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मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

८२४ मार्क्सवाद और रामराज्य भौतिक दर्शनोंकी सिद्धि कैसे हो सकेगी ? वृत्तिरूप ज्ञान प्रमाणसापेक्ष होता है— यह वेदान्तदर्शनको भी मान्य है । सौत्रान्तिक, योगाचार, वैभाषिक, माध्यमिक— चारों प्रकारके बौद्ध कम-से-कम प्रत्यक्षप्रमाणके अतिरिक्त अनुमानप्रमाण भी मानते हैं; किंतु भौतिकवादी चार्वाक आदि तो अनुमानप्रमाण भी नहीं मानते । बौद्ध भी देहभिन्न क्षणिक विज्ञानकी आलयधाराको आत्मा मानते हैं; किंतु चार्वाक एव मार्क्स आदि तो जीवित देहको ही आत्मा मानते हैं । बौद्ध भले ही वैदिक-धर्मके विरोधी हो फिर भी उनके यहाँ आत्मा तथा पुण्य, पाप, सत्य, तपस्या तथा प्रमाण आदि मान्य हैं । जडवादी तो सबसे गये-बीते हैं। कणाद एव गौतम परमाणु, ईश्वर तथा जीवात्माओके पुण्यापुण्यरूप अदृष्टको जगत्-कारण मानते हैं, अतः इनका भी भौतिकवादियोसे कोई मेल नहीं है । कपिल, पतञ्जलि भी प्रत्यक्ष, अनुमान एव आगमको प्रमाण मानते हैं, तदनुसार असङ्ग अनन्त नित्य चेतन आत्मा तथा महदादि प्रपञ्चका कारण प्रकृति एवं धर्माधर्म उन्हें मान्य हैं । ये लोग ईश्वर भी स्वीकार करते हैं । अवश्य कपिल आदि बाह्यार्थवादी हैं, परंतु उनके असङ्ग चेतन आत्माकी सिद्धि बाह्यार्थपर अवलम्बित नहीं है; क्योंकि कपिल, पतञ्जलि, गौतम, कणाद आदि सभीका आत्मा नित्य है। जो नित्य होता है उसकी सिद्धि अन्यसापेक्ष नही होती । यहाँतक कि चारो प्रकारके बौद्ध एवं जैन आत्माको बाह्यार्थ-सापेक्ष नहीं मानते, बल्कि बौद्धोकी दृष्टिसे तो बाह्यार्थ विज्ञानका परिणाम है । उनका स्पष्ट कहना है कि जैसे मृत्तिकाके रहनेपर ही घटादिका उपलम्भ होता है, अन्यथा नहीं— ‘सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियोः’ अतः विज्ञान एवं बाह्यार्थका अभेद ही होता है । सौत्रान्तिक, वैभाषिककी दृष्टिमे बाह्यार्थ भी मान्य है । वैसे वेदान्ती भी व्याव- हारिक, प्रातिभासिक-दो प्रकारका बाह्यार्थ मानते ही हैं । जिस कोटिका प्रमाण एवं प्रमाता है, उसी कोटिका बाह्यार्थ भी है, परंतु भौतिकवाद-मतकी पुष्टि इन किन्हीं दर्शनोंसे नहीं होती । इन मतोंमें मन, ज्ञान, भूत अथवा देहके परिणाम नहीं मान्य हैं । इसी तरह योग आदिके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंका टाँग अड़ाना भी अनधि- कारपूर्ण चेष्टा है । जैसे बंदरको अदरखका स्वाद अज्ञेय होता है, शाकवणिक्‌लोगों को बहुमूल्य रत्नोंका माहात्म्यज्ञान दुःशक है, वही स्थिति योगके सम्बन्धमे मार्क्स- वादियोकी है । जो सत्य, अहिंसा, संयम, न्यायको भी स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं होता है, जो वर्ग-संघर्ष, वर्ग विध्वंसके मार्गपर चलकर केवल धनको ही सर्वस्व मानकर उसे ही अपना ध्येय मानता है, उसके यहाँ त्याग, संयम, अपरिग्रह, तपस्यादिमूलक योगकी बातोंका क्या महत्त्व हो सकता है ?

चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको मार्क्सवादी एक असम्भव चीज मानते हैं । अतएव असम्भव चीजसे होनेवाले फलोंको भी असम्भव मानते हैं । परंतु यदि योग या वेदान्तानुसार पाञ्चभौतिक मन या चित्त एक परिणामी वस्तु है और उसका परिणाम सहेतुक है तो परिणाम-निरोध भी क्यों नहीं हो सकता ? सुषुप्तिमें चित्तका शब्दाद्याकार परिणाम निरोध मान्य है, तब फिर समाधिमें भी चित्तके वृत्ति-परिणामराहित्य होनेमें क्या आपत्ति है ? वृत्तिद्वयकी मधिमें चित्त- का निर्वृत्तिक होना तर्कसङ्गत भी है ! चित्तके एक व्यापारसे एक वृत्ति होती है । एक व्यापारके अनन्तर अन्य व्यापार-प्रारम्भसे पूर्व क्षणमें चित्तके निर्व्यापार एव निर्वृत्तिक माननेमें कोई भी अड़चन नही हो सकती, जैसे अलातचक्रकी तीव्र गति होती है, वैसे ही मन्द गति भी होती है । साथ ही गति-राहित्यका भी कोई समय हो ही सकता है, उसी तरह चित्तकी तीव्र, मन्द गति एव गति-राहित्य भी सम्भव है । इस तरह जब योग असम्भव वस्तु नहीं है तो उसका फल भी असम्भव वस्तु नहीं है । 'योगः कर्मसु कौशलम्' (गी० २।५०) का तिलकद्वारा वर्णित अर्थ गलत है । वस्तुतः कर्म-कौशलको योग नहीं कहा जाता है, किंतु योग ही कर्मोंमे दक्षता है । योगकी परिभाषा स्पष्ट की गयी है—'समत्वं योग उच्यते' (गी० २।४८) सिद्धि-असिद्धिमें समता योग है । इस तरह समत्वबुद्धिसे युक्त कर्म भी गीतामें योग कहा गया है । तिलकने भी भले ही कर्मोंमें कौशलको योग कहा हो, तो भी उन्होंने पातञ्जलयोग एवं उसके फलका अपलाप नहीं किया है । मार्क्सवादीके लिये गीताकी प्रशंसाका कोई अर्थ ही नहीं; क्योंकि गीतामें तो स्वयं ही निर्वातस्थित निश्चल दीपके तुल्य योगीके यत चित्तका निश्चल होना बतलाया है— 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ (गी० ६।१९) मार्क्स स्पष्ट ही निरीश्वरवादी है, फिर उसकी दृष्टिसे कर्मोंका ईश्वरमें समर्पण करना, फलकी आकाङ्क्षा बिना ईश्वराराधन बुद्धिसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करना आदि सब बाते व्यर्थ हैं । धनको ही सर्वस्व माननेवाले भौतिकवादीके लिये हानि- लाभ, जय-पराजयको समान समझना कहाँतक सम्भव है । किसी दाम्भिकके दम्भके भण्डाफोड़ होनेसे किसी युक्ति-शास्त्रसम्मत सिद्धान्तका अपलाप नहीं किया जा सकता । एजिल्सके 'डायलेक्ट्स आफ नेचर' पुस्तककी बाते भी पुरानी पड़ गयी हैं । वस्तुतः वैज्ञानिकोने ही प्रचलित जड़वाद एव विकासवादकी युक्तियोंका खण्डन करके एक अलौकिक शक्तिका महत्त्व सिद्ध किया है, जिसे हम विकासवादके खण्डन- के प्रसङ्गमें विस्तारसे दिखला चुके हैं ।

