भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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पृष्ठ 613

२९८ मार्क्सवाद और रामराज्य करता हूँ—'समानी प्रपा सह वोऽन्नभागः समाने योक्त्रे सह वो युनज्मि ।' ( ६ ) तुमलोगोंकी एक पानीयशाला हो, साथ ही अन्नभाग हो, ( एक जगह ही बैठकर अन्नपानादिका भोग करो, ) मैं तुमलोगोंको एक स्नेहपाशमे बाँधता हूँ । जैसे चारो ओरसे घेरकर अरा नाभी ( चक्र ) का आश्रयण करते हैं, वैसे ही समान फलकी आकांक्षासे तुम एक ही अग्निदेवकी उपासना करो—'सध्रीचीनान्वः संमनसस्कृणोम्येकश्नुष्टीन्संवनेनेन सर्वान् । देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायं प्रातः सौमनसो वोऽस्तु ।' ( ३ । ६ । ३० । ७ ) मैं तुम्हे एक कार्यके लिये एक चित्तसे सहोद्युक्त बनाता हूँ और एक प्रकार ही तुम्हारी व्याप्ति या मुक्ति हो। इस सांमनस्य वशीकरणसे मै तुम सबको वश करता हूँ । जैसे देवता एक मत होकर अजरामरत्व- प्रापक अमृतकी रक्षा करते हुए शोभनमनस्क होते हैं, वैसे ही आपलोग भी सदा शोभनमनस्क हों ।' कितनी उच्च और उदार कामनाएँ हैं । जो लोग अथर्ववेदको जादूगरी, टोनाटामरका पिटारा समझते हैं, उनका ध्यान क्या कभी इस ओर भी जाता है ? कुटुम्बियो एव कुटुम्बोके सौमनस्य, सामनस्यमें सारा राष्ट्र ही नहीं—सारा विश्व स्नेहपाशमें बँधकर एकमत होकर अपने अभीष्टको प्राप्त कर सकता है । सभा, सोसाइटियोंमें केवल प्रस्ताव पास करनेकी वीरता दिखलानेसे कुछ नहीं होता । मनुष्य कितनी ही दृष्टादृष्ट शक्तियोसे घिरा रहता है, सब बाते उसके वशकी नहीं । इसीलिये लौकिक प्रयत्नोंके साथ पारलौकिक प्रयत्नोकी भी आवश्यकता रहती है। सकल्पकी शक्ति बड़ी प्रबल होती है । उनका प्रभाव लौकिक स्थितियोपर भी पडता है । आज कुटुम्ब, राष्ट्र तथा विश्वमें विघटन-ही-विघटन है । 'अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग' सर्वत्र आज यही दिखलायी दे रहा है। जहाँ देखो, वहीं ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थ, कलह, संघर्षका साम्राज्य है । इनके प्रशमनके आधुनिक सभी उपाय विफल हो रहे हैं। आज वैज्ञानिक अनुसंधानोके पीछे लाखो रुपये उड़ते हैं। असफलता होनेपर भी कुछ नवीन बातोके अनुभव होनेका संतोष कर लिया जाता है । फिर क्यो न कभी कुछ दैवी प्रयत्न करके भी देख लिया जाय ? यदि हमसे कठिन अनुष्ठान नहीं होते तो क्या इतना भी नहीं बन पड़ता कि प्रतिदिन अपनी श्रद्धानुसार कुछ जप, भजन, प्रार्थना विश्वकल्याणार्थ करके देख ले कि उसका फल क्या होता है ? समाजवादमें लोकतन्त्र 'सोवियट कम्युनिज्म' ( रूसी साम्यवाद ) नामक पुस्तकमें फेबियन वेव दम्पतिने लिखा है कि 'जहाँ अमेरिका, ब्रिटेनमें ६० प्रतिशत जनता चुनावमें भाग लेती है, वहाँ सोवियट रूसमें ८० प्रतिशत जनता भाग लेती है । इस आधार- पर मार्क्सवादी सर्वहाराका अधिनायकत्व ही वास्तविक जनतन्त्र है । ब्रिटेन, अमेरिकाका जनतन्त्र तो ढोगमात्र है ।' परंतु दूसरी पार्टीको प्रेस, पत्र, प्रचार