मार्क्सवाद और रामराज्य (स्वामी करपात्री जी महाराज - साम्यवाद समीक्षा एवं वैदिक समाज-दर्शन)
Marxvad aur Ramrajya of Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
आलस्य छुड़ाकर अनुन्नत लोगोंको उन्नत बनानेका प्रयत्न किया जाय। अतः वर्ग-लोप करके समानता स्थापनाकी बात व्यर्थ है । कम्युनिस्टोंका किसीकी जायदादपर बलात् आक्रमण तथा प्राचीन प्रणालियोंपर आक्रमण सिद्ध करता है कि लोकसिद्ध न्याय एवं सत्यके आधारपर वे अभीष्ट-सिद्धि नहीं कर सकते ।
कम्युनिस्टोंकी कूटनीति
'कम्युनिस्टोंके हाथ शासनसूत्र न जाकर प्रजातन्त्रवादियोंके हाथमें आने- पर' मार्क्सकी रायमें 'कम्युनिस्टोंको उससे अलग ही रहकर उनके कामोंमें अड़ंगा डालते रहना चाहिये । उनके सामने ऐसी शर्त पेश करनी चाहिये जिनका मानना असम्भव हो । क्रान्तिके अवसरपर श्रमजीवियोंको चाहिये कि मध्यम श्रेणीवालोंके साथ किसी प्रकारके समझौतेका विरोध करें । प्रजातन्त्र- वादियोंको अत्याचार करनेके लिये बाध्य कर दें । उनके अत्याचारोंका उदाहरण देकर लोगोंमें जोश बढ़ाना चाहिये । क्रान्तिके आरम्भ और मध्यमें प्रजातन्त्र- वादियोंके साथ अपनी माँग भी पेश करते रहना चाहिये । यदि प्रजातन्त्र- वादियोंको सफलता मिली तो श्रमजीवियोंकी सुरक्षाकी गारण्टी माँगनी चाहिये । अधिकाधिक सुधारों और अधिकारोंकी माँग करनी चाहिये । सरकारपर खुले आम अविश्वास प्रकट करना चाहिये, जिससे उनका विजयका गर्व ठंडा हो जाय । शासनके मुकाबले अपने मजदूर पञ्चायतोंकी स्थापना करनी चाहिये । शासनके सामने कई अड़चनें खड़ी होंगी और सम्पूर्ण मजदूर-शक्तिके साथ सरकारको लोहा लेना पड़ेगा । क्रान्तिके अनन्तर श्रमजीवियोंको पराजित शत्रु की निन्दा न करके पुराने साथी, प्रजातन्त्रवादियोंके प्रति अविश्वास प्रकट करें । श्रमजीवियोंको सशस्त्र और संघटित रहना चाहिये । इससे मजदूरोंका विश्वास जागरूक होता है। बन सके तो सरकारी सेना संघटनमें बाधा डाली जाय । यदि यह न हो सके तो अपनी सेना बनानी चाहिये । सेनापति, अफसर आदि ऐसे ही लोग हों जो मजदूर-कमेटीकी आज्ञा पालन कर सकें । सरकारी सेनाके भी सशस्त्र श्रमजीवियोंको अपने पक्षमें कर लेना चाहिये । मध्यम श्रेणीके प्रजातन्त्रवादियोंके प्रभावसे श्रमजीवियोंको मुक्त करना और उनका स्वतन्त्र सशस्त्र संघटन करना परमावश्यक होता है । तरह-तरहके अड़ंगे डालकर शासन चलाना असम्भव करना श्रमजीवियोंका प्रोग्राम होना चाहिये ।' उपर्युक्त कम्युनिस्ट-नीतिसे उनकी ईमानदारी एवं सद्भावनाका भंडा- फोड़ होता है । इससे स्पष्ट है कि कम्युनिस्ट अपने न्यायपूर्ण तर्क, युक्ति एवं सिद्धान्तोंके द्वारा लोकको प्रभावित कर बहुमत प्राप्त करनेकी आशा नहीं रखते । साथ ही जाल फरेब बिना किये अपने पुराने साथियों तथा उपकारियोंको गिरा
