भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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दोष और मिथ्याज्ञानमें उत्तर-उत्तरका तत्त्वज्ञानसे नाश होनेपर पूर्व-पूर्वका नाश होनेसे अपवर्ग होता है । प्रमाणके विषयमें—चार्वाक लोग जैसे इन्द्रियजन्य ही ज्ञानको प्रमाण मानते हैं, वैसे ही उनके मनसे श्रोत्रेन्द्रिय शब्दका ही बोधन करता है, शब्दार्थको भी नहीं। शब्दार्थ सत्य है या असत्य—इसका निर्णय नहीं किया जा सकता । अनुमान व्याप्ति- ज्ञानसापेक्ष होता है और व्याप्ति 'जहाँ जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि होता है' इस प्रकार समस्त जगत्में अतीत, अनागत धूम-अग्नियोंको उपस्थापित करती है । कादाचित्क द्रष्टाको प्रत्यक्षद्वारा समस्त धूम एवं अग्नियोंका ज्ञान सम्भव नहीं है । अनुमानसे भी इनका ज्ञान सम्भव नहीं, क्योंकि अनुमान व्याप्तिज्ञानसापेक्ष हुआ करता है । वारवार सहचारदर्शनसे भी व्याप्तिज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि 'अग्निके अभावमें भी कदाचित् धूम हो सकता है' ऐसी व्यभिचार शङ्काका समस्त धूम तथा अग्नियोंका ज्ञान हुए बिना निराकरण नहीं हो सकता । बौद्ध, जैन, वैशेषिक अनुमानको भी मानते हैं । उनका आशय यह है कि अन्वय- व्यतिरेकद्वारा धूम तथा अग्निके कार्य-कारणभावका निश्चय होनेपर व्यभिचार- शङ्काकी निवृत्ति हो जानेसे व्याप्तिज्ञान हो जायगा । उनके मतमें यद्यपि शब्द समादरणीय है तथापि प्रत्यक्ष, अनुमानसे सिद्ध पदार्थका बोधक होनेसे उसका प्रामाण्य माना जाता है, उसका स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं माना जाता । वैशेषिकके मतानुसार भी शब्द सर्वत्र प्रमाण नहीं है; क्योंकि उन्मत्तप्रलपितादिमें उसका अप्रामाण्य स्पष्ट है । वैशेषिक प्रमाणभूत ईश्वर या अन्य आप्तपुरुषद्वारा उच्चरित शब्दको ही प्रमाण मानते हैं । तथा च वक्ताके प्रामाण्यसे शब्दके प्रामाण्यका अनुमान होता है, अतः शब्दप्रामाण्य अनुमान- प्रामाण्यके अधीन होनेसे अनुमानसे पृथक् उसका प्रामाण्य नहीं है । अनुमान और शब्द—दोनो परोक्षसामान्यविषयक हैं, अतः उनकी प्रवृत्ति सम्बन्धग्रहाधीन है । साथ ही विशेष अनन्त होनेके कारण उनका सम्बन्ध दुरवगम है । अतः धूमको देखकर जैसे अग्निका अनुमान किया जाता है, वैसे ही शब्द सुनकर उसका अर्थ अवगत होता है । यहाँ भी लिङ्गकी ही तरह अन्वयव्यतिरेक होते हैं । जो शब्द जिस अर्थमें प्रयुक्त देखा जाता है, वह उस अर्थका वाचक होता है । धूमके वह्निमत्त्वके समान शब्दका अर्थवत्त्व है, अतः शब्दको अनुमानके अन्तर्गत ही मानना चाहिये । यथेष्ट विनियोज्यता हस्तादि, सञ्ज्ञादि लिङ्गमें भी दिखायी पड़ती है । दृष्टान्त-निरपेक्षता भी समभ्यस्त अनुमानमें स्पष्ट है । अनभ्यस्त होनेपर तो अनु- मान और शब्द दोनोंमें सम्बन्धस्मृतिकी सापेक्षता होती है ।