भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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२९६ मार्क्सवाद और रामराज्य कुटुम्बमें विघटन, वैमनस्यसे नैतिक, सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक सभी प्रकारका पतन और पातक हो सकता है । पर उपर्युक्त लोगोंसे झगड़ा टालनेमें ये विषय उपस्थित ही नहीं होते । अतः समाजके संघटन, धारण-पोषणमें कोई बाधा नहीं पड़ती । धर्मके ही सम्बन्धसे बालक, बूढे, दुर्बल, रोगियोंके आग्रहो, बातों और चिडचिडापनको सहना पड़ता है, जो भौतिक और स्वार्थ-दृष्टिके संघटन- में असम्भव है । ज्येष्ठ भ्राताको पिताके समान और भार्या तथा पुत्रको अपना शरीर समझकर उनसे विवाद बचाना चाहिये । दासवर्गको अपनी छायामें और कन्याको परम दयाका पात्र जानकर उन सबका सहन करना चाहिये । भ्राता ज्येष्ठः समः पित्रा भार्या पुत्रः स्वका तनुः ॥ छाया स्वो दासवर्गश्च दुहिता कृपणं परम् । तस्मादेतैरधिक्षिप्तः सहेतासंज्वरः सदा ॥ (मनु० ४ । १८५) वास्तवमें इस तरह जो अपने सहवासियोंद्वारा अपनी निन्दा सह लेगा, वही व्यापक संघटनका अधिकारी होगा । किसी भी समाज या राष्ट्रको वशमें लानेके लिये बड़ी सहिष्णुता तथा स्वार्थ त्यागकी अपेक्षा है । अपने कुटुम्बको कुटुम्ब बनानेके बाद ही प्राणी वसुधाको कुटुम्ब बना सकता है । जिसका अपने कुटुम्बमें ही सहयोग नहीं, जो अपने कुटुम्बके ही अधिक्षेपोको नहीं सह सकता, वह दूसरोंके अधिक्षेपोको कैसे सहेगा और कैसे उनके लिये स्वार्थ त्याग करेगा ? अधिक क्या ? दैहिक संघटन भी कम चमत्कारपूर्ण नहीं है । हस्त, पाद, मुख, नेत्रादि एकदूसरेकी विपत्तियोंमें कैसे भाग लेते हैं ! पलके, हाथ आदि नेत्रकी सारी विपत्तिको स्वय लेना चाहती हैं। पैरमें काँटा लगनेपर नेत्र देखनेको उतावले हो उठते हैं; हाथ निकालनेको और मुँह फूँकनेको प्रस्तुत हो उठता है । देहीकी तो बात ही निराली है। यदि कहीं अपने दाँतोसे जीभ कट जाय तो क्या दाँत पत्थरसे तोड़ डाले जायें ? एक अङ्गसे दूसरे अङ्गपर आघात हो तो क्या देही उसे काट दे ? वह तो यही समझता है कि सब मेरे ही हैं । इस दृष्टिसे सर्वत्र व्यापक अनन्त एक आत्माको देखनेवाला पुरुष तो सब देहोको अपना ही अङ्ग समझता है, फिर अपनी देहपर प्रहार करनेवालेको क्या करे, क्योंकि वह भी तो अपना ही है— जिह्वां क्वचित् संदशति स्वदद्भिस्तद्वेदनायां कतमाय कुप्येत् । ( श्रीमद्भा० ११ । २३ । ५१ ) 'सब अपना ही कुटुम्ब है या अपना ही अङ्ग या स्वरूप है', इस दृष्टिसे समाज और राष्ट्र एव विश्वका हित चाहना बड़ी ऊँची बात है । बिना ऐसे भावोंके क्या संघटन सम्भव है ? राष्ट्रका वशीकरण यद्यपि समाजका आधार व्यक्ति है, तथापि बिना संघटनके समाज नहीं बनता।