मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमार्क्स और ईश्वर ८०७ है। भले ही प्रयोजन समझमें न आये, परंतु है अवश्य । एक मशीनमें हजारों पुर्जे होते हैं, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई गोला, कोई टेढ़ा—उनमें परस्पर पर्याप्त भिन्नता है, परंतु बनानेवालेका उद्देश्य कार्यसिद्धि ही है। कपड़ा बुनना, आटा पीसना, पुस्तक छापना आदि इसी प्रयोजनसे प्रेरित होकर वैज्ञानिकोंने भिन्न-भिन्न पुर्जोंको बनाकर फिर सबको इस प्रकार मिलाया कि जिससे कार्यकी सिद्धि हो । पुर्जे न तो सब बराबर हैं, न एक-से हैं, न सबके साथ एक-से जुड़े हुए हैं। सब असमान होते हुए भी एक उद्देश्यपूर्तिके लिये जुड़े हुए हैं। उनमें बहुत-से कल- पुर्जे छोटे एव भद्दे हैं। उनके स्थानपर अच्छे एव सुन्दर पुर्जे हो सकते हैं, परंतु कल चलानेमे जिसका उपयोग नहीं, वह कितना भी सुन्दर हो, व्यर्थ ही है। इसी तरह जगत् एक महाप्रयोजनके लिये निर्मित है। इसकी छोटी-से-छोटी वस्तुएँ एवं घटनाएँ भी निष्प्रयोजन नहीं हैं। राबर्ट क्रिप्सके अनुसार जिस मण्डलका हमारी पृथ्वी एक अवयवमात्र है, वह अति विशाल, विचित्र तथा नियमित है। जिन ग्रहों, उपग्रहोंसे इसका निर्माण है उनका भी परिमाण बहुत विस्तृत है। हमारी पृथ्वी ही सूर्य-चन्द्र आदिसे इस प्रकार सम्बन्धित है कि बीज बोने, खेत काटनेके समयोंमें बाधा नहीं पडती । समुद्रके ज्वारभाटे कभी हमें धोखा नहीं देते। करोड़ों मण्डलोंमेंसे सूर्यमण्डल एक है। बहुत-से तो इससे असंख्यगुने बड़े हैं। फिर ये करोड़ों, अरबों सूर्य एव तारागण जो आकाशमें बिखरे हैं, परस्पर एक-दूसरेसे ऐसे सम्बद्ध तथा गणितके गूढतम नियमोंके इतने अनुकूल हैं कि उनसे प्रत्येककी रक्षा होती है और प्रत्येक स्थानमे साम्य तथा सौन्दर्य दिखायी देता है। प्रत्येक ग्रह दूसरेके मार्गपर प्रभाव डालता है। प्रत्येक कोई-न-कोई ऐसा कार्य कर रहा है, जिसके बिना न केवल वही किंतु समस्त मण्डल नष्ट हो सकता था। यह समस्त मण्डल बड़ी विलक्षणतासे बना हुआ है। जो घटनाएँ देखनेमे भयानक और विघ्नरूप प्रतीत होती हैं, वे वस्तुतः उसे नष्ट होनेसे रोकती एव विश्वकी दृढताका साधक होती हैं। क्योकि वे परस्पर अपनी शक्तियोंका इस प्रकार व्यय करती हैं कि एक नियत समयमें उनमें सहयोग हो जाता है। यह सहयोग ही विशाल जगत्के विशाल प्रयोजनका परिचायक है। एक छोटा-सा पुष्प जहाँ मनुष्योंकी आँखोंको तृप्त करता है, उसका सुगन्ध घ्राणोंको आनन्द देता है, वैद्य लोग उसका औषधमें भी प्रयोग करते हैं, चित्रकार उससे चित्रकारी सीखते हैं, रँगरेज रंग निकालते हैं, कवि काव्यमें उससे सहायता लेते हैं। भ्रमर उसका रसास्वादन करता है, शहदकी मक्खियाँ उसमे शहद निकालती हैं, तितलियाँ उन फूलोपर बैठकर अलग आनन्द लेती हैं। उसके बहुत-से ऐसे भी प्रयोजन हैं, जिन्हें मनुष्य नहीं जानता। इतना प्रयोजन सिद्ध करके भी वृक्षकी संततिरक्षाके लिये वह बीज उगाता है। यह एक छोटे-से फूलका कार्य है।