भारतकोश
मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)

Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished866 पृष्ठ

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आलस्य छुड़ाकर अनुन्नत लोगोंको उन्नत बनानेका प्रयत्न किया जाय। अतः वर्ग-लोप करके समानता स्थापनाकी बात व्यर्थ है । कम्युनिस्टोंका किसीकी जायदादपर बलात् आक्रमण तथा प्राचीन प्रणालियोंपर आक्रमण सिद्ध करता है कि लोकसिद्ध न्याय एवं सत्यके आधारपर वे अभीष्ट-सिद्धि नहीं कर सकते ।

कम्युनिस्टोंकी कूटनीति

'कम्युनिस्टोंके हाथ शासनसूत्र न जाकर प्रजातन्त्रवादियोंके हाथमें आने- पर' मार्क्सकी रायमें 'कम्युनिस्टोंको उससे अलग ही रहकर उनके कामोंमें अड़ंगा डालते रहना चाहिये । उनके सामने ऐसी शर्त पेश करनी चाहिये जिनका मानना असम्भव हो । क्रान्तिके अवसरपर श्रमजीवियोंको चाहिये कि मध्यम श्रेणीवालोंके साथ किसी प्रकारके समझौतेका विरोध करें । प्रजातन्त्र- वादियोंको अत्याचार करनेके लिये बाध्य कर दें । उनके अत्याचारोंका उदाहरण देकर लोगोंमें जोश बढ़ाना चाहिये । क्रान्तिके आरम्भ और मध्यमें प्रजातन्त्र- वादियोंके साथ अपनी माँग भी पेश करते रहना चाहिये । यदि प्रजातन्त्र- वादियोंको सफलता मिली तो श्रमजीवियोंकी सुरक्षाकी गारण्टी माँगनी चाहिये । अधिकाधिक सुधारों और अधिकारोंकी माँग करनी चाहिये । सरकारपर खुले आम अविश्वास प्रकट करना चाहिये, जिससे उनका विजयका गर्व ठंडा हो जाय । शासनके मुकाबले अपने मजदूर पञ्चायतोंकी स्थापना करनी चाहिये । शासनके सामने कई अड़चनें खड़ी होंगी और सम्पूर्ण मजदूर-शक्तिके साथ सरकारको लोहा लेना पड़ेगा । क्रान्तिके अनन्तर श्रमजीवियोंको पराजित शत्रु की निन्दा न करके पुराने साथी, प्रजातन्त्रवादियोंके प्रति अविश्वास प्रकट करें । श्रमजीवियोंको सशस्त्र और संघटित रहना चाहिये । इससे मजदूरोंका विश्वास जागरूक होता है। बन सके तो सरकारी सेना संघटनमें बाधा डाली जाय । यदि यह न हो सके तो अपनी सेना बनानी चाहिये । सेनापति, अफसर आदि ऐसे ही लोग हों जो मजदूर-कमेटीकी आज्ञा पालन कर सकें । सरकारी सेनाके भी सशस्त्र श्रमजीवियोंको अपने पक्षमें कर लेना चाहिये । मध्यम श्रेणीके प्रजातन्त्रवादियोंके प्रभावसे श्रमजीवियोंको मुक्त करना और उनका स्वतन्त्र सशस्त्र संघटन करना परमावश्यक होता है । तरह-तरहके अड़ंगे डालकर शासन चलाना असम्भव करना श्रमजीवियोंका प्रोग्राम होना चाहिये ।' उपर्युक्त कम्युनिस्ट-नीतिसे उनकी ईमानदारी एवं सद्भावनाका भंडा- फोड़ होता है । इससे स्पष्ट है कि कम्युनिस्ट अपने न्यायपूर्ण तर्क, युक्ति एवं सिद्धान्तोंके द्वारा लोकको प्रभावित कर बहुमत प्राप्त करनेकी आशा नहीं रखते । साथ ही जाल फरेब बिना किये अपने पुराने साथियों तथा उपकारियोंको गिरा