मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 560, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्याम्'—मैं एक हूँ, अनेक होऊँ, इस रूपसे अहङ्कारका उल्लेख होता है वही 'अह- न्तत्त्व' है। सुषुप्तिकी ओर जाते हुए भी 'मैं कहाँ और कौन हूँ' इत्यादि अहङ्कार- का पहले लय होता है। केवल कुछ चेत (ज्ञानसामान्य) रह जाता है। अन्तमें वह भी अज्ञान या सुषुप्तिमें लीन हो जाता है। परन्तु आत्मा या परमात्मस्वरूप नित्यबोध या ज्ञान तो इन तीनोंका भासक है, स्वप्रकाश सद्रूप है। जैसे बादलकी टुकड़ी देखकर आकाशव्यापी मेघमण्डल बुद्धिमें आरूढ हो सकता है, वैसे ही व्यष्टि (जीवगत) अहङ्कार, बुद्धि (ज्ञान), अज्ञान (सुषुप्ति) से ईश्वरगत समष्टि अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्ततत्त्वका बोध हो जाता है। जैसे अहङ्कारपूर्वक ही जीवका कार्य होता है, वैसे ही अहङ्कारपूर्वक ही परमात्मासे आकाशादि समस्त प्रपञ्च उत्पन्न होते हैं। तभी अहन्तत्त्वसे शब्दतन्मात्रा या अपञ्चीकृत सूक्ष्म आकाशकी उत्पत्ति मानी गयी है। सर्वप्रथम अज्ञान या अचित् भी स्वप्रकाश सत्की ही शक्ति है। अतः वह भी सत्से स्वतन्त्र होकर स्वतः सत् नहीं है। जैसे सिता (शर्करा)के सम्बन्धसे अमधुर वस्तु भी मधुर प्रतीत होती वैसे ही स्वप्रकाश सत्के सम्बन्धसे ही अव्यक्तादि सभी प्रपञ्चमें सत्ता और स्फूर्ति प्रतीत होती है। अतएव जैसे लहरोंमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, वैसे ही अव्यक्तसे लेकर सभी प्रपञ्चके भीतर-बाहर सत् ही है, स्फूर्ति ही है। जैसे जलके बिना लहर कोई वस्तु ही नहीं, वैसे ही सत्के बिना—स्फूर्तिके बिना अव्यक्त, अचित्, महत्तत्त्व, अहन्तत्त्व आकाशादि सब असत् हो जाते हैं। जबतक उनमें सत्का योग है तबतक उनका होना, उनकी सत्ता या स्फूर्ति है। सत्के बिना सब-के सब असत् हो जाते हैं। इसीलिये कहा है—'जासु सत्यता ते जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥ अतः अचित् आदि सभी मिथ्या हैं।, अधिष्ठानका साक्षात् बोध होते ही सब मिट जाते हैं। आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, घटादि सब उत्पन्न होते हैं और क्रमेण सब उसीमें लीन हो जाते हैं, तथापि घटाकाश, शरावाकाश, महाकाश आदि अनेक कल्पनाएँ हो जाती हैं। आकाशसे ही सूर्य, उससे ही घट और जल उसका ही आकाश और सूर्यरूपसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब होना सङ्गत है और पार्थिव प्रपञ्च पृथ्वीमें, पृथ्वी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमे और वायुके आकाशमे मिलते ही सब कुछ केवल आकाश ही रह जाता है। उसी तरह स्वप्रकाश सत्से ही उत्पन्न अनेक उपाधियोंसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब जीव, जगत् आदि अनेक भेद बनते हैं। परन्तु उत्पत्तिके विपरीत क्रमसे जब सब कुछ परमात्मामें लीन हो जाता है तब एक ही परमात्मा रह जाता है। जैसे आकाशसे ही क्रमेण घट उसीसे जल, उसीसे प्रतिबिम्ब और वही बिम्ब होता है, अन्तमें आकाश कार्य होनेसे सबका उसीमें लय हो जाता है, वैसे ही सर्व प्रपञ्च अनन्त, अखण्ड स्वप्रकाश चित्में ही उत्पन्न होता है, उसीमे लीन हो जाता है। 'अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्।
भा० २।९ ५६—