंपनेकी बात नहीं आती, क्योंकि यह एक निरीश्वरवादी दर्शन है। ईश्वरमें विश्वाससे ही अलौकिक शक्तिकी कल्पना आती है। जन्मान्तर-रहस्य इसीका एक अङ्ग है। ऐसे प्रश्नोंका उत्तर 'Dialectics of nature' नामक पुस्तकके एक अध्यायमें एजिल्सने दिया है। प्रेतात्मा बुलानेवालोंकी कारस्तानियों अदालतोंमे कैसे खुलीं, उन घटनाओंका उल्लेख करते हुए एजिल्सने अलौकिक शक्तिकी असम्भावनाओंको प्रमाणित किया है।” मार्क्सवादी आदर्शवादके रूपमें अद्वैतवादको ही क्यो देखना चाहता है ? अनेक अध्यात्मवादी चेतनके समान ही अचेतनको भी वास्तव ही मानते हैं। अद्वैतवादी वृत्तिविशिष्ट चैतन्यरूप दृष्टिको व्यावहारिक सत्य मानते हैं और विषय- को भी उसी कोटिका मानते हैं। बिना चेतन-सत्ता स्वीकार किये क्रियाशीलता ही नहीं बन सकती, फिर क्रान्तिकारी क्रियाशीलताकी बात तो दूरकी है। क्रियात्मक सत्यता अवश्य प्रयोगसापेक्ष है; परंतु वस्तुसत्ता प्रयोगकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे अगर कूटस्थ सत्, परमार्थ आत्मा सत्य है, तो उसके लिये प्रयोग अपेक्षित नही वहाँ तो अज्ञान-निवृत्त्यर्थ ज्ञानमात्र अपेक्षित है। क्रिया पुरुषतन्त्र हो सकती है, परंतु ज्ञान तो पुरुषतन्त्र न होकर वस्तुतन्त्र ही होता है। जो विभाज्य एवं विपरीत होता है, वह परमार्थ सत्य होता ही नहीं। सत्यताकी मुख्य परीक्षा प्रमाणसे होती है। प्रयोग भी प्रमाणका अङ्ग होकर ही परीक्षामें उपयुक्त हो सकता है। विचार, क्रिया— दोनों ही एक कर्ता-प्रयोक्ताद्वारा सम्पन्न होते हैं—यह तो ठीक है, परंतु 'एक ही सत्यकी विपरीत दिशाएँ हैं', यह निरर्थक वागाडम्बरमात्र है।

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