मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइसी प्रकार संसारकी सभी वस्तुओंके अनेक विशाल प्रयोजन हैं । संसार कितना विशाल है ? समुद्र, पहाड़, पृथ्वी--पृथ्वीसे बहुत बड़ा सूर्य, और फिर करोड़ों सूर्य, अरबों तारे वेदान्तमतानुसार पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाशादि—सब उत्तरोत्तर एक दूसरेसे दस-दस गुने बड़े हैं । फिर ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड मायाके एक अंशमें हैं’ । वह माया भगवान्के एक अशमें ऐसी प्रतीत होती है, जैसे महा- काशके एक प्रदेशमें बादलका छोटा-सा टुकड़ा । स्थूलताके साथ ही संसारमे सूक्ष्मताका भी अत्यन्त महत्त्व है । जो जल आज बर्फ या नीलमणिके रूपमें स्थूलरूपसे उपलब्ध हो रहा है, वही कभी बादल और उससे भी पहले सूर्यकी रश्मियोमे था । सूर्य-रश्मिका वह नगण्य कण जिसे परमाणु कहा जा सकता है, उसका एक पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा था । उसके अल्पाशमें वायु और वायुके अल्पाशमें प्राण, प्राणके अल्पांशमें मन और मनमे ब्रह्माण्ड था । फिर ब्रह्माण्डके भीतर अनन्तकोटि प्राणी और मन थे, उन मनोंमें फिर भी उसी तरह ब्रह्माण्डकी सत्ता थी । इस तरह एक सूक्ष्म वटबीज-कणिकामे महान् वटवृक्षका अस्तित्व और उस वटवृक्षमें अपरिगणित बीज-कणिका और उन कणिकाओमे अनन्त वटवृक्षका अस्तित्व एक साधारण सी बात जँचने लगती है । इसी तरह विश्वके छोटे-छोटे नियमोंको देखते हैं, तो नियमोका समूह उसी ढंगसे एक विशाल नियम बन जाते हैं, जैसे छोटे-छोटे कणोंका समूह एक पहाड़ । समुद्र भी जलकणोंका समुदाय ही है । यद्यपि मनुष्यकृत वस्तुओंमें भी बड़ी-बड़ी विलक्षणता दिखायी देती है । बड़े-बड़े विशालकाय पुल, दुर्ग, बाँध चकित कर देते हैं । विद्युत्के विचित्र चाकचिक्य चन्द्र-सूर्यसे होड करते हैं । वायुयानका चमत्कार भी कुछ ऐसा ही है । फिर भी यह सब स्वाभाविक ईश्वरीय वस्तुओंका एक छोटा-सा अनुकरणमात्र है । कितना भी बड़ा विशाल एवं नियमबद्ध संसार कार्य ही है, इसकी कभी-न-कभी सृष्टि हुई है, यह मानना पड़ता है । किसी भी कार्यके लिये उपादान, निमित्त एव साधारण कारण अवश्य होते हैं । जैसे एक घटका मिट्टी उपादान, कुलाल निमित्त एवं देशकाल आदि साधारण कारण होते हैं । साधारण भी क्रिया छोटी-छोटी अनेक क्रियाओका समुदाय ही होती है । एक घट-निर्माणरूप क्रियामें कितनी ही चेष्टाओंका समुदाय है । संसारके अनन्त क्रिया- जालोंमें बहुत-सी क्रियाएँ मनुष्यकृत होती हैं, जैसे घट, पट, मठ आदिका बनाना, रोना, हँसना, चलना आदि । जब घटका निर्माण मनुष्यद्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं, तो किसी भी घटको देखकर उसका निर्माता कोई मनुष्य होगा, यह अनुमान कर लिया जाता है । इसी तरह किसी भी कार्यको देखकर उसके कर्ताका अनुमान होना स्वाभाविक है । बहुत-से कार्य हैं जिनका मनुष्यद्वारा निर्माण सम्भव नहीं,