त्रयोदश परिच्छेद उपसंहार भारतीय राजनीतिक दर्शन पाश्चात्त्य देशोंमें दर्शन एवं शास्त्र शब्द बड़ा ही सस्ता बन गया है। किसी भी विचारको, जैसे गर्भशास्त्र, प्राणिशास्त्र, मार्क्सदर्शन आदिकी वे शास्त्र संज्ञा देते हैं। किंतु विश्वविख्यात भारतीय विद्वानोंने तो शास्त्र शब्दका प्रयोग मुख्य रूपसे अनादि अपौरुषेय वेदमें ही किया है। उन्हींमें प्रत्यक्षानुमानसे अनधि- गत धर्म, ब्रह्मादि तत्त्वबोधन क्षमता है--'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते। एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता ॥', 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्र० सू० १।१।३) में शास्त्र शब्दका ऋग्वेदादि अर्थ ही उक्त है। जैसे रूप आदिके सम्बन्धमें चक्षु आदि स्वतन्त्र प्रमाण हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म आदि अतीन्द्रिय-अचिन्त्य विषयोंमें स्वतन्त्ररूपसे अपौरुषेय वेद ही प्रमाण हैं। अन्य तदाश्रित तदुपबृंहित आर्ष धर्मग्रन्थोंमें तो प्रत्यक्षानुमानागमादि मूलकत्वेनैव प्रामाण्य है । अतएव शास्त्रत्व भी वेद- मूलक होनेसे ही उनमें सिद्ध होता है। प्रमाण, प्रमेय, साधन फलका प्रामाणिक निर्देश दर्शनका स्वरूप होता है। औत्सुक्यनिवृत्ति-जिज्ञासोपशान्तिमात्र पाश्चात्त्य दर्शनोंका उद्देश्य है। तद्भिन्नपरस्पराविरोधेन धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्ति एवं अव्यभिचरित तत्साधनोंका सम्यक् ज्ञान भारतीय दर्शनोंका उद्देश्य है । आजकलके कुछ समालोचकोंका कहना है कि 'पाश्चात्त्य देशोंके राजनीतिक दर्शन हैं, किंतु भारतमें कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। कारण, 'पाश्चात्त्य देशोंके विद्वान् राजनीतिक एवं दार्शनिक दोनों ही थे; किंतु भारतके राजनीतिज्ञ दार्शनिक नहीं थे ।' परंतु उनका यह कहना सर्वथा निराधार है । सबसे पहली बात तो यह है कि सर्वदर्शनोंका शिरोमणि वेदान्त है। वेदोंमें वेदान्त भी है, राजनीति भी है। मनु, याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्रोंमें दर्शन भी है, राजनीति भी है। व्यास सबसे बड़े दार्शनिक और सबसे बड़े राजनीतिज्ञ हैं । वेदान्तदर्शनके रचयिता व्यास ही महाभारतके रचयिता हैं । महाभारतका मोक्षधर्म, गीताका दर्शन और शान्तिपर्वका राजधर्म पढ़े तो उक्त मत सर्वथा निर्मूल सिद्ध हो जायगा । बृहस्पति, कणिक, कौटल्य, कामन्दक आदि सभी राजनीतिक दार्शनिक थे । योगवासिष्ठके वशिष्ठ महादार्शनिक एवं महाराजनीतिज्ञ थे । सूर्यवंशकी राजनीतिके वे ही कर्णधार थे । वस्तुस्थिति यह है कि पदवाक्यप्रमाणपारावारीण विद्वान् शब्द-शुद्धि आदिका कार्य पाणिन्यादि व्याकरणसे चलाते हैं, वाक्यार्थ निर्णयके लिये पूर्वोत्तर- मीमांसाका उपयोग करते हैं, अनुमान आदिके सम्बन्धमें न्याय वैशेषिकका उपयोग करते हैं तथा वे ही तत्त्व-संख्यान, चित्त-निरोध आदिमें सांख्य एवं योगका उपयोग कर लेते हैं। वे अगतार्थ अपूर्व वस्तुका ही प्रतिपादन करते हैं। पाश्चात्त्य लोग गतार्थ वस्तुओंका भी निरूपण करके स्वतन्त्र दार्शनिक बननेकी चेष्टा करते हैं ।

उपसंहार [पृ. ८२७]

राजनीतिक शास्त्र या दर्शनका कार्य राजाओं, शासकों एव तच्छासित भूखण्ड या अखण्ड भूमण्डल या प्रपञ्चमण्डलके प्राणियोंके लिये ऐहिक आमुष्मिक अभ्युदय एवं परम निःश्रेयस-प्राप्तिका प्रशस्त मार्ग और अनुष्ठान-सुविधा-प्रत्युपस्थापन करना है। तत्प्रबोधक अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्षग्रन्थ-मनु, नारद, शुक्र, वृहस्पति, अग्नि-मत्स्य-विष्णुधर्मादि पुराण, रामायण, महाभारत आदि राजनीतिक शास्त्र या दर्शन हैं। इस शास्त्रके अभिमत प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्था- पत्ति, अनुपलब्धि-ये छः प्रमाण हैं। मूलरूपमें सत्य-अनृत, चेतन अचेतन दो ही तत्त्व हैं। चेतनमें भी ब्रह्म, ईश्वर, जीव—तीन भेद हैं। अचेतनमें प्रकृति महान्, अहङ्कार आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी; श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण—पञ्च ज्ञाने- न्द्रियाँ, वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—पञ्च कर्मेन्द्रियाँ, प्राण, अपान, उदान व्यान, समान—पञ्चप्राण, मनोबुद्धिचित्ताहङ्कारात्मक अन्तःकरण—ये २४ भेद हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चतुर्वर्ग-प्राप्ति फल है। आचार्यपरम्परासे पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र तथा षडङ्ग वेदों एवं अन्य आर्षग्रन्थोंके आधारसे कर्त्तव्या- कर्त्तव्य-ज्ञानपूर्वक कर्त्तव्यपालन, अकर्त्तव्य-परिवर्जनसे धर्मकी प्राप्ति होती है । धर्माविरुद्ध अर्थशास्त्रोक्त उद्योगपरायण होनेसे अर्थकी प्राप्ति होती है, धर्मार्थाविरुद्ध कामशास्त्रोक्त मार्गसे शब्दादि साधनसामग्रीद्वारा काम-प्राप्ति होती है। औपनिषद परब्रह्मके तत्त्वविज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। आन्वीक्षिकी, न्यायोपबृंहित वेदान्तविद्या—ब्रह्मविद्या, त्रयी वेदोक्त धर्मविद्या, वार्त्ता, अर्थविद्या आदि सर्वपुरुषार्थोपयोगिनी विद्याओं का रक्षण एकमात्र राजनीतिसे ही सम्भव होता है । उसके बिना सभी विद्याएँ नष्ट हो जाती हैं । राजनीतिकी स्वरूपभूता दण्डनीतिके विप्लुत होनेसे सभी विद्याएँ विप्लुत हो जाती हैं । 'आन्वीक्षिकी त्रयी वार्त्ता सतीविद्याः प्रचक्षते। सत्योऽपि हि न सत्यस्याद्दण्डनीतेस्तु विभ्रमे।' (काम०नी० २।८) 'मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्।' (महा० शा० ६३।२८) आर्यमर्यादाकी रक्षा, वर्णाश्रम-व्यवस्था तथा त्रयीके प्रोत्साहनसे लोक- प्रसाद होता है अन्यथा लोकावसाद होता है । 'व्यवस्थितार्यमर्यादः कृतवर्णाश्रम- स्थितिः। त्रय्या हि रक्षितो लोकः प्रसीदति न सीदति ॥ (कौटलीय अर्थ० १।३।१७) देहेन्द्रिय मनोबुद्धि आदिसे भिन्न परलोकगामी कर्त्ता भोक्ता, आत्मा तथा परलोकमें विश्वासके अनन्तर ही धर्ममें प्रवृत्ति होती है कर्तृत्व-भोक्तृत्वशून्य, अच्छेद्य, अभेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, ब्रह्मात्मविज्ञानसे परम कैवल्यमोक्ष तथा जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है तथा निःसन्देह एव निर्भय होकर समष्टि विश्वहितसाधनार्थ राजनीतिक सन्धि-विग्रहादिमें सफल प्रवृत्ति हो सकती है। इसीलिये गीतामें 'नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि' आदिसे नित्य, शुद्ध, बुद्ध, आत्मस्वरूपका वर्णन है और राजर्षियोंको इस ब्रह्मविद्याका वेत्ता-वेदयिता बतलाया गया है । विश्व, विराट्, तैजस, हिरण्यगर्भ, प्राज्ञ, ईश्वर, कूटस्थ, ब्रह्मरूप व्यष्टि समष्टिके अभेद-बोधसे ही आत्महित एव विश्वहितमें एकता होती है । व्यष्टि

अभिमानरूप सङ्कीर्णताको बाधित करने तथा समष्टि-अभिमान उपोद्वलित होनेसे ही 'वसुधैव कुटुम्बकम्' का भाव उदित होता है। आत्मीयताके अभिमानके परिपाकसे आत्मत्वाभिमान या समष्टिमें अहंग्रहोपासना सम्पन्न होती है। व्यष्टि समष्टि, स्थूल-सूक्ष्म कारणकी अभेदभावना उपासना-कोटिमें परिगणित है। कूटस्थ ब्रह्मकी अभेदभावना तत्त्वसाक्षात्कार-पर्य्यवसायिनी ही होती है। व्यवहारदशामे भी इन भावनाओके फलस्वरूप कुल, गोत्र, जाति, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व आदि समष्टि जगत्के सम्बन्धमें आत्मीय हित तथा आत्महितके समान ही हिताचरण एवं अहितनिवारणार्थ निरासङ्ग प्रवृत्ति होती है।