३०४ मार्क्सवाद और रामराज्य धोखा दिये, उनको बिना समाप्त किये भी सफलताकी आशा नहीं रखते । यह सामान्य न्याय है कि अत्याचार करनेवाला उतना अपराधी नहीं माना जाता, जितना कि अत्याचार करनेके लिये किसीको बाध्य करनेवाला। किसी सुशासनमें अड़ंगा डालना या उसके सामने ऐसी शर्तें उपस्थित करना जिनका मानना असम्भव हो, स्पष्ट ही बेईमानी है । यहाँ लोकहितकी तो कोई भावना ही नहीं है। केवल जिस किसी तरह शासनसत्ता हथियानेके लिये ही सब प्रकारका अत्याचार करना, बेईमानी अपनाना उन्हें मंजूर है । इसी तरह उत्तेजना फैलाकर उत्तेजित करके युद्ध कराना अलग बात है और उत्तेजित करके न्यायको अन्याय एवं उचितको अनुचित समझनेके लिये बाध्य करना अलग बात है। यह सर्वसम्मत है कि वस्तुस्थिति समझनेमें किसी प्रकारकी भावुकता या उत्तेजना बाधक होती है। इसी तरह मध्यम श्रेणीके लोगोंसे किसी प्रकारके समझौतेका विरोध करना भी विचित्र बात है। यदि उचित आधारपर समझौता सम्भव हो और समझौता लोक-कल्याणकारी हो, तो भी उसका विरोध क्यो करना ? क्या अपना उल्लू सीधा करनेके लिये ? यदि ऐसा ही तो फिर कम्युनिष्ट दूसरोंकी ऐसी भावनाओंका किस मुँहसे विरोध कर सकता है ? इसी तरह पुराने निन्दनीय साथियोंकी निन्दा न कर प्रशंसा करना वर्तमान योग्य एवं उचित शासनके प्रति अविश्वास प्रकट करना भी सद्भावनाका सूचक नहीं । कम्युनिष्टोंके प्रोग्रामोंको समझकर यदि शासनारूढ़ प्रजातन्त्रवादी भी उनके अनुसार ही सत्य, न्यायकी चिन्ता न कर बदला चुकानेपर उतर आये तो फिर कम्युनिष्ट तथा उनके छिट-फुट सैनिक संगठनको अन्त करनेमें कितना विलम्ब होगा ? बल्कि लोक हितकर तथा शास्त्रसम्मत तो यही है— यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यस्तस्मिन् तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया वाधितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युपेयः ॥ (महा० शां० प० १०९ । ३०) मायवीके साथ मायासे तथा साधुके साथ साधुतासे व्यवहार करना उचित ही है। मार्क्स आगे कहता है—'प्रजातन्त्रवादियोको प्राचीन सामाजिक प्रणालीपर जितना हो आक्रमण करनेके लिये लाचार किया जाय, निश्चित कार्यक्रममें बाधा डाली जाय तथा पैदावार और माल ढोनेके साधनोको राज्यके अधिकारमें लानेका आग्रह किया जाय । निजी जायदादपर आक्रमण करनेवाले प्रस्तावोंको बार-बार लाना चाहिये । यदि सरकार रेलों, कारखानोंको खरीदनेका प्रस्ताव करे तो बिना हरजाना, बिना मुआवजा दिये ही उसे राज्यकी सम्पत्ति बना लेनेका प्रस्ताव होना चाहिये । सम्पत्ति-वृद्धिपर इतना बड़ा टैक्स लगानेका प्रस्ताव पेश होना चाहिये जिससे बड़ी जायदादवालोका दिवाला ही निकल जाय । प्रजातन्त्र-
