मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८०६ मार्क्सवाद और रामराज्य कहा जाता है, ज्यालोजी ( भूगर्भशास्त्र ) ने पता लगाया है कि अमुक चट्टाने किस प्रकार और कब बनीं ? हिमालय-जैसा महान् पर्वत भी कभी-न-कभी उत्पन्न हुआ है । एक-एक वस्तु दूसरेकी अपेक्षा नयी है । वृक्षका फूल पत्तेसे नया है । पत्ता भी जड़से नया और जड़ भी उस मिट्टीकी अपेक्षा नयी है, जिसपर जड़ उत्पन्न हुई । कहा जाता है 'पृथ्वी' एक आगका गोला थी । जैसे अङ्गारोंपर ठंडा होनेके समय सिकुडन पड जाती है, उसी प्रकार पृथ्वीका गोला जब ठंडा होने लगा तो उसमें सिकुड़न पड़ गयी । ऊँचे स्थान पहाड़ हो गये, नीचे समुद्र बन गये । बहुत पदार्थोंकी उत्पत्ति हम देखते हैं । बहुतोंका हम विश्लेषण कर सकते हैं। वे इन्द्रियाँ जिनसे ज्ञान प्राप्त किया जाता है और वे पदार्थ जिनका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, दोनो ही कार्य हैं । जिन-जिन वस्तुओंका विश्लेषण हो सकता है, वह कार्य समझा जाता है । जिनका विश्लेषण या विभाजन नहीं हो सकता वे ही परमाणु हैं । आजकल यद्यपि कहा जाता है कि परमाणुका विभाजन वैज्ञानिक कर लेते हैं । परंतु जब परमाणुकी यही परिभाषा है, तब तो जिसका विश्लेषण हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं । जो लोग परमाणु न मानकर केवल शक्ति ही मानते हैं, उन्हे भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि शक्ति कभी वर्तमान जगत्के रूपमें परिणत हुई है । चाहे परमाणुओंसे, चाहे शक्तिसे, चाहे प्रकृतिसे, चाहे ब्रह्मसे जगत्की सृष्टि हुई और उस सृष्टिमें क्रम भी मान्य होने चाहिये । यह नहीं कि पहले फल हुआ फिर फूल हुआ । मालीको यह नियम मालूम होता है कि पहले अङ्कुर, फिर नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फलका आविर्भाव होता है । इसी तरह निम्बके बीज एव आमकी गुठलीसे तथा अन्यान्य विभिन्न बीजोसे विभिन्न ढंगके अङ्कुरादि उत्पन्न होते हैं । निम्बका बीज बोनेसे आमका फल नहीं लगता, यह नियम भी लोगोंको ज्ञात है । इसी तरह गेहूँ बोनेसे चनेकी उत्पत्ति नहीं होती । मनुष्य तथा प्राणियोंकी भी वृद्धिका नियम है । शैशव, यौवन, वार्धक्य अवस्थाएँ क्रमेण आती हैं । चिकित्सक चिकित्सालयोंमें शारीरिक नियमोंके आधारपर ही चिकित्सा करते हैं । पहाड़ एवं पहाड़ी नदियोंका निर्माण कैसे होता है, इनका किस ओर क्यों प्रवाह है, आदिके सम्बन्धमें भूगर्भके विद्वानोंका भी भूगर्भ-सम्बन्धी नियम प्रसिद्ध है । मनोविज्ञानकी जटिलता और भी विलक्षण है । यद्यपि मनकी गति बड़ी विलक्षण होती है, फिर भी मनोविज्ञानके नियम हैं ही । इसी तरह सभी शास्त्रोंके नियम हैं। इस तरह सृष्टिकी नियमबद्धता दिखायी देती है । इन नियमोंका विधायक और पालक कोई मान्य होना चाहिये । नियमकी दृष्टिसे सृष्टिमें एकता है । हर एक नियमका प्रयोजन भी होता है । लड़कोंका प्रतिदिन एक साथ विद्यालयमें जानेका नियम व्यर्थ नहीं होता । प्रयोजन ही कार्यको सार्थक बनाता है । संसारकी सभी वस्तुओ एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती