भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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७९० मार्क्सवाद और रामराज्य

क्योंकि 'समवेतद्रव्यत्व सावयवत्व है' ऐसा लक्षण करनेपर उक्त दोष प्रसक्त नहीं होते । आकाशके निरवयव होनेसे उसमें व्यभिचार सम्भव नहीं है। अवान्तर महत्त्वरूप हेतुसे भी कार्यत्वका अनुमान सुकर है । शरीरसे जन्य न होनेसे आकाशकी तरह क्षित्यङ्कुरादि अकर्तृक हैं—ऐसा सत्प्रतिपक्ष अनुमान नहीं हो सकता, क्योंकि शरीर विशेषण व्यर्थ है । केवल अजन्यत्वकी भी हेतुता नहीं कही जा सकती, क्योंकि वह असिद्ध है । यदि कहा जाय कि शरीराजन्यत्व रहनेपर भी कर्तृजन्यता न रहे, तो क्या हानि है, तो इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता । सोपाधिकत्वकी शङ्का भी नहीं की जा सकती, क्योंकि यदि अकर्तृक होगा, तो कार्य भी न होगा, ऐसा अनुकूल तर्क हो सकता है । यदि इतरकारकोंसे अप्रयोज्य होते हुए सकल कारकोंका जो प्रयोक्ता है, वह कर्ता होता है अथवा ज्ञान- चिकीर्षा प्रयत्नोंका जो आधार है, वह कर्ता है—ऐसा कर्तृलक्षण कहा जाय, तो कर्ताकी व्यावृत्ति होनेपर तदुपहित समस्त कारकोंकी व्यावृत्ति होनेसे कारणके बिना कार्योत्पत्तिका प्रसङ्ग उपस्थित होगा । यदि ईश्वर कर्ता हो, तो वह शरीरी होगा, ऐसा प्रतिकूल तर्क भी न कहा जा सकता, क्योंकि सिद्धि-असिद्धि दोनो अवस्थाओमें व्याघात होगा । यदि ईश्वर असिद्ध होगा, तो आश्रयासिद्धि होगी और यदि आगमसिद्ध होगा, तो उसीसे उसकी कर्तृत्वसिद्धि भी हो जायगी । अवाप्तसमस्तकाम उस परमेश्वरकी करुणावशात् विश्वसृष्टिमें प्रवृत्ति माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती । वैसी दशामें 'सुखमय ही सृष्टिकी प्रसक्ति होगी' यह भो नही कहा जा सकता, क्योंकि सृज्यप्राणिकृत सुकृत-दुष्कृतके परिपाकविशेषसे सृष्टिवैषम्य उपपन्न है । कार्य होते हुए विलक्षण होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान भूत, भौतिक पदार्थ स्वोपादानगोचर अपरोक्षज्ञानवान्से जन्य हैं, इस अनुमानसे तथा प्रपञ्चके निमि- त्तोपादान होनेके कारण प्रपञ्चाधारत्व, शाशकत्व, प्रकाशकत्व आदिसे परमेश्वर सिद्ध होता है । वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव— ये सात पदार्थ मानते हैं । नैयायिक लोग प्रमाण, प्रमेय, सशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान—ये सोलह पदार्थ मानते हैं । वे आत्माको ज्ञानादिगुणवान्, नित्य और व्यापक मानते हैं । जीवात्मा और परमात्मा भेदसे आत्मा दो प्रकारका मानते हैं । जीवात्माओको अनन्त और परमात्माको एक मानते हैं । नित्यज्ञानादिगुणवान् परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् है यह तर्क तथा आगमसे सिद्ध होता है, यह बतलाया जा चुका है । इनके मतानुसार अन्धकार तेजोऽभावरूप है । दुःख, जन्म, प्रवृत्ति,