वर्ग-संघर्ष ३०५ वादियोंद्वारा लाये गये राज्यके कर्ज चुकाने आदि प्रस्ताव आनेपर राज्यके दिवालिया होनेका प्रस्ताव लाना चाहिये। प्रजातन्त्रवादी स्थानीय, स्वाधीनता, स्वभाग्य-निर्णय आदिके नामपर देशको अनेक भागोंमें बाँटनेका प्रयत्न कर सकते हैं। श्रमजीवियोंको इन सब बातोंका विरोध कर संयुक्त शासनपर ही जोर देना चाहिये। उपर्युक्त मार्क्सीय कार्यक्रमोंके अनुसार ही कम्युनिष्टोंकी अड़ंगेबाजी चलती रहती है। उन्हें केवल विरोधके लिये विरोध करना है, अन्य किसी सार्व- जनिक हितकी दृष्टिसे नहीं। अनैतिकता तथा उच्छृङ्खलताका स्वयं विस्तार करना अथवा सरकारको वैसा करनेके लिये बाध्य करना घोर अराजकता एव उद्दण्डताका विस्तार करना है। व्यक्तिगत छोटे-बड़े किसी भी व्यापार या उद्योग-धन्धों, पैदावार या माल ढोनेवाले साधनोंका अपहरण चौर्य ही हो सकता है। कभी चोर भले बिना दण्ड पाये ही छूट जायें, परंतु ऐसे लोगोंको तो चोरसे भी उग्र दण्ड मिलना ही चाहिये। उत्पादन और समाज कम्युनिष्टोंकी प्रणालीके अनुसार "साधनोंपर समाजका अधिकार होनेसे सहयोगपूर्वक पैदावार तथा व्यावहारिक शिक्षाका विस्तार होगा। तभी हर व्यक्तिसे उसकी शक्तिके अनुसार काम लेने तथा उसकी आवश्यकताके अनुसार वस्तु देनेका सिद्धान्त चल सकेगा। जबतक आर्थिक, सामाजिक, शिक्षा-सम्बन्धी प्राचीन प्रणाली कायम रहेगी, तबतक वैसी व्यवस्था नहीं हो सकती। तबतक जो जितना काम करेगा, उतना ही उसे फल दिया जायगा। केवल शासनका कारबार चलाने एवं शिक्षा तथा अन्य कार्योंके लिये कुछ अंश काट लिया जायगा। काम करनेके घंटे नियत होंगे। जो जितनी देर काम करेगा, उसको एक प्रमाणपत्र दिया जायगा, जिसे दिखाकर वह उतना सामान ले सकेगा। वह जितना श्रम करेगा, उतना ही वह दूसरे रूपमें पा जायगा। व्यक्तिमें समानरूपसे योग्यता और शक्ति नहीं होती, इसीलिये वस्तुओंका बँटवारा असमान रूपसे होगा। जब सर्वाङ्गपूर्ण कम्युनिष्ट समाजमें शारीरिक एवं बौद्धश्रमका अन्तर मिट जायगा, जब उत्पादन क्रिया ही जीवनका सर्वप्रधान आवश्यकता हो जायगी, जब व्यक्तियों एवं उत्पादक-शक्तियोंका पूर्णरूपसे विकास हो जायगा—समाजके सभी सदस्योंके पूर्ण सहयोगसे चीजोंकी पैदावार खूब बढ़ जायगी, तभी पूँजीवादी समाजका स्वत्वसम्बन्धी विचार त्यागा जा सकता है और उसके स्थानपर समानताका सिद्धान्त लाया जा सकता है। यद्यपि श्रमजीवी आन्दोलनका अन्तर्राष्ट्रीय होना आवश्यक है, तथापि राष्ट्रियताके आर्थिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक महत्त्वको भी भुलाया नहीं मा० रा० ६०—
जा सकता। साधनोंपर समाजका अधिकार होनेसे सहयोगपूर्वक पैदावार तथा व्यावहारिक शिक्षाका विस्तार होगा। तब हर व्यक्तिसे उसकी शक्तिके अनुसार काम लेने और उसकी आवश्यकतानुसार वस्तु देनेका सिद्धान्त चल सकेगा।' पर यह केवल व्यामोहक वाग्जाल है। व्यक्तिगत सम्पत्तियो तथा साधनोपर कुछ मुट्ठीभर लोगोंका अधिकार-सम्पादनके लिये ही समाजका नाम लिया जाता है। वस्तुतः व्यक्तियोंके समुदायका ही नाम तो समाज है। यदि व्यक्ति निर्धन, निःसत्त्व, निःसाधन हो जाते हैं तो समाज भी सुतरां निःसत्त्व, निःसाधन हो जाता है। हाँ, समाजके नामपर मुट्ठीभर