भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 583

८२४ मार्क्सवाद और रामराज्य भौतिक दर्शनोंकी सिद्धि कैसे हो सकेगी ? वृत्तिरूप ज्ञान प्रमाणसापेक्ष होता है— यह वेदान्तदर्शनको भी मान्य है । सौत्रान्तिक, योगाचार, वैभाषिक, माध्यमिक— चारों प्रकारके बौद्ध कम-से-कम प्रत्यक्षप्रमाणके अतिरिक्त अनुमानप्रमाण भी मानते हैं; किंतु भौतिकवादी चार्वाक आदि तो अनुमानप्रमाण भी नहीं मानते । बौद्ध भी देहभिन्न क्षणिक विज्ञानकी आलयधाराको आत्मा मानते हैं; किंतु चार्वाक एव मार्क्स आदि तो जीवित देहको ही आत्मा मानते हैं । बौद्ध भले ही वैदिक-धर्मके विरोधी हो फिर भी उनके यहाँ आत्मा तथा पुण्य, पाप, सत्य, तपस्या तथा प्रमाण आदि मान्य हैं । जडवादी तो सबसे गये-बीते हैं। कणाद एव गौतम परमाणु, ईश्वर तथा जीवात्माओके पुण्यापुण्यरूप अदृष्टको जगत्-कारण मानते हैं, अतः इनका भी भौतिकवादियोसे कोई मेल नहीं है । कपिल, पतञ्जलि भी प्रत्यक्ष, अनुमान एव आगमको प्रमाण मानते हैं, तदनुसार असङ्ग अनन्त नित्य चेतन आत्मा तथा महदादि प्रपञ्चका कारण प्रकृति एवं धर्माधर्म उन्हें मान्य हैं । ये लोग ईश्वर भी स्वीकार करते हैं । अवश्य कपिल आदि बाह्यार्थवादी हैं, परंतु उनके असङ्ग चेतन आत्माकी सिद्धि बाह्यार्थपर अवलम्बित नहीं है; क्योंकि कपिल, पतञ्जलि, गौतम, कणाद आदि सभीका आत्मा नित्य है। जो नित्य होता है उसकी सिद्धि अन्यसापेक्ष नही होती । यहाँतक कि चारो प्रकारके बौद्ध एवं जैन आत्माको बाह्यार्थ-सापेक्ष नहीं मानते, बल्कि बौद्धोकी दृष्टिसे तो बाह्यार्थ विज्ञानका परिणाम है । उनका स्पष्ट कहना है कि जैसे मृत्तिकाके रहनेपर ही घटादिका उपलम्भ होता है, अन्यथा नहीं— ‘सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः’ अतः विज्ञान एवं बाह्यार्थका अभेद ही होता है । सौत्रान्तिक, वैभाषिककी दृष्टिमे बाह्यार्थ भी मान्य है । वैसे वेदान्ती भी व्याव- हारिक, प्रातिभासिक-दो प्रकारका बाह्यार्थ मानते ही हैं । जिस कोटिका प्रमाण एवं प्रमाता है, उसी कोटिका बाह्यार्थ भी है, परंतु भौतिकवाद-मतकी पुष्टि इन किन्हीं दर्शनोंसे नहीं होती । इन मतोंमें मन, ज्ञान, भूत अथवा देहके परिणाम नहीं मान्य हैं । इसी तरह योग आदिके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंका टाँग अड़ाना भी अनधि- कारपूर्ण चेष्टा है । जैसे बंदरको अदरखका स्वाद अज्ञेय होता है, शाकवणिक्‌लोगों को बहुमूल्य रत्नोंका माहात्म्यज्ञान दुःशक है, वही स्थिति योगके सम्बन्धमे मार्क्स- वादियोकी है । जो सत्य, अहिंसा, संयम, न्यायको भी स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं होता है, जो वर्ग-संघर्ष, वर्ग विध्वंसके मार्गपर चलकर केवल धनको ही सर्वस्व मानकर उसे ही अपना ध्येय मानता है, उसके यहाँ त्याग, संयम, अपरिग्रह, तपस्यादिमूलक योगकी बातोंका क्या महत्त्व हो सकता है ?