भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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इस प्रकार पूर्व नीलादि अनुभवोंके वैचित्र्यसे वासनावैचित्र्य होता है और वासनावैचित्र्यसे अनुभवोंमें भी विचित्रता आती है। बीजाङ्कुरके समान यह परम्परा भी अनादि ही है। अन्वय-व्यतिरेकसे भी यही मालूम पड़ता है कि वासना- वैचित्र्य ही ज्ञान-वैचित्र्यका हेतु है, क्योकि स्वप्नादिमे स्पष्ट है कि बाह्यार्थके बिना भी वासनाके कारण ही विचित्र ज्ञान उत्पन्न होते हैं। यह उभयसम्मत है। परंतु वासनाके बिना अर्थनिमित्तक ज्ञान-वैचित्र्य उभयसम्मत नहीं है। अतः बाह्यार्थका अस्तित्व नही सिद्ध होता । इस प्रकार विज्ञानवादीके बाह्यार्थापलापका श्रीव्यास- शङ्कराचार्यादि वैदिक आचायोंने निराकरण किया है । 'नाभाव उपलब्धे' अर्थात् बाह्यार्थका अभाव नहीं कहा जा सकता क्योकि उसका उपलब्ध होता है। यहाँ विज्ञानवादीसे प्रश्न हो सकता है कि क्या उपलब्ध न होनेसे बाह्यार्थका असत्त्व होता है या वह उपलब्ध ही बाह्यविषयक नही है। बाच्यार्थविषयक होनेपर भी बाधक प्रमाणके सद्भावसे बाह्यार्थाभाव है। प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं क्योकि घटादि- का उपलब्ध सर्वजनप्रसिद्ध है। खम्भ, कुड्य, घट पटादि बाह्यविषयक प्रत्येक ज्ञानोसे स्पष्टतया बाह्यार्थ भासित होते हैं। यदि कहा जाय कि उपलब्ध तो अवश्य है किंतु उपलब्धका विषय बाह्य घटादि असत् है तो यह भी ठीक नहीं, कारण कि जैसे कोई भोजन तथा भोजनसाध्य तृप्तिका अनुभव करता हुआ भी कहे कि 'न मैं भोजन करता हूँ न तृप्त ही होता हूँ' तो उसका कहना अनर्गल है। इसी तरह इन्द्रिय-सन्निकर्षसे बाह्यार्थका उपलब्ध करते हुए भी विज्ञानवादीका यह कथन कि मै बाह्यार्थका अनुभव नहीं कर रहा हूँ सर्वथा अनर्गल है। यदि वह कहे कि मै यह नही कहता कि मै बाह्यार्थका अनुभव नहीं करता हूँ अपितु यह कहता हूँ कि उपलब्धिसे भिन्न बाह्यार्थ नही है। परतु यह भी उसका कथन ठीक नहीं यतः उपलब्धिवलसे ही बाह्यार्थ स्वीकृत होता है। उपलब्धिग्राहक साक्षीसे जैसे उपलब्धि गृहीत होती है वैसे ही उसकी बाह्यविषयता भी गृहीत होती है। घटादिके ज्ञानके साथ घटादि बाह्यविषय भी गृहीत होते हैं इसीलिये बाह्यार्थका प्रत्याख्यान करने- वाला भी कहता है कि अन्तर्ज्ञेयरूप है। वही बाह्यवत् प्रतीत होता है। वे लोग भी लोकप्रसिद्ध बाह्यार्थविषयीणी संवित्‌को समझते हुए ही उसके प्रत्याख्यानके लिये बाह्यार्थको वहिर्वत् ( बाह्यतुल्य ) कहते हैं। अन्यथा वहिर्वत् कहनेका कुछ भी अर्थ नही रह जाता । अत्यन्त असत्‌के साथ उपमा उपमेयभाव भी नही बन सकता कोई यह नहीं कहता है कि विष्णुमित्र वन्ध्यापुत्रके तुल्य भासित होता है। इन सब दृष्टियोसे अनुभवके अनुसार तत्त्व स्वीकार करनेवाले स्पष्टरूपसे कहते हैं कि घट पटादि बाह्य अर्थ ही भासित होता है बहिर्वत् नही।