मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७१८ मार्क्सवाद और रामराज्य यहाँ संक्षेपमें बौद्धप्रक्रिया समझ लेनी आवश्यक है, बुद्धने प्रतीत्य-समुत्पाद- का वर्णन किया है । प्रतीत्य-समुत्पादके सूचक बुद्धसूत्र हैं—‘‘उप्पादावा तथा गतानम्, अनुप्पादावा तथागतानं ठिताव सा धातु धम्म द्वितता धम्म ( नियामकता इदप्पच्चयता इति रेवो भिक्खवे परिच्च समुप्पादोति संयुत’’ ( कल्पतरु २।१ । २६।) भामतीकार कल्पतरुकार आदिकोंने इन सूत्रोंकी स्पष्ट व्याख्या की है । सूत्रोंका संस्कृतरूप यह है--- उत्पादा तथागतानामनुत्पादाद्वा स्थितैवैषा धर्माणां धर्मता । धर्मस्थितिता धर्मनियामकता प्रतीत्य समुत्पादानुलोभता ॥’’ सार यह है कि प्रत्येक कार्यमें दो प्रकारसे कारण सम्बन्ध होता है, हेतूप- निबन्ध एवं प्रत्ययोपनिबन्ध । प्रथम एकैककारण सम्बन्ध होता है, दूसरा कारणसमुदाय सम्बन्ध होता है। एक बीजरूपी हेतुका अङ्कुररूपी कार्यसे सम्बन्ध हेतूपनिबन्ध है। पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि अनेक कारणोंका अङ्कुरसे सम्बन्ध प्रत्ययोपनिबन्ध है। हेतुं हेतु प्रत्यन्ते इति प्रत्यया हेत्वन्तराणि मुख्य हेतुके प्रति सम्मिलित होनेवाले सहकारि कारण समूह प्रत्यय है ‘प्रत्ययाः सन्त्यस्मिन्निति प्रत्ययः’ अनेक प्रत्यय ( कारण ) जिस समवायमें हो वह प्रत्यय हेतुसमुदायका बोधक होता है ।
- ‘‘इदं प्रत्ययफलम्—इदं कार्यं प्रत्ययस्य कारणसमुदायमात्रस्य फलं न चेतनस्य कस्यचिदित्यर्थः’’ । अर्थात् कार्य इतरसहकारियोंसे सम्मिलित मुख्य हेतुरूप प्रत्ययका फल है। सारांश यह है कि अनेक सहकारी कारणोसे युक्त मुख्य हेतु ही कार्यमात्रका कारण है । कोई चेतन या ईश्वर कारण नहीं है। हेतूपनिबन्धका सूचक है—उत्पादाद्वा तथा गतानामित्यादि’’ । ‘‘तथागतानां बुद्धानां मते धर्माणां कार्याणां कारणानाञ्च या धर्मता कार्यकारणभावरूपा एषा उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा स्थिता, धत्ते इति धर्मः कारणम्, ध्रियते धर्मः कार्यम् यस्मिन्सति यदुत्पद्यते असति च नोत्पद्यते तत्तस्य कारणम् कार्यञ्च न क्वचित्कार्यसिद्धये चेतनोऽपेक्ष्यते । अर्थात् बुद्धोंके मतमें कार्य एवं कारणोंकी कार्यकारणभावरूप धर्मता उत्पाद एव अनुत्पादके अन्वय व्यतिरेकसे सिद्ध है। जिसके रहनेपर जो उत्पन्न होता है जिसके न रहनेपर जो नही उत्पन्न होता है वही कारण और कार्य है। जो उत्पन्न होता है वह कार्य है जिसके रहनेपर ही उत्पन्न होता है वही कारण है। धारण करनेवाला धर्म कारण है ध्रियमाण धर्म कार्य है। इस प्रकार यहाँ उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा इन पदोंका अन्वय-व्यतिरेक अर्थ हुआ। धर्मस्थितिता कार्यता है; क्योकि कार्यरूप धर्म ही कारणको अतिक्रमण