भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 582

मार्क्स और ईश्वर ८२३

"परिस्थितियोंकी उपज मनुष्य है या मनुष्यकी उपज परिस्थितियाँ ?" यह विषय सदासे ही विचारणीय रहा है फिर भी सिद्धान्तत मनुष्य चेतन है। परिस्थितियाँ जड हैं। मनुष्य ही परिस्थितियोंका निर्माता ह और भीष्मजीने कहा है काल या परिस्थितियाँ राजाका कारण हैं या राजा कालका कारण है— यह संशय न होना चाहिये, क्योंकि राजा ही कालका कारण होता है— कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्। इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्।' (महा० उद्योगपर्व १३२ । १६) अस्तु, हीगेलके निर्विशेष मानस और वेदान्तके ब्रह्ममें महान् अन्तर है। मन एक भौतिक वस्तु है, किंतु ब्रह्म नित्य कूटस्थ अनुभवस्वरूप है। वृहि धातुसे ब्रह्मकी निष्पत्ति अवश्य होती है, परंतु वर्धित होना 'ब्रह्म' शब्दका अर्थ नहीं है। निरतिशय बृहत् तत्त्व ही ब्रह्म है। वह देश-काल-वस्तुसे अपरिच्छिन्न है। निरतिशय पदार्थ ही बृहत् कहा जा सकता है। भौतिक जड अनृत मर्त्यको निरतिशय बृहत् नहीं कहा जा सकता, अतएव सत्य चैतन्य त्रिकालाबाध्य अमृत कूटस्थ अपरिच्छिन्न अनन्त अखण्ड ज्ञान ही ब्रह्म-शब्दार्थ ठहरता है। वर्धन-हेतु होनेसे प्राणमें भी ब्रह्म शब्दका प्रयोग होता है; क्योंकि प्राण रहनेपर ही शरीरकी वृद्धि आदि होती है। औपनिषद परब्रह्ममें तो 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतियोंके अनुरोधसे निरतिशय बृहत्तत्त्वके अर्थमें ही ब्रह्म-शब्दका प्रयोग होता है। यह भी कहा जा चुका है कि जिसमें वास्तविक विभाजन होता है, वह ब्रह्म नहीं होता। अनिर्वचनीय मायाके अध्याससे ही उसमे अनेक प्रकारके विभागोंका अध्यारोप होता है। इसी तरह यह भी कहना गलत है कि मायावादी दर्शनकी असङ्गतियोंको दूर करनेके लिये गौडपादने ब्रह्म या आत्माको मूलमें रखकर भूत जगत्को उसका फलस्वरूप बतलाकर सत्यकी मर्यादा रखी है। क्योंकि अनादि-अपौरुषेय वेद, उपनिषद् आदिके द्वारा ही ब्रह्मवादका प्रतिपादन किया जाता है। अद्वैतवादी शंकरने तो गौडपादके ही मतका अनुसरण करके प्रस्थानत्रयीपर भाष्य किया है। गौडपादका सिद्धान्त तो 'अजातवाद' है। उनके यहाँ तो भूत-जगत् कभी हुआ ही नहीं। 'आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥ (माण्डूक्यकारिका ४।३१) जो आदिमें नहीं और अन्तमें नहीं होता, वह वर्तमानमे भी वैसा ही होता है। भूत, जगत्, वितथ, स्वप्न, माया आदिवितथ पदार्थों- के सदृश अवितथ से प्रतीत होते हैं, इस दृष्टिसे ब्रह्म-तत्त्व ही त्रिकालाबाधित सत्य है। न्याय मीमांसा आदि दर्शनोंने भूत सत्ता अवश्य स्वीकार की है, परंतु चेतन आत्मा एव अनादि-अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोका प्रामाण्य तथा शास्त्रोक्त धर्म अधर्म आदिका अस्तित्व भी उन्हे स्वीकृत है। फिर उन आस्तिक दर्शनोंमे जडवादी