भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको मार्क्सवादी एक असम्भव चीज मानते हैं । अतएव असम्भव चीजसे होनेवाले फलोंको भी असम्भव मानते हैं । परंतु यदि योग या वेदान्तानुसार पाञ्चभौतिक मन या चित्त एक परिणामी वस्तु है और उसका परिणाम सहेतुक है तो परिणाम-निरोध भी क्यों नहीं हो सकता ? सुषुप्तिमें चित्तका शब्दाद्याकार परिणाम निरोध मान्य है, तब फिर समाधिमें भी चित्तके वृत्ति-परिणामराहित्य होनेमें क्या आपत्ति है ? वृत्तिद्वयकी मधिमें चित्त- का निर्वृत्तिक होना तर्कसङ्गत भी है ! चित्तके एक व्यापारसे एक वृत्ति होती है । एक व्यापारके अनन्तर अन्य व्यापार-प्रारम्भसे पूर्व क्षणमें चित्तके निर्व्यापार एव निर्वृत्तिक माननेमें कोई भी अड़चन नही हो सकती, जैसे अलातचक्रकी तीव्र गति होती है, वैसे ही मन्द गति भी होती है । साथ ही गति-राहित्यका भी कोई समय हो ही सकता है, उसी तरह चित्तकी तीव्र, मन्द गति एव गति-राहित्य भी सम्भव है । इस तरह जब योग असम्भव वस्तु नहीं है तो उसका फल भी असम्भव वस्तु नहीं है । 'योगः कर्मसु कौशलम्' (गी० २।५०) का तिलकद्वारा वर्णित अर्थ गलत है । वस्तुतः कर्म-कौशलको योग नहीं कहा जाता है, किंतु योग ही कर्मोंमे दक्षता है । योगकी परिभाषा स्पष्ट की गयी है—'समत्वं योग उच्यते' (गी० २।४८) सिद्धि-असिद्धिमें समता योग है । इस तरह समत्वबुद्धिसे युक्त कर्म भी गीतामें योग कहा गया है । तिलकने भी भले ही कर्मोंमें कौशलको योग कहा हो, तो भी उन्होंने पातञ्जलयोग एवं उसके फलका अपलाप नहीं किया है । मार्क्सवादीके लिये गीताकी प्रशंसाका कोई अर्थ ही नहीं; क्योंकि गीतामें तो स्वयं ही निर्वातस्थित निश्चल दीपके तुल्य योगीके यत चित्तका निश्चल होना बतलाया है— 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता । योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥ (गी० ६।१९) मार्क्स स्पष्ट ही निरीश्वरवादी है, फिर उसकी दृष्टिसे कर्मोंका ईश्वरमें समर्पण करना, फलकी आकाङ्क्षा बिना ईश्वराराधन बुद्धिसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करना आदि सब बाते व्यर्थ हैं । धनको ही सर्वस्व माननेवाले भौतिकवादीके लिये हानि- लाभ, जय-पराजयको समान समझना कहाँतक सम्भव है । किसी दाम्भिकके दम्भके भण्डाफोड़ होनेसे किसी युक्ति-शास्त्रसम्मत सिद्धान्तका अपलाप नहीं किया जा सकता । एजिल्सके 'डायलेक्ट्स आफ नेचर' पुस्तककी बाते भी पुरानी पड़ गयी हैं । वस्तुतः वैज्ञानिकोने ही प्रचलित जड़वाद एव विकासवादकी युक्तियोंका खण्डन करके एक अलौकिक शक्तिका महत्त्व सिद्ध किया है, जिसे हम विकासवादके खण्डन- के प्रसङ्गमें विस्तारसे दिखला चुके हैं ।