भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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८०२ मार्क्सवाद और रामराज्य पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥' (श्रीमद्भा० २।१०।३२) भगवान्‌की उक्ति है कि सृष्टिके पहले एक मै ही था, मुझसे भिन्न कार्यकारण कुछ भी नही था, सृष्टि होनेपर भी जो प्रपञ्च उपलब्ध होता है, वह भी मै ही हूँ और अन्तमें जो अवशिष्ट रहता है वह भी मै हूँ । 'आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा । वितथैः सदृशाः सन्तोऽवितथा इव लक्षिताः ॥' (माण्डूक्यकारिका ४। ३१) अर्थात् जो आदिमें नहीं, अन्तमें नही, वह मध्यमें भी नही ही है। यद्यपि मध्यमें सत्-सा प्रतीत होता है, तथापि है असत् ही । घटादि कार्य अपनी उत्पत्तिके पहले नहीं थे, अन्तमें नष्ट होनेके बाद भी नही रहते हैं । अतः मध्यमें सत्‌से प्रतीत होनेवालोंको भी असत् ही समझना चाहिये । जलकी लहरे, पानीके बुलबुले और स्वप्न- के पदार्थ, उत्पत्ति या प्रतीतिके पहले भी नहीं रहते, अन्तमें भी नहीं रहते, केवल मध्य- में प्रतीत होते हैं, तो भी उन्हें असत् ही समझना उचित है। 'अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥' (गीता २।२८) सभी प्रपञ्च उत्पत्तिके पहले अव्यक्त ही था, अन्तमें भी सब अव्यक्त हो जाता है, केवल मध्यमें व्यक्त है, फिर उसके लिये क्या रोना ? कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति अदर्शन—अज्ञानसे ही आया, अन्तमें पुनः अदर्शनमें ही चला गया । फिर जो न अपना है, न जिसके हम हैं, उसके लिये क्या रोना ? 'अदर्शनादापतिताः पुनश्चादर्शनं गताः। नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना ॥' (महा० स्त्रीपर्व २।१३) जैसे मिट्टी या जलके भीतर ही तरह-तरहके पात्र और तरङ्ग आ जाते हैं, वैसे ही मनके भीतर ही सब दृश्य आ जाते हैं। मनकी हलचलमें ही दृश्य दिखलायी पड़ता है और उसके मिटनेमें मिट जाता है, अतः सब कुछ मन ही है । वह मन स्वप्रकाश सत् या भानके भीतर आ जाता है, अतः स्वप्रकाश सत् या अबाध्य अनन्त भान ही सब कुछ है । जैसे दर्पणके भीतर भूधर-सागर, गगन- मेघमाला, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र, वन-उपवन, नगर आदि प्रतिबिम्बरूपमें दिखायी देते हैं, वैसे ही अव्यक्तादि स्थावरान्त सदसत् सकल प्रपञ्च कूटस्थ स्वप्रकाश सत् या भानमें दिखायी देता है । जाग्रत्-स्वप्नके द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, सुषुप्तिकी निद्रा या अज्ञान जिससे प्रकाशित होते है, वही शुद्ध भानरूप आत्मा है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, प्रकाश-प्रवृत्ति मोह (रज तम-सत्त्व) इन सबका प्रकाशक सबका अधिष्ठान, सबका कारण, सबसे अतीत सत् ही आत्मा है । वह प्रतिबिम्बके समान है, प्रतिबिम्ब नहीं। अतः उससे पृथक् बिम्बकी सत्ता नहीं अपेक्षित है। जैसे शुद्ध दर्पण देखनेसे प्रतिबिम्ब दृष्टि मिट जाती है, वैसे शुद्ध सत् देखनेसे प्रपञ्च-बुद्धि मिटती है। बोध होनेके उपरान्त यद्यपि प्रपञ्चका मूल अज्ञान मिट जाता है, तथापि प्रारब्धदोषसे प्रारब्ध-स्थितितक प्रपञ्चकी प्रतीति होती है । भोगसे प्रारब्ध मिटनेपर अवश्य ही प्रपञ्चप्रतीति भी मिट जाती है--'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये।' (छां० उ० ६।१४।२) 'भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते ।'