भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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७७४ मार्क्सवाद और रामराज्य अप्रमीयमाणकर्तृकत्व समझा जाय या स्मरणागोचरकर्तृकत्व ? अप्रमीयमाणकर्तृकत्व नहीं कहा जा सकता, क्योंकि परमेश्वररूप कर्ता प्रमीयमाण है 'तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ॥' ( शु०यजु०३१।७) यह श्रुति परमेश्वरसे वेदोंकी उत्पत्ति स्पष्ट बतला रही है । विकल्पासह होनेसे स्मरणा- गोचरकर्तृकत्व भी नहीं कहा जा सकता । जैसा कि प्रश्न उठता है कि क्या एकसे स्मरण वा सबसे ? निश्चितपुरुषकर्तृकमें भी कर्ताका स्मरण न होनेमात्रसे किसी वस्तुकी अपौरुषेयत्वप्रसक्ति होगी, अतः प्रथम पक्ष सङ्गत नहीं । सबसे अस्मरणको बिना सर्वज्ञके अन्य कोई जान नही सकता, अतः दूसरा पक्ष भी उपपन्न नहीं है । साथ ही—वाक्य होनेके कारण 'रघुवंश' वाक्यकी तरह वेदवाक्य पौरुष हैं और प्रमाणभूत होते हुए वाक्यस्वरूप होनेके कारण मन्वादिवाक्यके समान वेदवाक्य आप्तप्रणीत हैं, इत्यादि अनुमानोंसे वेदोंके कर्ताका निश्चय भी प्रमाणित हो रहा है । यह नहीं कहा जा सकता कि 'वेदस्याऽध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा ॥' ( सर्वदर्शनसंग्रह, जैमिनीय दर्शन १९ ) इससे उक्त अनुमान सत्प्रतिपक्षति है, क्योंकि 'भारताध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम् । भारताध्ययनत्वेन साम्प्रताध्ययनं यथा ॥' ( सर्वदर्शन सं० १२ । १९ ) इस प्रकार दोनों ओर समान योग-क्षेम है । 'को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्' ( सर्व० जैमि० २० ) इस वचनसे भारतका तो व्यासकर्तृकत्व समर्थित हो रहा है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि 'ऋचः सामानि जज्ञिरे' (शु० य० ३१ । ७) इत्यादिसे वेदकी भी परमेश्वरकर्तृकता श्रुत है । सामान्यवत्त्वे सति बाह्येन्द्रियग्राह्य होनेसे घटादिकी तरह शब्द भी अनित्य है । 'वही यह गकार है' इस प्रत्यभिज्ञाबलसे शब्दकी नित्यता नहीं कही जा सकती, क्योंकि 'वही ये केश हैं' इत्यादिके समान वह प्रत्यभिज्ञा नित्यतानिबन्धन नहीं, किंतु सादृश्यनिबन्धन है । अशरीरी होते हुए भी परमेश्वरकी भक्तानुग्रहार्थ लीलाविग्रह-धारणकी उपपत्तिसे कण्ठताल्वादिसापेक्ष वर्णोच्चारण भी सम्भव है, अतः वेदोंको पौरुषेय माननेमें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है । किंतु तात्पर्य न समझ सकनेके कारण उक्त सब बाते कही जाती हैं, अतः वे सब अविचारित- रमणीय हैं । उक्त पौरुषेयत्व क्या है ? क्या पुरुषोच्चरितत्वमात्र अथवा प्रमाणान्तरसे अर्थको जानकर विरचितत्व ? पुरुषोच्चरितत्वमात्र ही यदि पौरुषेयत्व है, तो हमें इष्टापत्ति है । नित्य एवं व्यापक वर्णोंकी देश-काल-पौर्वापर्यंरूप आनुपूर्वी असम्भव होनेसे वर्णव्यक्तियोंकी ही कालपौर्वापर्यलक्षण आनुपूर्वी कहनी चाहिये । वर्णव्यक्तियाँ कण्ठ-ताल्वादि अभिघातजन्य ध्वन्यभिव्यक्तिवाली हैं । तथा च नियत वर्णोंकी नियत