लोगोंको यह अवसर अवश्य मिल जाता है कि वे संसारको धोखा दे सके। जो लोग सिवा मजदूरोंके बहुसंख्यक मध्यमश्रेणी तथा गरीब किसानोको भी मिटा देना आवश्यक समझते हैं, वे भी समानताकी बात करे तो 'किमाश्चर्यमतः परम् ।' कौन नहीं जानता कि मिलमालिकों, पूँजीपतियों एवं मजदूरों सबको भी भोजन-प्राप्ति किसानके श्रमका ही फल है। किसानके नष्ट हो जानेपर सभी भूखों मर जायेंगे। यन्त्रीकरण या राष्ट्रियकरणके नामपर सबकी समानताकी बात उपहासास्पद है। जैसे रोगियों- को मारकर राष्ट्रको निरोग करनेका फारमूला मूर्खतापूर्ण है, वैसे ही मजदूरोंसे भिन्न लोगोंको समाप्त कर समानताकी स्थापना भी मूर्खतापूर्ण मक्कारी है। अन्तमें मालिक बन जानेपर मजदूर भी मजदूर न रह जायँगे। उनमें भी वही विषमता परिलक्षित होने लगेगी। कौन कह सकता है कि रूसी प्रधान मन्त्री, गृहमन्त्री या पार्टीके संचालक मजदूर होते हैं और उनका जीवनस्तर पदप्राप्तिके बाद मजदूरोंके तुल्य ही होता है ? व्यक्तिको हानि-लाभका डर न होनेसे, पैदावार एव शिक्षामे उन्नति होना असम्भव है। प्रायः इसके उदाहरणके रूपमें रूसका नाम लिया जाता है। परन्तु वहाँकी वस्तुस्थिति कुछ और है, अतिरंजित वर्णन कुछ और ही। वहाँ भी व्यक्तिगत रुपयोंका कारखाना, सूद लेना गैर कानूनी नहीं है। प्रतियोगिताएँ भी चलती हैं। शक्ति एव योग्यता रहते हुए भी ईमानदारी न होनेसे उनका उचित प्रयोग नहीं किया जाता, अतः शक्तिचौर्य भी चलता है। चेतन मनुष्य, जडयन्त्रोंके तुल्य सर्वथा परेच्छया काम नहीं कर सकता। उसकी अपनी इच्छा, अपनी रुचि, अपना उत्साह जबतक न होगा, तबतक सुचारुरूपमें कार्य चलना सम्भव नहीं होता। मुट्ठीभर तानाशाहोंद्वारा सचालित शासन-यन्त्रके नगण्य कल-पुर्जे बनकर व्यक्तियोंमे इच्छा, रुचि, उत्साह आदिका सर्वथा अन्त हो जाता है। धर्म-नियन्त्रित शासन-तन्त्र रामराज्यमें, प्रत्येक व्यक्तिको अपनी शक्ति, एव योग्यताका विशिष्ट फल मिलता है। इसीलिये वह शक्ति एव योग्यतामें
वर्ग-संघर्ष ३०७ विशेषता लानेका यत्न भी करता है। वह अपनी कमाई अपनी पत्नी एवं पुत्र-पौत्रोंको छोड़ जाता है या अपने बूढ़े माँ-बापकी सेवामें लगा सकता है। अपना और अपने पूर्वजोंके नाम अमर करनेके लिये अनेक प्रकारका सामाजिक उपकारका काम करता है। यज्ञ, तप, दानके द्वारा अपना लोक-परलोक बनानेके लिये अपनी कमाईका उपयोग कर सकता है। इस दृष्टिमे उत्साहका और ही रूप रहता है। जो शुद्ध जडवादी, धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कारोंसे शून्य होते हैं, वे ही चार्वाकप्राय मार्क्सवादियोंकी योजनाओंमें सन्तुष्ट रह सकते हैं। वे ही कह सकते हैं— यावज्जीव सुखं जीवेद्ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥ (सर्वदर्शनसंग्रह १) अर्थात् जबतक जीवन रहे सुखपूर्वक रहे, किसीको मार, धमका, कानून बनाकर उसका वित्त, कलत्र, गृहभूमि छीनकर सुरापान