मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
पृष्ठ 480, कुल 866 में से
संदर्भ में पढ़ेंयदि यह अभिप्राय हो कि अविद्यादि ही सघातके निमित्त हो जायेंगे तो सघातके ही सहारे टिकनेवाले सघातके निमित्त कैसे होगे । यदि ऐसा माना जाय कि ससारमे प्रवाहरूपसे सघात चले आ रहे हैं और उनके सहारे ही अविद्यादि रहते हैं, तो फिर यह प्रश्न होगा कि एक सघातसे जो दूसरा सघात उत्पन्न होता है, वह नियमतः उसके सदृश ही होता है, अथवा अनियमित विसदृश ? यदि नियमतः सदृश होता है तो मनुष्य पुद्गल ( मनुष्यपरमाणु ) कभी देवयोनि या तिर्यग्योनि नहीं बन सकती, यदि नियम नहीं है तो मनुष्य- पुद्गल कभी क्षणमे हाथी बनकर क्षणमे सिंह और क्षणमें पुन देवता एव क्षणमें फिर मनुष्य बन सकता है, परतु ऐसा नही होता—यह दोनो ही प्रकार लोकसिद्ध न्याय-विरुद्ध है । दूसरी बात यह है कि सुगत सिद्धान्तमें सघातका भोक्ता स्थिरजीव तो कोई होता नही, फिर तो भोग भोगके लिये, मोक्ष मोक्षके लिये ही होगा । किसी दूसरे पुरुषसे प्रार्थनीय पुरुषार्थ नहीं होगा । यदि भोग और मोक्ष दूसरेमे प्रार्थनीय माने जायें तो भोग मोक्षकालमे उनकी स्थिति रहनी चाहिये । फिर तो क्षणभङ्गुरवादका सिद्धान्त ही भङ्ग हो जायगा । अतः अविद्यामें भले ही परस्पर कार्यकारणभाव हो, परतु उनसे सघातसिद्धि नही हो सकती । सार यह है कि भले ही हेतूपनिबद्ध कार्य अन्यान्यपेक्ष केवल मुख्य हेतुके अधीन उत्पन्न होनेवाला होनेसे कथञ्चित् उत्पन्न हो जाय ( यद्यपि चेतनाधिष्ठित ही बीजसे अङ्कुर उत्पन्न होता है जैसे कुलालाधिष्ठित मृत्तिकासे घट ) फिर भी पञ्चस्कन्धसमुदाय तो प्रत्ययोपनिबद्ध है, वह एक हेतुमात्रके अधीन उत्पन्न नहीं होता है । किंतु उसमें नाना हेतुओका समवधान अपेक्षित होता है । चेतनके बिना नाना हेतुओका एकत्रीकरण नही हो सकता । बीजसे अङ्कुरोत्पत्ति भी धरणी अनिल जलादि सहकारी सापेक्ष होनेसे प्रत्ययोपनिबद्ध ही है, अतः वह पक्ष कुक्षिमें निक्षिप्त है । इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि चेतनानधिष्ठित बीजसे अङ्कुरोत्पत्तिके समान चेतनानधिष्ठित अचेतन अविद्या आदिसे उत्तरोत्तर कार्य उत्पन्न होगे, क्योकि बीजसे अङ्कुरोत्पत्ति भी पक्ष- कोटिमें ही है । वहाँ भी चेतनानधिष्ठितत्व सिषाधयिषित है, वह दृष्टान्त नही हो सकता । कुम्भकाराधिष्ठित मृत्तिकासे घटोत्पत्ति होती है यह दृष्टान्त निर्विवाद तथा वादि-प्रतिवादि उभयसम्मत है । परतु चेतनानधिष्ठित बीजसे अङ्कुरकी उत्पत्ति तो विवादास्पद एव संदिग्ध है । इसीलिये वह संदिग्ध साध्यवान् होनेसे पक्ष है, दृष्टान्त नही हो सकता । यदि पक्षको लेकर व्यभिचारका उद्भावन किया जाय तो अनुमान मात्राका उच्छेद हो जायगा । ऐसी स्थितिमे पर्वत पक्षमें ही धूमका वह्नि व्यभिचार
मा० रा० ४६—