शास्त्रीय शासनविधान

सभी प्राणी अमृतस्वरूप परमेश्वरके ही पुत्र हैं—'अमृतस्य पुत्राः' (श्वेता० उ० २।५) अर्थात् सभी देहादिभिन्न चेतन, अमल, सहज, सुखस्वरूप जीवात्मा स्वप्रकाश सच्चिदानन्द परमेश्वरके ही अंश हैं। जैसे महाकाशके अंश घटाकाश, अग्निके विस्फुलिङ्ग, गङ्गाजलके तरङ्ग आदि अंश हैं, वैसे ही अखण्डबोधस्वरूप परमेश्वरका बोधस्वरूप जीवात्मा अंश है। अतः सबकी सहज समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृत्ता ही माननीय है। जैसे मलिन भूमिके सम्पर्कसे निर्मल जल मलिन हो जाता है, कतक, निर्मली आदि औषधके सम्पर्कसे पुनः शुद्ध हो जाता है, वैसे ही अविद्याश्रयकर्मके सम्पर्कसे जीवात्मा मलिन होता है तथा कर्मोपासना, ज्ञान आदिसे पुनः प्रसन्न-निर्मल-निष्कळङ्क हो जाता है। भ्रातृत्ता, आत्मीयता तथा आत्मैक्यताके कारण सर्वजनहिताय-सर्वजनसुखाय राजनीति आवश्यक है। न वै राज्यं न राजासीन्न दण्डो न च दाण्डिकः । धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ (म० शां० ५९) कृतयुगमें सभी तत्त्ववित्, धर्मनिष्ठ, विवेकी तथा सात्त्विक होते हैं। सब एक दूसरेके पोषक, रक्षक, हितचिन्तक होते हैं। कोई किसीका शोषक नही होता। सब धर्मनियन्त्रित होकर परस्पर एक दूसरेके पूरक बनते हैं। तामस, राजस- भावकी वृद्धि, अधर्म-अनाचारके विस्तारसे सत्त्व एवं धर्मका ह्रास होता है। अतः मोहके प्रभावसे ब्रह्मात्मविज्ञान संकुचित होता है, काम-क्रोधका विस्तार होता है, तभी मात्स्यन्याय फैलता है। उस मात्स्यन्यायको रोककर सर्वसामञ्जस्य सर्वहित- सम्पादनार्थ राज्य-व्यवस्था होती है। अहिंसा, सत्यादि धर्मका प्रतिष्ठापन, ब्रह्मविज्ञान- विस्तार और दण्डविधान—ये ही मात्स्यन्याय निरोधके मूल उपाय हैं, यह कहा जा चुका है। चाणक्यके अनुसार 'सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलमर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यम्, राज्यमूलमिन्द्रियजयः, इन्द्रियजयस्य मूलं विनयः, विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा' (चाणक्य-सूत्र १–६)। सातिशय, निरतिशय—सर्वविधसुखका मूल धर्म है, परंतु धर्मका मूल अर्थ है। अर्थ रहनेपर ही धर्मानुष्ठान सम्भव होता है। अर्थका मूल राज्य है, राज्यका मूल इन्द्रियजय है, इन्द्रियजयका मूल विनय है, विनयका मूल वृद्धसेवा

उपसंहार ८२९ है । वृद्धोंकी सेवाका भी मूल विज्ञान है; इसलिये विज्ञानसम्पन्न होकर, जितात्मा होकर सर्वसुखार्थ प्रवृत्त होना आवश्यक है । मनुके अनुसार— आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः ॥ ततः स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम् । महाभूतानि वृत्तौजाः प्रादुरासीत् तमोनुदः ॥ (मनु० १ । ५-६) सम्पूर्ण जगत् सृष्टिके प्रथम नाम-रूपरहित, कल्पनातीत, अलक्षण, सर्वतःप्रसुप्त, तमोमय अर्थात् अनिर्वचनीय अज्ञान-विशिष्ट चिन्मात्र था । सर्वकारण परब्रह्म परमेश्वर स्वयम्भू भगवान् ही तमको अभिभूत करके इस अव्यक्त जगत्‌को व्यक्त करते हुए प्रादुर्भूत होते हैं । जैसे वसन्त, ग्रीष्म आदि ऋतुओंके बदलनेपर ऋतुलिङ्ग प्रकट होते हैं, उसी तरह प्राणी समयानुसार अपने-अपने कर्मोंको प्राप्त होते हैं । कर्मानुसार ही चराचर विश्वका उत्पादन भगवान् करते हैं—'यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम्' (मनु० १ । ४८) । कर्मानुसार ही विविध योनियोंमें प्राणियोंके जन्म होते हैं । कर्ममूलक सृष्टिका विस्तार वर्णाश्रम- व्यवस्थाका प्रतिपादन करके मनु कहते हैं कि समाजमें अराजकता होनेपर सारी प्रजा घबड़ाकर भयसे इधर-उधर भागने लगी, तब उसकी (प्रजाकी) रक्षाके लिये प्रजापतिने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र और कुबेर—इन आठ लोकपालोंके अंशसे राजाका निर्माण किया— अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् । रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभुः ॥ इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च । चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ (मनु० ७ । ३-४) देवताओंके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण ही राजा अपने तेजसे सब प्राणियोंको दबा लेता है । राजा बालक हो तो भी मनुष्य समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिये । उस राजाके लिये भगवान्‌ने सब प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले धर्मस्वरूप ब्रह्मतेजोमय दण्डका निर्माण किया । उस दण्डके भयसे ही स्थावर-जङ्गम सभी प्राणी अपने पदार्थोंका उचित उपभोग कर पाते हैं तथा अपने कर्त्तव्यसे विचलित भी नहीं होते— तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । भयाद् भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च ॥ (मनु० ७ । १५) दण्ड ही राजा, पुरुष, नेता, शासक और चारों आश्रमोंके धर्मका साक्षी है— स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः। चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः ॥ (मनु० ७ । १७)

८३० मार्क्सवाद और रामराज्य दण्ड ही सब प्रजाका शासक एव रक्षक है। सबके सोनेपर दण्ड ही जागता है। विद्वानोने दण्डको ही धर्म कहा है। विचारपूर्वक प्रयुक्त हुआ दण्ड प्रजाका अनुरञ्जन करनेवाला और अविचारित दण्डे प्रजाका विनाशक होता है। यदि राजा आलस्य छोड़कर दण्डका विधान न करे तो बलवान् प्राणी दुर्बलोंको वैसे-ही पकाकर खा जायें, जैसे लोग मछलियोको भूनकर खा जाते हैं। कौवा पुरोडाश खाने लग जाय, कुत्ता हवि चाटने लग जाय—किसी पदार्थपर किसीका स्वत्व न रहे और छोटे-बड़े तथा बड़े-छोटे हो जायें। सभी वर्ण दूषित हो जायें, मर्यादाएँ भङ्ग हो जायें और सारे ससारमें उथल-पुथल मच जाय— दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्डः सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥ समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः। असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः॥ यदि न प्रणयेद् राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रितः। शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तराः॥ अद्यात्काकः पुरोडाशं श्वा च लिह्याद् हविस्तथा। स्वाम्यं च न स्यात् कस्मिंश्चित् प्रवर्तेताधरोत्तरम्॥ दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिन्द्येरन् सर्वसेतवः। सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद् दण्डस्य विभ्रमात्॥ ( मनु ७ । १८-२१; २४ ) राजा दण्डका ठीक-ठीक विधान करनेवाला, सत्यवादी, विचारपूर्वक काम करनेवाला, बुद्धिमान् धर्म, अर्थ, और कामका ज्ञाता होना चाहिये, ऐसा मनु आदि धर्मशास्त्रकारोका मत है— तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्। समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥ ( मनु० ७ । २६ ) दण्ड बड़ा तेजस्वी है। अजितेन्द्रिय लोग ठीक-ठीक उसका विधान नही कर सकते । वह धर्मविचलित राजाको बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कर देता है । तथा दुर्ग, राज्य, स्थावर-जङ्गम जगत्, आकाशचारी देवगण और ऋषिगणको भी पीड़ित करता है। राजा या शासकको न्यायपूर्वक अपने राज्यकी प्रजाका पालन करना चाहिये । शत्रुओको उग्र दण्ड देना चाहिये । मित्रोके साथ छल-कपटका व्यवहार नहीं करना चाहिये । प्रेमीजनो और सज्जनोंके साथ सहिष्णुता रखनी चाहिये । ऐसा व्यवहार करनेवाला राजा भले ही कोषरहित हो, उसका यश ऐसा फैलता है, जैसे जलपर तैल-बिन्दु । राजाको चाहिये कि वह पवित्र विद्वान्, ब्राह्मण एवं वृद्धोंकी नित्य सेवा करे। ऐसा करनेसे राक्षस भी राजाका