करना चाहिये । शरीर मरकर भस्म हो जायगा। लोक-परलोक—कुछ भी सत्य नहीं, फिर धर्माधर्मके चक्करमें क्यों पड़ा जाय ? कुरान, पुराण, वेद, वाइविल, गिर्जा, गुरुद्वारा, मन्दिर, मसजिद, राम, रहीम, गाड, अहुरमज्ड, दोजख, वहिश्त, स्वर्ग, नरक कुछ भी नहीं। फिर किसी भी नियन्त्रण, सदाचार, दान, पुण्यकी क्या आवश्यकता रह जाती है ? घण्टेकी आवाजपर सामाजिक या सामूहिक कल- कारखानों या सरकारी खेतोंमें काम करना, भोजनालयोंमें भोजन कर लेना, सरकारी औरतोंसे सरकारी बच्चे पैदा करना, सरकारी शिशु पोषणालयोंमें उन्हें भेज देना, सरकारी अस्पतालोंमे बीमार होकर मर जाना, ऐसे यान्त्रिक जीवनमें न तो कोई उल्लास है, न उत्साह । न तो इसमें लौकिक ही सुख है, न परलोककी ही आशा । ऐसा नीरस, निरुत्साह जीवन उन्हें कथमपि पसन्द न होगा, जो कुछ भी दीन या ईमान मानते हैं, जिन्हें कुरान-पुराणादि उपर्युक्त वस्तुओंपर तनिक भी विश्वास है, ऐसा निराशापूर्ण जीवन वे कथमपि नहीं पसन्द कर सकते । ऐसे दीनदार, ईमानदार लोगोंके लिये धर्मसापेक्ष, पक्षपातहीन राज्य, रामराज्य ही श्रेष्ठ है, जहाँ लोक-परलोक सभी आशापूर्ण एव उत्साहप्रद होते हैं। इसी प्रकार आवश्यकताका भी निर्णय भोक्ता ही करे या सरकार ? यह स्पष्ट है कि सरकारद्वारा भोक्ताके आन्तरिक आवश्यकताका ध्यान रखे बिना किया हुआ निर्णय संतोषकारक नहीं होगा । भोक्ताओंकी दृष्टिसे ही यदि आवश्यकताका निर्णय होगा, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसकी शक्ति और आवश्यकताका संतुलन रहेगा। शक्ति एव योग्यता कम होनेपर भी, काम न करनेपर भी आवश्यकता अधिक हो सकती है। फिर राज्य उसकी पूर्ति कैसे कर सकेगा ? 'काम करनेमे आलसी भोजनको होशियार ।' 'अलसः स्यात्
३०८ मार्क्सवाद और रामराज्य कामाश्च ।' आलसी किंतु अच्छे भोजन-वस्त्र, वाहन, मकानकी कामनावाले लोगोकी कमी किसी देशमें नहीं है । पर यह सम्भव नहीं । अतः— कर्म प्रधान विश्व करि राखा । जो जस करै सो तस फल चाखा ॥ यह भारतीय सिद्धान्त ही श्रेष्ठ है। जो जैसा करता है, वैसा ही फल पाता है । विश्वस्रष्टा परमेश्वर एवं विश्वहितैषी निष्काम महर्षियो या उनके भी सम्मान्य अनादि अपौरुषेय शास्त्रोंद्वारा ही कर्मफलका साध्य-साधनभाव जानना ठीक है । पारलौकिक कर्मों एव फलोंका साध्य-साधनभाव जिस प्रकार शास्त्रों एव शिष्टोद्वारा जाना जाता है, वैसे ही शास्त्रो एवं शिष्टोके आधारपर ही लौकिक कर्मों एवं उनके फलोंका भी साध्य साधनभाव निर्णीत होना श्रेष्ठ है । कम-से-कम निर्धारित, संतुलित जीवनस्तर एवं तदनुसार ही काम-दामके अतिरिक्त कर्मोंकी विशेषताके अनुसार ही फलोंमें विशेषताकी बात उपयुक्त होती है । इस पक्षमें आवश्यकताके अनुसार फलाकाङ्क्षा होगी । फलाकाङ्क्षाके अनुसार कर्ममें प्रवृत्ति होगी । परंतु शक्ति एवं योग्यता वहाँ नियामिका होगी । अतः शक्ति एवं योग्यतानुसार ही प्राणी कर्म कर