भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

पृष्ठ 532, कुल 866 में से

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मार्क्स और आत्मा ७७३ सांख्य, योगी और कुछ नैयायिक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं । नैयायिक उनके अतिरिक्त उपमान प्रमाण भी मानते हैं । अर्थापत्ति को मिलाकर पाँच प्रमाण प्राभाकर मानते हैं । अनुपलब्धिसहित छः प्रमाण भाट्टों एव अद्वैतियोंको सम्मत ह । सम्भव और ऐतिह्य मिलाकर आठ प्रमाण पौराणिक मानते हैं । इनमें वैशेषिक लोग शब्दप्रमाणसे साधित अर्थको तो सत्य ही मानते हैं, पर उसे शब्दमूलक नहीं अपितु अनुमानमूलक ही बतलाते हैं । मीमांसक लोग जैसे अर्थापत्तिसे साधित अर्थको अनुमानसे साबित करके उसीमें अन्तर्भूत करते हैं, वैसे ही नैयायिक लोग भी मानते हं उनका कथन है कि परमेश्वरनिर्मित होनेके कारण वेद अपौरुषेय हें और आप्तोक्त होनेसे उनका प्रामाण्य है । पौरुषेयत्ववादियोंका कहना है कि 'तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य निःश्व- सितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः' इस श्रुतिसे ही वेदकी उत्पत्ति परमेश्वरसे निःश्वासवत् बतलायी गयी है । जिस प्रकार बिना आयासके निःश्वास उत्पन्न होता है, वैसे ही आयास एव बुद्धिसे निरपेक्ष ही वेदोंकी उत्पत्ति उक्त श्रुतिमें बतलायी गयी है । वेद यद्यपि स्थूल-सूक्ष्म, सन्निकृष्ट-विप्रकृष्ट, मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन—सर्वविध अर्थोंका अवभासक है, तथापि अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेसे परमेश्वरका अनायास वेदकर्तृत्व तो सम्भव है, किंतु बुद्धिनिरपेक्षता उपपन्न नहीं हो सकती । कुछ लोग बुद्धिनिरपेक्षताकी उपपत्तिके लिये कहते हैं कि वेद परमेश्वरसे केवल प्रकाशित हुए हैं। कोई निःश्वसितन्यायका अनायासमात्रमें तात्पर्य मानते हैं । 'बुद्धिसापेक्ष वाक्य- रचनामें लेशमात्र भी आयास नहीं है,' यह कहना ठीक नहीं, क्योकि निःश्वासमें भी प्रयत्नलेशकी आवश्यकता तो रहती ही है । अपौरुषेयत्ववादियोंका इसपर यह कथन ह कि सुप्त, प्रमत्त, अनवहित एव अन्यमनस्क व्यक्तियोंका भी निःश्वास देखा जाता है, अतः निःश्वासको अवश्य ही बुद्धिप्रयत्नसे निरपेक्ष मानना चाहिये । एव च सहज होनेसे निःश्वास जैसे अकृत्रिम होता है, वैसे ही निःश्वासवत् आविर्भूत वेदोंकी भी सहज होनेके कारण अकृत्रिमता माननी चाहिये और उस दशामें अपौरुषेय होनेके कारण पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटवादि दूषणोंसे असंस्पृष्ट होनेके कारण समस्त- पुंदोषशङ्काकलङ्कके अग्रास्त होनेसे वेदका स्वतःप्रामाण्य है । यहाँ अनुमानका स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—सम्प्रदायाविच्छेद होते हुए कर्ता अस्मर्यमाण होनेसे आत्माके समान वेद अपौरुषेय हैं । व्यतिरेकमें—जो सम्प्रदायाविच्छेदे मति अस्मर्यमाणकर्तृक नहीं होता, वह अपौरुषेय भी नहीं होता, जैसे 'महाभारत' यह अनुमान है । पौरुषेयवादियोंका कथन है कि प्रलयमें सम्प्रदायका विच्छेद हो जाता है, अतः लक्षणमें विशेषण असिद्ध है । साथ ही अस्मर्यमाणकर्तृत्वका अर्थ क्या

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