सम्मान करते हैं तथा विनय ( जितेन्द्रियता, नम्रता ) भी प्राप्त होती है । अविनय ( उद्दण्डता ) से सुसमृद्ध राजा भी सपरिवार नष्ट हो जाते हैं और विनय- से जगलों में रहनेवाले कोषविहीन राजा भी राज्य पा लेते हैं । शिकार, द्यूत, दिवास्वप्न, निन्दा, स्त्री, मद ( नशा ), नृत्य, गीत, वादित्र और व्यर्थ घूमना ( हवाखोरी ), इन दश कामज व्यसनों तथा चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया ( गुणोंमें भी दोषदृष्टि ), दूसरेका धन छीन लेना, गाली-गलौज और मार-पीट— इन आठ क्रोधज व्यसनोंसे तथा इन दोनोंके मूल लोभसे राजाको अत्यन्त बचना चाहिये । कामज व्यसनमें मदिरापान, द्यूत, स्त्री और मृगया—ये चार तथा क्रोधज व्यसनमें गाली-गलौज, मारपीट और दूसरेका धन छीन लेना ये तीन बहुत ही भयंकर हैं । इनसे तो सर्वथा बचना चाहिये । अत्यन्त सुकर कर्म भी एक असहाय पुरुषद्वारा दुष्कर होता है । अतः राजाको शास्त्रज्ञानी शूर, लब्धप्रतिष्ठ, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री रखने चाहिये । संधि, विग्रह, सेना, खजाना, खेती, खान, रक्षा ( बन्दोवस्त ) आदिके विषयमें पृथक्-पृथक् प्रत्येककी राय जानकर विद्वान् ब्राह्मणके साथ विचारकर निर्णय करना चाहिये । राज्यका काम जितने लोगोंसे अच्छी तरहसे चल सके, उतने लोगोंको परीक्षा करके उपमन्त्री बनाना चाहिये । खान, चुंगी और कर वसूल करनेके लिये शूर पवित्र निर्लोभ लोगोंको और पापभीरु लोगोंको घर आदिके प्रबन्ध- सम्बन्धी काममें लगाना चाहिये । इसी तरह सर्वशास्त्र विशारद इङ्गित आकार और चेष्टा जाननेवाला पवित्र कुशल कुलीनको दूत बनाना चाहिये । दूत-अनुरक्त, पवित्र, चतुर, स्मृतिशाली, प्रतिभासम्पन्न, देश-काल—परिस्थितिका ज्ञाता, सुन्दर, निर्भीक और वाग्मी होना चाहिये । सेनापतिके अधीन चतुरङ्गिणी सेना, सेनाके अधीन युद्ध तथा विनय सिखाना, राजाके अधीन खजाना और राज्य तथा दूतके अधीन संधि विग्रह होते हैं । दो राजाओंमें मेल कराना या मिले हुए राजाओंको परस्पर लड़ा देना, यह दूतका काम है। कृषक जैसे खेतमेसे घासको निकालकर धान्यकी रक्षा करता है, उसी तरह राजा दुष्टोंका निग्रहकर प्रजाकी रक्षा करे । जैसे शरीरको कष्ट देनेसे प्राणोंका क्षय होता है, उसी तरह राष्ट्रको पीड़ा पहुँचानेसे राजाके प्राणोंका क्षय होता है । जो राजा अज्ञानवश राष्ट्रको पीड़ा पहुँचाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसमेत जीवनसे भ्रष्ट हो जाता है । राजाको लगानवसूली, नौकरोंका मासिक वेतन, मन्त्री आदिको बाहर भेजना, किसीको हानिकर काम करनेसे रोकना, किसी कामको कराना, मुकद्दमो- का निर्णय, अपराधियोंको दण्ड, पापियोंका प्रायश्चित्त, पाँच प्रकारके गुप्तचर,

८३२ मार्क्सवाद और रामराज्य प्रजाका प्रेम या असंतोष और अन्य राजाओके व्यवहार, इन बातोपर भलीभाँति विचार करना चाहिये । मध्यम ( अपने और शत्रुदेशके बीचका राजा ) का व्यवहार, विजिगीषु ( अपनेको जीतनेके लिये आनेवाले राजा ) का कर्म तथा उदासीन और शत्रु की कार्यवाहियोपर पूरी दृष्टि रखनी चाहिये । द्वादश राजन्य-मण्डलकी चार मूल-प्रकृतियाँ हैं— (१) मध्यस्थ, (२) विजिगीषु, (३) उदासीन और (४) शत्रु । अर्थात् इनके वशमें रहनेसे सभी राष्ट्र वशमें रहते हैं । आठ और प्रकृतियाँ हैं—मित्र, शत्रु-मित्र, मित्र-मित्र, अरि-मित्र, आक्रन्द, पाष्णिग्राह, आक्रन्दासार और पाष्णिग्राहासार । इन प्रत्येककी मन्त्री, राष्ट्र (प्रजा), दुर्ग, खजाना और शासन-विभाग—ये पाँच-पाँच प्रकृतियाँ होती हैं, इस तरह ६० प्रकृतियाँ हुई । और मूल १२ मिलकर सब ७२ हो गयीं । अपनी चारो ओरकी सीमाके राजा तथा उनके मित्रोंको शत्रु समझना चाहिये । उनसे आगेके राजाओको अपना मित्र और उनसे भी आगेके राजाओको उदासीन समझना चाहिये । इन सबको साम, दान, भेद और दण्ड—इन प्रत्येक उपायोसे अथवा सभी उपायोसे सबको अथवा अधिक-से-अधिक जितने बने रह सके, उनको मित्र बनाये रखना चाहिये । यद्यपि आज परिस्थिति बदली हुई है, तथापि रूपान्तरसे यह शत्रु-मित्रकी व्यवस्था आज भी अक्षुण्ण ही है । संधि, विग्रह (लड़ाई), यान (चढ़ाई), आसन (किलेके अदर ही बद रहना), द्वैधीभाव (भेद) और संश्रय (किसी बलवान्‌का आश्रय)—इन छः गुणोका बराबर विचार करना चाहिये । एक साथ काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना तथा पृथक्-पृथक् काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमे होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना—ये संधिके दो भेद हैं । शुद्ध संधिमूलक ही शान्ति होती है । आस्तिकता तथा धर्म-प्रधानताके बिना संधियाँ अनेक हेतुओसे अव्यवस्थित रहती हैं, इसीलिये शान्ति भी अव्यवस्थित रहती है । अतः धर्मनिष्ठा तथा आस्तिकता ही शुद्ध संधि एवं स्थिर शान्तिका मूल मन्त्र है । अपने विजयके लिये लड़ना और मित्रकी हानिके निमित्त मित्रके शत्रुसे लड़ना—ये विग्रहके दो भेद हैं । आपद्ग्रस्तशत्रुको देखकर उसपर अकेले चढ़ाई करना अथवा मित्रकी सहायतासे चढ़ाई करना—ये यानके दो भेद हैं । सैन्य-बल कमजोर देखकर किलामें रह जाना अथवा मित्रके अनुरोधसे किलामे रह जाना— ये आसनके दो भेद हैं । सेनामें फूट डाल देना अथवा दो मित्र राजाओमें फूट डाल देना—ये भेदनीतिके दो प्रभेद हैं । शत्रुसे पीड़ित होकर किसी बलवान्‌का आश्रय लेना अथवा शत्रु पीड़ा न पहुँचावे इसलिये किसी बलवान्‌का आश्रय लेना—यह दो प्रकारका संश्रय है ।

उपसंहार ८३३ संधि करनेसे भले ही थोड़ी तात्कालिक पीड़ा हो, किन्तु भविष्यमें लाभ हो तो संधि अवश्य कर लेनी चाहिये। जब सारी प्रकृति सन्तुष्ट हो और कोष तथा युद्धके साधन पर्याप्त हो, तब युद्ध करना चाहिये। जब अपनी सेना हृष्ट-पुष्ट- सन्तुष्ट हो और शत्रुसेना दुर्बल तथा असन्तुष्ट हो, तब भी युद्ध करना चाहिये। जब सेना, वाहन और कोष क्षीण हो तो शत्रुसे समझौतेकी बातचीत करते हुए अपने दुर्गमें ही रहना चाहिये। जब राजा देखे कि शत्रु बलवान् है तब अपनी सेनाका दो विभागकर एक विभाग लड़ाईपर भेजे और एक विभागको शत्रु की सेनामें भेजकर शत्रु-सेनाके लोगोंको अपनी ओर मिला लेना चाहिये। यदि राजा देखे कि शत्रु अब हमें जीत लेगा, तो झट किसी ऐसे बलवान् धर्मात्मा राजाका आश्रय ले ले जो अपनी दुष्ट प्रजा और शत्रुको भी दण्ड दे सकता हो तथा गुरुके समान प्रत्येक प्रकारसे उसकी सेवा करनी चाहिये। यदि उसका आश्रय लेनेपर भी कोई लाभ न हो, अपितु हानि होनेकी ही सम्भावना हो, तो बेखटके युद्ध ही करना चाहिये। गुण-दोष विचारकर भविष्यका निर्णय करनेवाले, वर्तमान-निर्णय