सकेगा । तदनुसार ही फल पा सकेगा । अतः तदनुसार ही आवश्यकता भी बनानेका प्रयत्न करेगा । आवश्यकताका घटाना-बढ़ाना जितना सम्भव हो सकता है, शक्तिका घटाना-बढ़ाना उतना आसान नहीं है । फिर प्रतिदिन मजदूरी करना, सर्टिफिकेट दिखाकर भोजन लेना, यह कोई सम्मानकी बात नही । जब बँटवारेमें असमानता स्वीकार है, तो फिर समानताकी बात केवल प्रलोभन नहीं तो और क्या है ? फिर वहाँ भी ईमानदारीका प्रश्न खडा हो सकता है । अगर व्यवस्थापक ईमानदार हो तब तो ईमानदारीसे कर्मोनुसार वितरण कर सकेगा । यह भी तभी सम्भव है जब कि व्यक्तिके ईमानदारीपर विश्वास भी हो । पर यदि ऐसा विश्वास सम्भव ही है तब तो व्यक्तिगत काम लेनेवाला भी ईमानदारीसे फल वितरण कर सकता है। यदि व्यक्तयोंकी ईमानदारीका विश्वास नहीं हो सकता तो व्यवस्थापकोंकी ईमानदारीपर भी कैसे विश्वास होगा ? जो कहते हैं कि 'बेईमान व्यवस्थापक हटा दिया जायगा,' वह भी ठीक नहीं; क्योकि सभी शक्तियोके केन्द्रीकरण हो जानेसे, व्यक्तियोके पास व्यवस्थापकोंको हटानेकी कोई शक्ति नहीं रहती । सभी कम्युनिष्ट कभी समानरूपसे बौद्धिक, शारीरिक क्षमतायुक्त हो सकें तो उनका अन्तर मिट सकेगा । सभी समानरूपसे ईमानदार हो जायें, शक्तिभर काम करें और अनिवार्य आवश्यकतासे कोई अधिक दाम या सामान न ले, यह
सुख-स्वप्न जड़वादियोंकी अपेक्षा अध्यात्मवादियोंके यहाँ कहीं अधिक सफल होता है। रामराज्यमें तो इस तरहके स्वप्न साकार भी हो चुके हैं— नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥ नाधिव्याधिजराग्लानिदुःखशोकमयभ्रमाः । मृत्युश्चानिच्छतां चासीद् रामे राजन्यधोक्षजे ॥ (श्रीमद्भा० ९।१०।५४) न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यपः। नानाहिताग्निर्नायज्वा न स्वैरी स्वैरिणी कुतः ॥ (छान्दोग्योप० ५।११।५) फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन। चरहिं एक सँग गज पंचानन ॥ सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥ जहाँ कोई किसीका शोषक न हो, दूसरेके पोषक तथा हितैषी ही हों, सभी सुखी, सम्पन्न, स्वधर्मनिष्ठ, ईश्वरपरायण, शिक्षित उदार हों, जहाँ कोई चोर, सुरापी, कायर, स्वैरी, स्वैरिणी न हो, सभी आहिताग्नि, यज्वा, स्वधर्मनिष्ठ हों, ऐसा शासनतन्त्र तो अध्यात्मवादमें ही सम्भव होता है। जड़वादमें तो इस सुखके पूरा होनेका स्वप्न दुराशामात्र ही है। शासनके कारोबारको चलानेके लिये तथा शिक्षा एवं अन्य कार्योंके लिये कोई भी सभ्य शासन कुछ अंश ही काटता है। अंग्रेज भारतपर शासन करते थे, वे भी आमदनी तथा खर्चका लेखा-जोखा बराबर दिखाते रहते थे। पर आजकल शासन, राष्ट्ररक्षणके नामपर, कितने गुप्तचर, पुलिस, पलटन एवं शस्त्रास्त्र अपेक्षित होते हैं, यह विज्ञोंसे तिरोहित नहीं है। प्राचीन भारतीय ढंगके धर्मनियन्त्रित शासनोंमें तो नियम यह था कि जैसे सूर्य तिग्मरश्मियोंसे पृथ्वीका जल