भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 534

मार्क्स और आत्मा ७७५ आनुपूर्वीरूप वेदका पुरुषोच्चरितत्व सुतरा इष्ट ही है । प्रतिदिन अध्येताओंद्वाग उच्चार्यमाण वेदका पुरुषोच्चरितत्वमात्ररूप पौरुषेयत्व तो सिद्ध ही है, अतः उसकी सिद्धिका आयास व्यर्थ है । यदि प्रमाणान्तरेण अर्थज्ञानपूर्वक रचितत्वरूप पौरुषे- यत्व कहे, तो विकल्पासह होनेसे वह ठीक नहीं, क्योकि उसकी सिद्धि अनुमानसे की जायगी या आगमसे ? आगमबलसे नहीं कहा जा सकता, क्योकि प्रमाणन्तरसे जिसका अर्थ अनुपलब्ध है, ऐसे कविकल्पित वाक्यमें वाक्यत्वरूप हेतु व्यभिचरित हो जायगा । यदि 'प्रमाणत्वे सति' इस पदका निवेश करके अप्रमाण कविकल्पित वाक्यमें हेतुव्यभिचारका वरण किया जाय, तो भी प्रमाणान्तरके अविषयीभूत अर्थवाले वेदवाक्यमें प्रमाणान्तरेण अर्थका उपलब्ध करके विरचितत्वकी सिद्धि करना 'मेरे मुँहमें जिह्वा नहीं है' इस कथनके समान व्याहत है । प्रमाणान्तरसे उपलब्ध अर्थवाला होनेपर तो अनुवादक हो जायगा, जिससे अनधिगतका बोधक न होनेसे वेदका अप्रामाण्य ही सिद्ध होगा । चक्षुरादि इन्द्रियोंसे अनुपलब्ध शब्द- की अवगतिके लिये ही श्रोत्रप्रमाणकी जैसे सार्थकता है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमान- से अनधिगत धर्म आदिके अधिगमक होनेसे ही आगमप्रमाणकी सार्थकता है, अन्यथा व्यर्थ ही है—'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्ध्यते । एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता ॥' से यह स्पष्ट है । लीलाविग्रहधारी परमेश्वरकी भी चक्षुरादि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय देश, काल, स्वभाव, विप्रकृष्ट-अर्थका ग्रहण नहीं कर सकतीं, क्योंकि दृष्टानुसार ही कल्पनाका आश्रयण किया जा सकता है, जैसा कि कहा गया है — 'यत्राप्यतिशयो दृष्टः स स्वार्था- नतिलङ्घनात् । दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता ॥' (सर्वदर्शनसं० १०।२३) सर्वज्ञको भी घ्राणशक्तिसे ही गन्धग्रहणका जैसे नियम है, वैसे ही वेदशक्तिसे ही वेदार्थ ग्रहणका नियम होनेपर सर्वज्ञत्वकी हानि नहीं होती । इसलिये दूसरा पक्ष भी सङ्गत नहीं है । काठक, कालाप, तैत्तिरीय इत्यादि समाख्याएँ अध्ययनसम्प्रदायप्रवर्त्तकविषयक हैं । 'तेन प्रोक्तम्' में प्रोक्तम्' का 'कृतम्' यह अर्थ नहीं होता, क्योकि वह तो 'कृते ग्रन्थे' से ही गतार्थ है, किंतु स्वय या अन्यद्वारा कृत अध्यापन या अर्थान्वा- ख्यानसे प्रकाशित करना ही 'प्रोक्त' का अर्थ है । निःश्वासवत् वेदाविर्भावका श्रवण परमेशितृकारणकत्वका ही बोधन करता है, प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भनका भी बोधन नहीं करता । जिनका यह कहना है कि प्रत्यक्षद्वारा अर्थको उपलब्ध करके अखिल वेद का ईश्वरने निर्माण किया है, उन्हे भी कहना पड़ेगा कि ईश्वरको सभी पदार्थ प्रत्यक्ष हैं, प्रत्यक्षगम्य ही नहीं, अपितु अनुमानगम्य भी । तथा च लाघवात् यही सिद्ध होगा कि अनुमानसिद्ध अर्थमूलक वेदरचना है । अपि च ईश्वरनिर्मित होनेसे