सन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितो दूतसञ्ज्ञकः । स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयुः प्रथमं त्विमे ॥ अमात्यः साधु लिखितमित्येतद् प्राग् लिखेद्यम् । सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्ततः ॥ सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम् । अङ्गीकर्तुं योग्यमिति ततः प्रतिनिधिर्लिखेत् ॥ अङ्गीकर्तव्यमिति- च युवराजो लिखेत् स्वयम् । लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहितः । स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युुरेव हि ॥ ( शुक्रनीति २ । ३५५-३५९ ) मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोको लेकर विचार करना चाहिये । फिर जो बहुमत हो उसे स्वीकार करना चाहिये-- पृथक्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् । विमृशेत् स्वमतेनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम् ॥ जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है । जो प्रजाका रक्षक बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये-- अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिपः । स संहृत्य निहन्तव्यः श्वेव सोन्माद आतुरः ॥ ( शुक्रनीति ) इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृङ्खल नहीं होता था । आजके लोकतन्त्र-शासनका आधार मुण्ड-गणना है । इसके अनुसार योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता है । बहुमत जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमे शासनसूत्र आ जाता है । विधान-सभा एव लोक- सभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना । पर स्थिति यह है कि भारतमें सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं जो कानूनसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं । उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य वकीलोंका सहारा लेते हैं; परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं । साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदो एव मन्वादि धर्मशास्त्रोको ही राष्ट्रका संविधान एव कानून मानते हैं । उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञ एवं सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान-निर्णेत्री है, विधान-निर्मात्री नहीं । शासन-परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है । राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने-आपको शास्त्र एव आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा विनयसे युक्त बनाये । पुनः अपने पुत्रो, मन्त्रियोको विनययुक्त बनाये, पश्चात् भृत्यो एव प्रजाको विनययुक्त बनाये-

उपसंहार ८३५ आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत् । ततः पुत्रांस्ततोऽमात्यान् ततो भृत्यान् ततः प्रजाः ॥ ( शुक्रनी० १ । ९८ ) राजाको व्यसनमुक्त होना चाहिये । कठोर भाषण, उग्र दण्ड, अर्थ- दूषण, सुरापान, स्त्री, मृगया और द्यूत--ये राजाके लिये भीषण व्यसन हैं । पीछे अष्टादश व्यसनोंकी चर्चा आयी ही है-- वाग्दण्डयोश्च पारुष्यमर्थदूषणमेव च । पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनानि महीपतेः ॥ ( कामन्दकीयनीतिसार १४ । ६ ) मन्त्रीके लिये भी ये सब दूषण हैं । आलस्य, स्तब्धता, घमण्ड, प्रमाद, वैरकारिता आदि ये और भी मन्त्रीके व्यसन हैं । दक्षता, शीघ्रता, अमर्ष, शौर्य एवं उत्साह आदि गुणोंसे युक्त ही राजा होना चाहिये-- दाक्ष्यं जैघ्र्यं तथामर्षः शौर्यं चोत्साहलक्षणम् । गुणैरेतैरुपेतः सन् राजा भवितुमर्हति ॥ ( कामन्दकीयनीति० ४ । २३ ) मन्त्रियोंके उपयोगी और भी बहुत-से गुण कहे गये हैं । जिनके बिना शासन करनेकी योग्यता ही नहीं हो सकती है । स्वावग्रहो जानपद कुलशीलग्लान्वितः । वाग्मी प्रगल्भश्चक्षुष्मानुत्साही प्रतिपत्तिमान् ॥ स्तम्भचापलहीनश्च मैत्रः क्लेशसहः शुचिः । सत्यसत्त्वधृतिस्थैर्यप्रभावारोग्यसंयुतः ॥ कृतशिल्पश्च दक्षश्च प्रज्ञावान् धारणान्वितः । दृढभक्तिरकर्ता च वैराणां मन्त्रिणो भवेत् ॥ स्मृतिस्तत्परतार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चयः । दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिसम्पत्प्रकीर्तिता ॥ ( कामन्दकीयनीति० ४ । २८-३१ ) आत्मनियन्त्रित, स्वदेशस्थ, कुलीन, शीलवान्, बलवान्, वाग्मी, निर्भीक, शास्त्रज्ञ, उत्साही, प्रत्युत्पन्नमति, निरभिमान, अचञ्चल, मैत्रीवर्धक, सहिष्णु, पवित्र, धैर्य-स्थैर्य-सत्य एवं सत्त्वसे युक्त, प्रतापी, नीरोग, शिल्पज्ञ, दक्ष, बुद्धिमान्, धारणावान्, स्वामिभक्त तथा उससे कभी वैर-विद्वेष न करनेवाला सचिव होता है । स्मृतिमान्, पुरुषार्थ-तत्पर, विचारशील, निश्चित ज्ञानवाला, दृढता, मन्त्रगुप्ति, क्षमता आदि गुणोंसे युक्त मन्त्री हो । मन्त्रियोंकी योग्यता राजाको स्वयं प्रत्यक्ष देखकर, परोक्ष ( परोपदेश ) से तथा अनुमानसे ( कार्य देखकर यह जान लेना कि कितना कार्य नहीं किया ) जाननी चाहिये--

‘प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया राजवृत्तिः । स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम् । परोपदिष्टं परोक्षम् । कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम् ।’ ( कौ० अर्थ० १ । ९ । ११ - १३ ) वाद, जल्प, वितण्डा, रूप कथाके प्रसङ्गसे मन्त्रीकी प्रगल्भता, निर्भीकता, प्रतिभा एवं वाक्कुशलताको जाना जाता है । उसी प्रसङ्गसे सत्यवादिताका भी पता लग जाता है । अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसङ्गवशात् प्रत्यक्षसे ही जाना जा सकता है । आपत्तिके समय उत्साह, प्रभाव तथा क्लेश, सहिष्णुता, धैर्य, अनुराग, स्थिरताका परिज्ञान होता है । भक्ति, मैत्री तथा स्थिरताका परिज्ञान व्यवहारसे करना चाहिये— उत्साहं च प्रभावं च तथा क्लेशसहिष्णुताम् । धृतिं चैवानुरागं च स्थैर्यं चापदि लक्षयेत् ॥ भक्तिं मैत्रीं च शौचं च जानीयाद् व्यवहारात । ( काम० नीतिसार ४ । ३७-३८ ) मन्त्रीकी शास्त्रज्ञता एवं शिल्पज्ञता तत्-तद् विद्याओके विद्वानोंसे जानना चाहिये । उसके स्वजनोंसे कुल, स्थान एवं संयमका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये । कर्ममें प्रयुक्तकर दक्षता, विज्ञान एवं धारयिष्णुताकी परीक्षा होती है । सहवासियों, पड़ोसियोंसे उसके बल, सत्त्व (शक्ति), आरोग्य, शील, अस्तब्धता एवं अचापलका ज्ञान हो सकता है । दारुण कृच्छ्र उत्पन्न होनेपर उसकी कुलीनताका ज्ञान हो सकता है, क्योंकि दारुण अवसरपर ही स्वच्छहृदय कुलीन अपनी विशेषताको दिखलाता है— साधुतैषाममात्यानां तद्विद्येभ्यस्तु बुद्धिमान् । चक्षुष्मत्तां च शिल्पं च परीक्षेत गुणद्वयम् ॥ स्वजनेभ्यो विजानीयात् कुलं स्थानमवग्रहम् । परिकर्मसु दाक्ष्यं च विज्ञानं धारयिष्णुताम् ॥ गुणत्रयं परीक्षेत प्रागल्भ्यं प्रतिभां तथा । संवासिभ्यो बलं सत्त्वमारोग्यं शीलमेव च । अस्तब्धतामचापल्यं वैरिणां चापि कर्तृताम् ॥ समुत्पन्नेषु कृच्छ्रेषु दारुणेष्वप्यसंशयम् । दर्शयत्यच्छहृदयः कुलीनश्चतुरस्रताम् ॥ ( काम० नी० ४ । ३४ - ३६; ३९, ६९ ) आचार्य, संत, महात्मा और विद्वान् ही विद्याओके प्रकाशक, प्रवर्तक तथा संचालक होते हैं । राजा भी विद्वानोंसे ही राजनीतिका विज्ञान प्राप्त करता है । इसीलिये स्वराज्यकी स्थापनामें मित्र-लाभादिसे भी प्रथम विद्या-चिन्तनका ही निर्देश किया गया है; क्योकि सम्पूर्ण लोकस्थिति ही विद्यापर निर्भर होती है । तत्रायं प्रथमोपाय. यद् विद्यावृद्धैः सार्धं विद्याचिन्ता । विद्याप्रति- बद्धत्वाल्लोकस्थितेः ॥ ( नीतिवाक्यामृत )

