मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 497, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ें७३८ मार्क्सवाद और रामराज्य पमर्द्द बिना किसी कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं होती । अतः कूटस्थ किसी कार्यका कारण नहीं हो सकता । इसलिये अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है क्योंकि स्थिर स्वभाववाले एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात सुवर्णादि ही कटकादिके कारण देखे जाते हैं । उपमर्द तो पूर्व अवस्थाका होता है । उपमृदित पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नहीं है । किंतु अनुपमृदित अन्वयी बीजावयव ही अङ्कुरादिके कारण होते हैं । कारणमें युगपत् अनेक अवस्था नहीं रह सकती । इसीलिये अङ्कुरावस्थाको लानेके लिये बीजावस्थाको हटना पड़ता है । घटावस्था लानेमें पिण्डावस्थाको भी हटना पड़ता है । अतएव बीजावस्था या पिण्डावस्था अङ्कुरादिके कारण नहीं है । किंतु बीजादिके अवयव ही कारण हैं । अतएव उन्हीका कार्यमें अन्वय है अवस्थाका अन्वय नहीं । शशविषाणादि असत्से उत्पत्ति नहीं होती ! सुवर्णादि सत्से ही उत्पत्ति होती देखी जाती है अतः अभावसे भावोत्पत्तिका सिद्धान्त सर्वथा असङ्गत है । यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो प्रयत्नहीन लोगोंकी भी अभीष्ट- सिद्धिमें कठिनाई नहीं होनी चाहिये । क्योंकि अभावरूपी साधन तो सबको सुलभ है । कृषकको बिना प्रयत्न ही व्रीहि-यवादिकी प्राप्ति होनी चाहिये । कुलालको भी प्रयत्न बिना ही घटादिकी निष्पत्ति होनी चाहिये । तन्तुवायके प्रयत्न बिना ही वस्त्रकी प्राप्ति होनी चाहिये । शिल्पियोंके प्रयत्न बिना ही विविध प्रकारके यन्त्रोंका निर्माण हो जाना चाहिये । स्वर्ग-अपवर्गके लिये भी किसीको कोई चेष्टा करनेकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिये । पर यह सब सङ्गत नहीं । विज्ञानवादी योगाचारका कहना है कि बाह्यार्थवादमें बुद्धका तात्पर्य नहीं था। कुछ शिष्योंका बाह्यार्थमें अभिनिवेश देखकर ही उन्होंने पञ्चस्कन्धका निरूपण किया है । वस्तुतः विज्ञानमात्र एक ही स्कन्ध बुद्धको अभीष्ट था । कहा जा सकता है कि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति—ये चार प्रकारके तत्त्व होते हैं । इनमेंसे एकके अभावमें भी तत्त्वका व्यवस्थापन नहीं बन सकता । अतः विज्ञानमात्रको तत्त्वसिद्ध करनेके लिये प्रमात्रादितत्त्व चतुष्टय मानना ही पड़ेगा । फिर जब, चार वस्तुएँ माननी ही पड़ीं तो विज्ञानमात्र वस्तु है यह कैसे कहा जा सकता है । परंतु विज्ञानवादीका कथन है कि यद्यपि विज्ञानरूप अनुभवसे भिन्न अनुभाव्य, अनुभविता एव अनुभवन कुछ भी नहीं है । तथापि बुद्धिकल्पितरूपसे विज्ञानमें प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति आदिका व्यवहार बन जाता है । असत्य आकारयुक्त विज्ञानका स्वरूप प्रमेय है । प्रमेय प्रकाशन प्रमाण फल है । प्रकाशन शक्ति ही प्रमाण है । बाह्यार्थवादमें भी बुद्ध्यारोहके बिना प्रमाणादि व्यवहार नहीं बन सकता । यदि प्रमाण और फलके भिन्न अधिकरण हो तो प्रमाण फलभाव हो ही नहीं सकता ।