भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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वर्ग-संघर्ष २०७ संगठित व्यक्तियोका प्रथम समाज कुटुम्ब ही है। उसके संचालनमें जिन गुणोंकी आवश्यकता होती है, वास्तवमें राष्ट्रके संचालनमें भी उन्हीं गुणोंकी आवश्यकता है। कुटुम्बमें भी भिन्न स्वार्थोंका संघर्ष है। किसी-न-किसी तरह उसमें सामञ्जस्य स्थापित करना छोटे, बड़े, बूढे, स्त्री, पुत्र, कलत्र सबको सन्तुष्ट रखना, नीतिद्वारा काम निकालना, किसीके साथ अन्याय न होने देना, अनुशासन और स्वतन्त्रताका उचित अनुपातमें मेल मिलाये रखना, सबको स्नेहके सूत्रमें बाँध रखना और घरके भीतर-बाहर शान्ति बनाये रखना जटिल समस्या है। राष्ट्रके संचालनमें भी ऐसी ही समस्याओंका पग-पगपर सामना करना पड़ता है। अतः जिसने कुटुम्ब-संचालन- में सफलता पा ली, वही राष्ट्र-संगठनमें भी सफल हो सकता है। इसीलिये शास्त्रोंमें कुटुम्बकी रक्षापर बड़ा जोर दिया गया है और सहिष्णुता, उदारता, समता, आज्ञापालन, सौहार्द, सौमनस्य आदि गुणोंकी बड़ी आवश्यकता बतलायी गयी है। कुटुम्बमे जो वास्तवमें एक छोटा मोटा राष्ट्र ही है, जबतक समान-मन, समान- उद्देश्य नहीं बनता एवं जबतक स्नेहसूत्रमें सब बँध नहीं जाते तबतक किसी प्रकारका अभ्युदय असम्भव है। इन सबको सम्पादन करनेके लिये अथर्ववेदके सामनस्य सूक्तमें (३।६।३०) एक अनुष्ठान बतलाया गया है। उसके मन्त्रोंका विधिवत् जप, हवन, अभिषेकद्वारा इस लक्ष्यकी सिद्धि होती है। इन मन्त्रोंके कुछ अंश एवं आशय इस प्रकार हैं—‘सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि वः’। (३।६।३०।१) अर्थात्—हे विवाद करनेवाले मनुष्यो ! मैं तुमलोगोंका वैमनस्य मिटाकर सौमनस्य करता हूँ। (यह उक्ति जापक, होता या अभिषेक करनेवालेकी है।) मैं तुम्हें समान हृदय, समान चित्तवृत्ति एवं सम्यक् प्रीतिसे सख्य भावसे युक्त बनाना चाहता हूँ। जैसे गौ अपने वत्सको चाहती है, वैसे तुमलोग भी एक दूसरेसे प्रेम करो—‘अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रा भवतु संमनाः। जाया पत्ये मधुमतीं वाचं वदतु शंतिवाम्।’ (२) पुत्र पिताका अनुगामी हो, माता पुत्रादिकोंके समान मनवाली और भार्या पतिसे सुखयुक्त मधुर वचन बोलनेवाली हो—‘मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन् मा स्वसारमुत स्वसा। सम्यञ्चः सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया।’ (३) एक भाई दूसरेसे द्वेष न करे, एक बहन दूसरेसे द्वेष न करे। सब लोग समान रहन-सहन, ज्ञान, कर्मसम्पन्न होकर कल्याणमयी वाणी बोले—‘येन देवा न वियन्ति नो च विद्विषते मिथः। तत्कृण्मो ब्रह्म वो गृहे। संज्ञानं पुरुषेभ्यः’ (४) जिस मन्त्रके प्रभावसे इन्द्रादि देवताओंका परस्पर विवाद, विद्वेष नहीं होता, उसी एक मत्यापादक सामनस्य मन्त्रको तुम्हारे गृहमें प्रयुक्त करता हूँ—‘ज्यायस्वन्तश्चित्तिनो मा वियौष्ट सराधयन्तः सधुराश्चरन्तः। अन्यो अन्यस्मै वल्गु वदन्त एत सध्रीचीनान्व संमनसस्कृणोमि।’ (५) तुमलोग ज्येष्ठ, कनिष्ठभावसे परस्पर अनुरक्त हो। समान चित्त होकर समान कार्यके लिये समान प्रयत्नशील हो। परस्पर वियुक्त न हो, एक दूसरेसे प्रियवाक् बोलते हुए परस्पर मिलो। मैं तुमलोगोंको समान कर्ममें समान मन होकर प्रवृत्त