८३७ उपसंहार राजाको सक्रिय विद्वानोंके साथ बैठकर विनययुक्त होकर आन्वीक्षिकी, त्रयी वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्तां दण्डनीतिं च पार्थिवः । तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेद् विनयान्वितः ॥ (का० नी० २ । १) वात्स्यायनने भी भूमि, हिरण्य, पशु, धान्य, भाण्डोपस्कर मित्रादिके पहले विद्याके ही उपार्जन एवं वर्धनको अर्थ माना है—विद्याभूमिहिरण्यपशुधान्य- भाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जितस्य विवर्धनमर्थः । (वात्स्या० कामसूत्र १।२।१०) मधुकरकी वृत्तिसे राजाका संगृहीत कोष भी अपने उपभोगार्थ न होकर प्रजाहितार्थ ही होना चाहिये। शास्त्रधर्मनियन्त्रित शासन ही रामराज्य है। इसमें प्रजाकी रुचि तथा सम्मतिका पूरा ध्यान रखा जाता है, तथापि शास्त्र एवं धर्मविरुद्ध बहुमतके आधारपर कोई अनर्थ नहीं किया जाता । फिर भी जहाँ अनेक जाति उपजाति तथा सम्प्रदायके लोग बसते हों, वहाँ सबके धर्म, संस्कृतिकी रक्षा होनी चाहिये । किसीके देवस्थान, धर्मग्रन्थ, आचार्य एवं आचार व्यवहारकी अव- हेलना कदापि न होनी चाहिये । सभीके धर्मका निर्णय उन-उन सम्प्रदायोंके धर्मग्रन्थों तथा धर्माचार्योपर ही छोड़ा जाना चाहिये । शासनका उसमें हस्तक्षेप न होना चाहिये। राष्ट्रके परमोपकारक गोवंशका सभी दृष्टिसे पालन होना चाहिये । उसका वध सर्वथा अवरुद्ध होना रामराज्यकी विशेषता है। देशको सर्वथा अखण्ड रखना चाहिये । प्रान्तों या राज्योंको अपने घरेलू मामलोंमे स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये । पर राष्ट्रहितके व्यापक कार्यमें सम्पूर्ण देशकी एक नीति रहनी चाहिये । राजा या राष्ट्रपति किंवा शासनपरिषद्के नीचे आठ विद्वानोंकी एक परिषद् होनी चाहिये । ये विद्वान् वेद, धर्मशास्त्र, राजनीति, समाजनीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि विद्याओं तथा विविध भाषाओ एवं देशविदेशकी नीतिके वेत्ता हों । यदि सभी सब विषयोंके ज्ञाता न भी हों तथापि पूरी परिषद् मिलकर उपर्युक्त विषयोंकी पूरी जानकारी अवश्य रखे । परिषद्के सदस्य अपनी सहायताके लिये पृथक्-पृथक् परामर्शसमिति भी रख सकते हैं। प्रजाकी सम्मति, रुचि तथा आन्तरिक स्थिति एवं शासनप्रणालीके सुपरिणाम, दुष्परिणाम जाननेके लिये एक लोकसभा होनी चाहिये । उसके सदस्य प्रजाप्रिय हों । उन्हें प्रजाकी सम्मतिसे उपर्युक्त अमात्य परिषद् ही नियुक्त करेगी । मुण्डगणनाके आधारपर यह कार्य न होना चाहिये । राजा, प्रजा, अमात्यमण्डल सभीमें ईश्वरपरायणता और धर्मनिष्ठा होनेसे शासनव्यवस्था ठीक चल सकेगी। वैसा न होनेसे छल, कपट तथा मिथ्या आचरणका ही बोलबाला रहेगा । धर्मनिष्ठाके बिना कानूनकी वञ्चना ही

८३८ मार्क्सवाद और रामराज्य जाती है। परंतु यदि धर्मनिष्ठा है, तो अपराधी स्वयं अपराध व्यक्त करके शुद्धिके लिये दण्ड माँगता है । भारतमें आज भी गोहत्या आदि होनेपर अपराधी 'मिताक्षरासे' व्यवस्था माँगने स्वयं जाता है । वैसे तो सभीको धर्मात्मा तथा ईश्वरविश्वासी होना चाहिये । विशेषकर अमात्यमण्डल और उससे भी अधिक राजाको वैसा अवश्य होना चाहिये । गुणवान् पुरुष थोड़े होनेसे दुर्लभ होते हैं । अतः जहाँतक हो सके, अधिकार थोड़े ही लोगोंके हाथमें होने चाहिये । इसीलिये राजा और अमात्योंका हर समय बदलते रहना ठीक नहीं, यही राजतन्त्रका अभिप्राय है । युद्ध आदिके समय लोकतन्त्रमें भी एकहीके हाथमें अधिकार देने पड़ते हैं। अधिक लोगोंकी अपेक्षा थोड़े लोगोंको साधु-सज्जन बनानेमें सरलता होती है । यदि वंशपरम्पराका राजा हो, तो वह अपने ऊपर अधिक जिम्मेदारीका अनुभव करता है । अतः यथासम्भव वैसा ही राजा होना चाहिये । यदि वैसा न मिले, तो किसी योग्य व्यक्तिको राष्ट्रपति बनाना चाहिये । शीघ्र बदलते रहनेसे किसी योग्य व्यक्तिको भी अपनी नीति कार्यान्वित करनेका पूरा समय नहीं मिल पाता । इसके अतिरिक्त सामान्य व्यक्तिको थोड़े ही दिनोंमें स्वार्थसिद्धिकी चिन्ता लग जाती है, जिससे प्रजाके कल्याणमें बाधा पड़ती है । अतः यह आवश्यक है कि राजा या राष्ट्रपतिको जीवनपर्यन्त या दीर्घकालके लिये नियुक्त किया जाय । किंतु कर्त्तव्यच्युत होनेपर उसको हटाना आवश्यक है। राजाके स्थानकी पूर्ति उसका योग्य उत्तराधिकारी न होनेपर मन्त्रियोंद्वारा होनी चाहिये । मन्त्रिमण्डलमें किसीकी मृत्यु होने अथवा किसीके हटानेपर शेष मन्त्रियोंके परामर्शसे राजाको नयी नियुक्ति करनी चाहिये । राजा, अमात्य, कोष, सेना और न्याय—ये राज्यके पाँच मुख्य विषय हैं। ग्राम, मण्डल, प्रान्तके भेदसे उत्तरोत्तर अधिक शक्तिशाली अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । कोषके लिये सर्वत्र कर-संग्रह विभाग रहने चाहिये । रक्षा- विभाग तथा न्यायविभागकी भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये । रक्षाके लिये सेना दो प्रकारकी होनी चाहिये—एक वह जो प्रतिदिनकी शान्ति स्थापित रखे अर्थात् पुलिस और दूसरी वह, जो विशेष अवसरपर शत्रुके साथ युद्ध करे । न्यायालय प्रत्येक विभागके लिये पृथक्-पृथक् होना चाहिये । मण्डल और प्रान्तमें बड़े-बड़े न्यायालय और सम्पूर्ण राष्ट्रका एक सर्वोच्च न्यायालय होना चाहिये । अन्तिम न्यायालयमें अमात्यमण्डल तथा राजाको न्याय करनेका अधिकार होना चाहिये । न्यायाध्यक्षके पदपर धर्मात्मा, विद्वान् तथा सदा- चारी व्यक्तियोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सम्पूर्ण स्थितिका पूर्ण परिचय रखनेके लिये गुप्तचरविभाग होना चाहिये । उसका कार्य केवल अपराधी या

उपसंहार ८३०

राजाके विरोधियोंका पता लगाना ही नहीं, किंतु लोकसेवी, परोपकारी, सदा- चारी विद्वानों तथा दुखी आर्तोके सम्बन्धमें भी सरकारको सूचित करते रहना चाहिये, जिससे निग्रहानुग्रह आदिमें पूरी सहायता मिल सके । कोषका उपयोग उपर्युक्त विभागोंके सचालन, शस्त्रास्त्रनिर्माण तथा सग्रह, यातायात- साधनोंका निर्माण तथा व्यवस्था और राष्ट्रके स्वास्थ्य तथा शिक्षा आदिमें होना चाहिये प्रचार, यातायात, परराष्ट्रसम्बन्ध एक विभागमे, डाक, तार, शिक्षा, स्वास्थ्य दूसरेसे और उद्योग, खाद्य आदि तीसरे विभागसे सम्बद्ध हों तो अच्छा है । इसी तरह कोष, न्याय एव सेनाकी व्यवस्था होनी चाहिये । आजकल एक सबसे बडा विभाग व्यवस्थापनका अर्थात् कानून बनानेका है, जिसके लिये धारासभाओका निर्वाचन होता है । परन्तु अपने यहाँ तो इसकी आवश्यकता ही नहीं। केवल विशिष्ट विद्वानोंकी एक निर्णेत्री परिषद् होनी चाहिये, जो मनु, याज्ञवल्क्य, वृहस्पति, नारद, अङ्गिरा, पराशर आदिके मतानुसार ठीक-ठीक व्यवस्था दे सके । अहिंदुओके लिये उनके धर्मशास्त्रा- नुसार उनके आचार्योंकी व्यवस्था होनी चाहिये । भारतीय धर्मशास्त्र और राजनीतिके सम्यक् विद्वान् ही व्यवहारमें शास्त्रार्थके अधिकारी होंगे । व्यवहार- निर्णायक न्यायाध्यक्ष स्वधर्मनिष्ठ एवं ईश्वर-विश्वासी होना चाहिये । अमात्य- मण्डलको राजाके आज्ञानुसार सभी कर्मचारियोके नियोजन, पृथक्करण, संशोधन आदिका अधिकार होना चाहिये । गुप्तचरोंके अतिरिक्त विशिष्ट व्यक्तियोंकी एक अन्वेषण-समितिद्वारा जटिल विषयोंकी जानकारी प्राप्त करनेका प्रयत्न होना चाहिये । अमात्यमण्डलके सदस्य और राजा सर्वसाधारणके लिये दुर्दर्श, दुर्लभ न होकर सुदर्श और सुलभ रहे, जिसमें प्रजा उनसे अपनी स्थिति निवेदन कर सके । ऐसे अनेक स्थान होने चाहिये, जहाँ नियतसमयपर अर्थी आकर अमात्यों या राजासे मिल सके । मन्त्री तथा राजाओंको भी गुप्त वेषसे प्रजाकी स्थिति तथा राजकर्मचारियोंका व्यवहार जानना चहिये । इस मार्गसे गुप्त तथा जटिल रहस्योंका भी पता लग सकता है । हिंसा मद्यपान, व्यभिचार, द्यूत आदिपर कडा नियन्त्रण होना चाहिये । प्रत्येक पदपर सच्चे और शुद्ध अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये । पुलिस प्रजाकी सेवक बनकर नम्रतापूर्वक काम करे, पर साथ ही दुष्टदमनार्थ आवश्यक उग्रताका निषेध न होना चाहिये । प्राचीन ढगपर ग्रामपचायतें विधिवत् स्थापित होनी चाहिये । आपसी झगड़े वही तय हुआ करे, जिसमे न्यायालय जानेकी आवश्यकता ही न पड़े । पंचायतोंका काम ठीक होता है या नहीं, इसकी देख-रेखके लिये एक निरीक्षक-विभाग होना चाहिये । क्रय विक्रयके सम्बन्धमें यथासम्भव ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये कि अन्नवाले अन्न, तेलवाले तेल, गुड़वाले गुड़ दें । नाई, धोवी आदि अपना काम करें जिसके बदलेमें

