मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७२ मार्क्सवाद और रामराज्य कोई प्रत्यक्ष और शब्द—इन्ही दोको प्रमाण मानते है । उनके मतमें अनुमान यद्यपि प्रमाण माना जाता है, तथापि वह यदि प्रमाण भूत शब्दसे प्रतिपादित अर्थका अवबोधक हो, तभी प्रमाण होता है, अन्यथा नहीं । अन्य लोग प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं । उनके मतमें न तो शब्द अनुमानकी अपेक्षा करता है और न अनुमान शब्दकी । वाक्यात्मक शब्द अनवगत सम्बन्धका ही बोधक होता है । नवीन विरचित श्लोकादिका श्रवण होनेपर अधिगत पद तथा उनके अर्थोंका वाक्यार्थ अवगत होता देखा जाता है । तथा च सम्बन्धाधिगममूलक प्रवृत्तिवाले अनुमानसे शब्दका साम्य नहीं है । पदात्मक शब्द यद्यपि सम्बन्धाधिगमसापेक्ष होता है, तथापि सामग्रीभेद और विषय-भेदसे उसकी अनुमानसे भिन्नता है । पद 'और लिङ्गका विषय भी भिन्न है । पदार्थमात्र पदका अर्थ होता है और अनुमान 'अग्निमान् पर्वतः' इत्यादि रीतिसे वाक्यार्थविषयक होता है । धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य होता है, अतः पर्वतादि- विशेष्यक प्रतिपत्तिपूर्विका पावकादिविशेषणावगति लिङ्गसे उत्पन्न होती है, जब कि पदसे विशेषणावगतिपूर्वक विशेष्यावगति होती है, इस तरह दोनोका विषय- भेद स्पष्ट है । कहा गया था कि 'अनुमानमें जैसे धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य है, वैसे ही अर्थविशिष्ट शब्द साध्य हो' तो यह ठीक नहीं; क्योंकि हेतु होनेके कारण शब्दकी हेतुता अनुपपन्न है । साथ ही अर्थधर्म होनेसे यदि शब्दकी पक्षधर्मता हो, तो अनवगत धूमाग्निसम्बन्ध भी जैसे अर्थधर्मताको ग्रहण करता ही है, वैसे ही अनवगत शब्दार्थ सम्बन्धको भी शब्दकी अर्थधर्मताका ग्रहण करना चाहिये, परंतु ग्रहण नहीं करता, अतः शब्दकी पक्षधर्मता नहीं कही जा सकती । शब्द और अर्थका देश तथा कालसे सामानाधिकरण्यका व्यभिचार भी है, अतः अन्वय- व्यतिरेकका उपपादन दुष्कर है । नैयायिक लोग शब्दको स्वतन्त्र प्रमाण मानते हुए ईश्वररचितत्वेन वेदका प्रामाण्य अङ्गीकार करते हैं । धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको पुरुषार्थ मानते हैं । शब्दप्रमाणके बिना मूक व्यक्तिसे वाग्मी पुरुषकी विशेषता निर्णीत नही की जा सकती । शब्दके बिना माता-पिताका ज्ञान भी होना कठिन है । प्रत्यक्ष या अनुमान- से न तो माता-पिताका निर्णय हो सकता है और न उनके धनका पुत्रको अधिकार ही प्राप्त हो सकता है । एवं च शब्दप्रमाण माने बिना लोकव्यवहार समुच्छिन्न हो जायगा । इसीलिये कहा गया है— 'मत्तयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानराः । शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नराः ॥'