मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रियं विना काल विशेषमे स्थिति होती हे । स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल् प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितताका प्रयोग है । धर्मनियामकता कारणता है । धर्म अर्थात् कारण कार्यके प्रति नियामक है । यदि कहा जाय कि इस प्रकारका कार्यकारणभाव विना चेतनके नहीं हो सकता है, तो इसका समाधान है कि 'प्रतीत्य समुत्पादानुलोभता कारणे सति तत्प्रतीत्य प्राप्य समुत्पादानुलोमता प्रतीत्य समुत्पादानुसारिता या सैव धर्मता सा चोत्पादा सा नु व्यादात्मा धर्माणा स्थिता । न चेतनः कश्चिदुपलभ्यते' । अर्थात् कारणके रहनेपर कारणको प्राप्त करके कार्य समुत्पादका अनुसरण करनेवाली धर्मता होती है । अन्वय-व्यतिरेकानुसारिणी कारण एव कार्यमें स्थित है । यह प्रतीत्य समुत्पाद दो कारणोंसे सिद्ध होता है । हेतूपनिवन्धसे तथा प्रत्ययोप- निवन्धसे । एक मुख्य कारणसे सम्वन्धित हेतूपनिवन्ध होता है, अनेक सहकारी कारणोसे सम्बन्धित प्रत्ययसमवाय सम्वन्धित प्रत्ययोपनिवन्ध है । उनके भी दो भेद हैं । ( १ ) बाह्य और ( २ ) आध्यात्मिक । ( १ ) बाह्य—बीजसे अङ्कुर, अङ्कुरसे पत्र, पत्रसे काण्ड, काण्डसे नाल, नालसे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकसे पुष्प और पुष्पसे फल होता है । इसमें बीजको ज्ञान नहीं होता कि मै अङ्कुरको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी तरह अङ्कुर पत्र और पुष्प आदिको भी ज्ञान नहीं होता कि मै अपनेसे पश्चात् उत्पन्न होनेवालोको उत्पन्न कर रहा हूँ । इसी प्रकार अङ्कुर पुष्प फलादिको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे बीजने उत्पन्न किया है । यह बाह्य हेतूपनिवन्धका उदाहरण है । छः धातुओके समवायसे ही बीजसे अङ्कुर हो सकता है अन्यथा नहीं । इसमें पृथिवी धातु बीजका सग्रह करती है । जिससे अङ्कुर कठिन हो जाता है, जलधातु स्नेह व तेजधातु परिपाक करता है । वायुधातु बीजसे अङ्कुरको ऊपर फेकता है, और आकाश धातु बीजका अवयव अलग करता है । ऋतु भी बीजका परिपाक करता है । अविकल छः धातुओके समुदायसे ही बीज अङ्कुररूपमे परिणत होता है । इनमें न तो पृथिवी धातुको यह ज्ञान रहता है कि हमने बीजका सग्रह-कृत्य किया है और न तो ऋतुको ही ज्ञान होता हे कि हमने बीजका परिणाम किया है । साथ ही अङ्कुरको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे इन धातुओने बनाया है । यह बाह्य प्रत्ययोपनिवन्धका उदाहरण है । ( २ ) आध्यात्मिक—इसी तरह अविद्यासे संस्कार, सस्कारसे जन्म तथा जन्मसे जरा और मृत्यु होती है । अविद्याको ज्ञान नहीं होता कि मैने सस्कारको बनाया है और न सस्कारको ही ज्ञान होता है कि मुझे अविद्याने बनाया है । यह आध्यात्मिक हेतूपनिवन्धका उदाहरण है ।