८४० मार्क्सवाद और रामराज्य उन्हे अन्न मिले । यथासम्भव नकद क्रय-विक्रयके स्थानपर वस्तु-विनिमय होना चाहिये और जिसका जो परम्पराप्राप्त व्यवसाय है, उसे वही करना चाहिये । इस तरह परस्पर सम्बन्ध स्थापित रखनेमें सुविधा होगी । जहाँतक हो प्रजाको विशुद्ध क्षत्रियवंशका राजा, विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित तथा महामात्य बनाना चाहिये । न्यायाध्यक्ष तथा अध्यापकके पदपर भी ब्राह्मणोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये । सेनापतिके पदपर पवित्र वीर क्षत्रिय तथा सैनिक भी अधिक- तर कुलीन क्षत्रिय ही होने चाहिये । कोषाध्यक्ष वैश्य तथा सेवाध्यक्ष शूद्र होने चाहिये । चर्मके व्यापारो तथा यन्त्रोंके अध्यक्ष चर्मकार होने चाहिये । शुचिता (सफाई) विभागका अध्यक्ष अन्त्यज होना चाहिये । इसी तरह प्रायः सभी यन्त्र, शिल्प, कल-कारखाने आदिपर शूद्रोंका ही प्राधान्य रहना चाहिये । सर्वसाधारणके व्यवहारमें आनेवाली राष्ट्रकी भाषा हिंदी होनी चाहिये । पर विशिष्ट विवरणोंमें संस्कृतका प्रयोग आवश्यक है । राजाको उदार, सौम्य, धार्मिक, निर्व्यसन, विद्वान्, शुद्ध तथा रहस्यज्ञ होना चाहिये । उसे वेदान्त, न्याय तथा दण्डनीतिका विद्वान् और अपने दोषोंका ज्ञाता होना चाहिये । कोई काम करनेके पहले उसपर उसे स्वयं तथा मन्त्रियोंके साथ एकान्तमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये । किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्यमें शुभ मुहूर्त्त, नीति और आथर्वणिक प्रयोगोंका उपयोग किया जा सकता है। अच्छा तो यह है कि राजा योग्य व्यक्तियोंद्वारा श्रौत-स्मार्त्त- कर्मोंका अनुष्ठान करता रहे। राजाका कर्त्तव्य है कि वह अप्राप्त धन, भूमि आदि वस्तु धर्ममार्गसे प्राप्त करे, प्राप्तकी रक्षा करे तथा उन्हे बढाये और फिर उन्हे पात्रोमे प्रदान भी करे । दत्त वस्तुओंका आगामी राजाओंद्वारा भी पालन होता रहे, इसलिये दानपत्र आदिका उचित उल्लेख होना चाहिये । राज- धानी ऐसे प्रदेशमें होनी चाहिये जो रम्य हो और जहाँ मनुष्योंके लिये अन्न तथा पशुओके लिये चारा पर्याप्त मिल सके । वहाँ विस्तृत दुर्ग (किला) बनवाना चाहिये, जिसमें जन, धनकी पूर्ण रक्षा हो सके । राजाको चाहिये कि वह विद्वान् ब्राह्मणोंके प्रति क्षमाशील, शत्रुओंके प्रति क्रोधयुक्त और भृत्यवर्ग तथा प्रजाओके प्रति पिताके समान हो । प्रजाके पुण्यका छठा भाग राजाको मिलता है, अतः न्यायसे प्रजाका पालन ही राजाके लिये सबसे बड़ा धर्म और दान है । अन्यायियोंसे ठीक रक्षा न कर सकनेके कारण प्रजाके पापोंका आधा भाग राजाको मिलता है, अतः उसे सदा सावधान रहना चाहिये । राजनीतिके अयोग्यौँ, नास्तिकोंके हाथमें जाते ही विद्वानोंके भी मुँह बंद हो जाते हैं । शुक्राचार्यके पुत्र षण्डामर्क-जैसे योग्य विद्वान् भी हिरण्यकशिपु-जैसोंको ही ईश्वर बतलाने लगते हैं । वे किसी अयोग्य शासकको भी 'त्वमर्कस्त्वं सोमः' (शिवमहिम्न०) कहने लगते हैं । शासकोसे भयभीत विद्वान् स्पष्ट सत्य कहनेमे हिचकने लगते हैं ।

आचार्य, साधु-संत भी या तो चुप साध लेते हैं, या सरकारी साधुसमाजमें प्रविष्ट होकर ईश्वर गुणगानके बदले सरकारका गुणगान करने लगते हैं । गोहत्या, धर्म- हत्या, शास्त्रहत्या जैसे जघन्य कृत्योंको होते देखकर भी वे मौन रह जाते हैं और इन सबके प्रवर्तक, प्रेरक सरकारका गुणगान करते हैं। रावणकी मायासे बने अनेकों हनुमान् देखकर जैसे बन्दर भ्रममें पड़ गये कि इनमेंसे कौन रामके हनुमान् हैं, कौन रावणके हनुमान्, उसी तरह जनता भी भ्रममें पड़ जाती है कि कौन रामके साधुसंत हैं और कौन सरकारी साधुसंत ? शास्त्र एवं धर्मके नियन्त्रण शून्य उच्छृङ्खल शासक जनताके धर्मके साथ धनका भी अपहरण कर लेते हैं। राष्ट्रिय- करण, समाजीकरण आदि नामोंसे जनताकी व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदि छीन लेते हैं। जनताके व्यक्ति शासनयन्त्रके नगण्य पुर्जे बन जाते हैं। शासन- यन्त्र तानाशाह शासकोंके हाथका खिलौना बन जाता है। उच्छृङ्खल शासकोंकी इच्छा ही कानून-कायदा बन जाती है। सनातन सत्य, न्याय, विवेक, शास्त्र-मन्त्र लुप्त हो जाते हैं। धनहीन होनेके कारण जनतामे ऐसे शासनके विरोधकी भी शक्ति नहीं रह जाती। आजके सरकारी साधुसमाजका यह प्रस्ताव कि 'साधुसमाज गोहत्या- बन्दी आन्दोलनका समर्थन नहीं कर सकता, क्योंकि वह ऐसे अपराधी साधुओं द्वारा चलाया गया है जिनसे साधु-समाजकी सत्ताको बहुत ठेस पहुँची है' आँख खोल देनेवाला है। विश्वनाथमन्दिर-हरिजनप्रवेश, हिन्दू-विवाह, तलाक आदि प्रश्नोंपर सरकारी साधुओं एवं सरकारी पण्डितोंका चुप रहना भी एक विचित्र बात है। आचार्य कहे जानेवाले लोगोंकी भीषण निद्रा या जान-बूझकर आँख मीचनेकी बात भी इसी ओर संकेत करती है कि राजनीतिके विप्लुत होनेके बाद सब विद्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं।

राजनीतिमें किसका अधिकार

कई लोग कहते हैं कि विद्वानों, महात्माओंको राजनीतिमें नहीं पड़ना चाहिये, परंतु राजनीतिका विद्वान् होना चाहिये । वे समारोहके साथ सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं कि राजनीतिका विद्वान् होना ही विद्वान्‌का अन्तिम कृत्य है, पर प्रत्यक्ष राजनीतिमें भाग लेना नहीं। वे समर्थ रामदास और चाणक्यकी प्रशंसा करते हुए भी उनके कर्तृत्वको दुर्लक्ष्य करते हैं। वे लोग 'मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्' (म० शां० ६३ । २८) का भी यही अर्थ करते हैं कि 'राजनीतिके जाने बिना त्रयी डूब जाती है'। पर 'दण्डनीति' का 'दण्डनीतिज्ञान' अर्थ करना असङ्गत है। वे इस बातपर ध्यान नहीं देते कि ब्रह्मज्ञानसे भिन्न सभी ज्ञान पराङ्ग ही होते हैं, स्वतन्त्र नहीं । भट्टपादकुमारिलका स्पष्ट कहना है कि 'सर्वमेव हि विज्ञानं संस्कारत्वेन गम्यते। पराङ्गं चात्मविज्ञानादन्यमित्यवधार्यताम्॥' (त प्रवार्तिक) पीछे कहा गया है कि सक्रिय विद्वानोंसे ही राजाको आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एव दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— 'तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेत' का० नी० २ । २) ब्रह्मात्मविज्ञान तो स्वसत्तामात्रसे अविद्या, तत्कार्यका निवर्तक होनेसे पुरुषार्थरूप है । ऐसे कतिपय स्थलोंको छोड़कर अन्यत्र सर्वत्र ही ज्ञान कर्तव्यके

बिना सफल नहीं होता। 'जानाति इच्छति अथ करोति' यह क्रम प्रसिद्ध है। जाननेसे इच्छा होती है, इच्छासे क्रिया होती है। 'यः क्रियावान् स पण्डितः' (सुभा० भं०) की कहावत प्रसिद्ध ही है। प्रयोगहीन शिल्पविज्ञान एवं शस्त्रादि- विज्ञानके तुल्य प्रयोगहीन राजनीति-विज्ञान भी व्यर्थ ही रहता है। क्रियाहीन तर्क-वितर्क एवं ज्ञान-विज्ञान, बुद्धि-व्यायाममात्र ही रह जाता है। रावणके समयमें ज्ञान-विज्ञानवाले ऋषियोंकी कमी न थी। फिर भी ऋषियोंका वध चालू था। रक्तघटका उपहार देनेपर भी रावणको संतोष नहीं हुआ था। ऋषियोंकी अस्थियोंका पहाड़ लग गया था। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछा मुनिन्ह लागि अति दाया॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥ (रामचरितमानस अरण्यकाण्ड) उस समय विश्वामित्रकी सक्रिय राजनीति ही सफल हुई। उसीके द्वारा राम मैदानमें आये और दुष्टोंका दर्प-दलन करके त्रयी-धर्मकी रक्षा एवं साधु- सत्पुरुषोंका पोषण किया। हाँ, जहाँ राजनीतिके योग्य प्रयोक्ता एवं प्रयोग-साधन ठीक उपलब्ध हों, वहाँ विद्वान् केवल उपदेशमात्र कर सकता है, परंतु जहाँ प्रयोक्ता, प्रयोग-साधन नहीं, वहाँ उनका अन्वेषण एवं निर्माण भी विद्वान्का ही काम है। राजाके अभावमें यह सब उत्तरदायित्व विद्वान्पर ही आता है। 'चाणक्य' ने यही सब किया था, समर्थ रामदासने भी यही किया। शुक्र, बृहस्पति आदि भी अनेक ढंगसे सक्रिय राजनीतिका प्रवर्तन करते थे। हाँ, विद्वान् राज्याधिकारके प्रलोभनमें न पड़े, यह अवश्य ठीक है। अतः ठीक राजनीति बिना त्रयी एव तत्प्रोक्त धर्म संकटग्रस्त हो जाता है। प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून्। ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वाः परिददे प्रजाः ॥ (मनुस्मृ० ९।३२७) प्रजापतिने सृष्टि रचकर वैश्योंको पशु दिया, ब्राह्मण एवं राजाको सारी प्रजा दी। अतः राजाके अभावमें विद्वानोंपर सर्वाधिक भार आ जाता है। विद्वान्, आस्तिक, सद्गृहस्थ एवं साधु-सत्पुरुषोंके बिना राजनीति सर्वथा उच्छृङ्खल लोगोंके हाथमें चली जाती है, फिर तो गुण्डागर्दीका ही शासन होने लगता है। अतः धार्मिक लोगोंके प्रवेशसे ही समस्या हल हो सकती है। यह ठीक है कि 'सच्छिक्षा एवं सद्विद्याके प्रचारसे सद्बुद्धि होती है, सद्बुद्धिसे सदिच्छा एवं सदिच्छासे सत्प्रयत्न होता है और सत्प्रयत्न ही सब प्रकारके सत्फलोंका स्रोत होता है। परंतु आज तो शिक्षा भी स्वतन्त्र विद्वानोंके हाथमें नहीं है। जिस विचारके शासक हैं, उसी विचारका समर्थन करनेवाली आजकी शिक्षा बनती जा रही है। स्वतन्त्र विद्वान्, स्वतन्त्र विद्यालय एवं उनके छात्र भी सरकारी-शिक्षाके प्रभावसे स्पष्ट ही प्रभावित हैं। कथावाचक, मण्डलेश्वर आदि भी उसी ढंगकी कथा कहनेमें लाभका अनुभव करते हैं। घोर नास्तिक उच्छृङ्खल मिनिस्टरों, सरकारी पदाधिका-

रियोंकी भी विद्वान्, महन्त, मण्डलेश्वर प्रशंसा करते फिरते हैं। इस दृष्टिसे नास्तिकोंके हाथसे राजनीतिका उद्धार करना योग्य धार्मिक, सुशील लोगोंके हाथमें राजनीति लानेके लिये विद्वान्‌का प्रयत्न अत्यावश्यक है ही। महाभारतका स्पष्ट वचन है— क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्त पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्माः ॥ (महा० शां० ६४ । १०१) परमेश्वरसे सर्वप्रथम राजधर्मका ही आविर्भाव हुआ। उसके पीछे राजधर्मके अङ्गभूत अन्य धर्मोंका प्रादुर्भाव हुआ । अतः राजधर्म—राजनीतिके नष्ट होनेपर त्रयीधर्मके डूब जानेकी बात आती है । अराजकता या उच्छृङ्खल राजाके धर्महीन अधार्मिक राज्यमें कोई धर्म पनप ही नहीं सकता । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वके लौकिक-पारलौकिक, अभ्युदय एव निःश्रेयसके सम्पादन- में होनेवाले सब प्रकारके विघ्नोंको रोककर सब प्रकारकी सुविधा उपस्थित करना भारतीय राजधर्म, राजनीति या क्षात्र-धर्मका मूलमन्त्र है । भले ही कभी राजनीति राजाओ, राजमन्त्रियों एव राजकीय पुरुषोंतक ही सीमित रहे, उसमें सर्वसाधारणका प्रवेश आवश्यक भी ठहरे, तब भी विशिष्ट विद्वानोंके लिये तो कभी भी राजनीति उपेक्ष्य नहीं रही है । व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वको लौकिक पारलौकिक विनाशसे बचाना, उनको अभ्युदय, निःश्रेयस- प्राप्तिसे वञ्चित होनेसे बचाना क्षात्र या राजाका धर्म है । वही क्षात्रधर्म है, वही राजनीति है। इसीलिये राजाकी प्रशंसा है— 'नराणां च नराधिपम्' (गी० १०।२७) 'नाविष्णुः पृथिवीपतिः।' (दे० भा०) 'महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति ।' (मनु० ७।८) 'राजा ईश्वररूप है, नरोंमें नराधिप ईश्वरीय विभूति है, विष्णुके अतिरिक्त पृथिवीपति नहीं हो सकता, वह कोई मनुष्यरूपमे विशेष दिव्य शक्ति है इत्यादि'। उस प्रकारके राजधर्मका पालन श्रुताध्ययनसम्पन्न धर्मज्ञ, सत्यवादी, रागद्वेषविहीन, विद्वानोंकी सहायता विना राजा भी नहीं कर सकता। इसीलिये राजाके लिये आवश्यक है कि वह ऐसे विद्वानोंको अपना सभासद् बनाये-- श्रुताध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञाः सत्यवादिन । राज्ञा सभासदः कार्या रिपौ मित्रे च ये समाः ॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २ । २) शासनाारूढ शासककी भूल या प्रमादको रोकनेके लिये परम निरपेक्ष विरक्त विद्वान् भी लोककल्याण-कामनासे राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे । इतना ही नहीं, कभी-कभी तो वेन-जैसे अन्यायी राजाको, जो समझाने-बुझानेसे भी न माने, शासनाधिकारसे च्युत या नष्ट भी कर देते थे एव उनके स्थानमें पृथु-जैसे योग्य शासकको प्रतिष्ठित करते थे। यह भी लोक-कल्याणार्थ विद्वानोंके राजनीतिमें हस्तक्षेपका उदाहरण है। 'इतिहास' बतलाता है कि हमारे प्रमुख राजनीतिज्ञ