खींचते हैं और समय आते ही उसे बरसाकर विश्व-कल्याण एवं रक्षण करते हैं, वैसे ही शासक भी प्रजाका कर उसके कुसमयमें वितरण कर देता था, उसे अपने उपभोगमें वह नहीं लाता था। कितने मुसल्मान बादशाह भी अपना निर्वाह टोपी सीकर, कुरान लिखकर, किताबें लिखकर, उन्हें बेंचकर कर लेते थे। ऐसे ही दूसरे राजा भी अपनी जीवन-यात्रा चलाते रहे हैं। यदि लाखोंका सालाना वेतन पानेवाले भी शोषित हैं और उनका राज्य भी कल्याणकारी राज्य है, तो फिर जमींदारोंका ही राज्य क्या बुरा है ? व्यावहारिक अनुभव तो यह है कि सूर्य भी उतना तापक नहीं होता जितना तत्सङ्घृष्ट वालुका- निकर (कण) तापक होता है। कहा जाता है मजदूरोंको भूखे मरते हुए लाचारीसे अल्प मूल्यमे बहुत काम करना पड़ता है, परंतु उसी तरह किसी अवसरपर मजदूर भी अवसरका अनुचित लाभ उठाते ही हैं। रिक्शे, ताँगे तथा नाववाले कभी-कभी चार आनेके बदले
३१० मार्क्सवाद और रामराज्य आठ रुपये ले लेते हैं । किसी गरीबका लडका बीमार है, अस्पताल जाना है, यदि मौके-बेमौके अन्य रिक्शे आदि तैयार नहीं तो वह बिना रहम किये गरीबसे मनमाना पैसा लेता है । लाचार होकर गरीबको देना ही पडता है । ऐसे अवसरसे डाक्टर, इजीनियर—सभी नाजायज फायदा उठाते हैं । इसी तरह टूटते हुए बाँध, वर्षाके समय गिरते हुए मकान, अचानक बिगड़े हुए कारखानोंको सुधारनेके लिये श्रमजीवी मनमानी दाम लेते हैं । मार्गमें बिगड़ी हुई मोटरको सुधारनेमें अति शीघ्र सुधारनेकी आवश्यकता जानकर श्रमजीवी मनमाना दाम लेता है । कुम्भादिके अवसरपर मल्लाह दो पैसेके बदले गरीबों, धर्म-भीरुओंसे बीस-बीस ले लेते हैं । फिर कम्युनिष्ट इनको शोषित ही कहेगे और उनके इन कार्योंको उचित ही । इतना ही क्यों ? वे चोरी और हत्या-जैसी चीजको भी उनकी गरीबी और लाचारीकी दुहाई देकर उचित कहनेका प्रयत्न करते हैं, फिर तो किसीके बलात्कार व्यभिचारका भी यह कहकर समर्थन किया जा सकता है कि उसके पास स्त्री नहीं थी, कामातुर होकर उसने लाचारीसे बलात्कार किया है । वस्तुतः सर्व- मान्य परम्परा-सिद्ध किसी भी शास्त्रीय नियमको मानकर कम्युनिष्ट अपने किसी भी सिद्धान्तको सिद्ध नहीं कर सकता । इसीलिये वह प्राचीन नियमोंका समूल परिवर्तन चाहता है । पुराने सत्य, न्याय, सिद्धान्त, नियम—सबका ही परिवर्तन चाहता है। यद्यपि यह स्वाभाविक बात है कि जिस चीजकी बहुलता हो और माँग कम हो वह सस्ती हो जाती है, जिसकी माँग बहुत और मात्रा कम हो वह महँगी हो जाती है । यही स्थिति श्रम एवं मजदूरीके सम्बन्धमें भी लागू होती है, तथापि राज्यके द्वारा समय-समयपर जैसे योग्यता, आवश्यकता एवं उत्पादनके अनुसार काम, दाम, आरामका एक स्तर निर्धारण करना आवश्यक होता है, वैसे ही मजदूरीका भी एक स्तर निर्धारण करना पड़ता है । सस्ती, मन्दीके भावोंपर भी नियन्त्रण करना पड़ता है । अन्यथा आन्दोलनोंसे मजदूर वेतन बढ़ायेगा, पूँजीपति दाम बढायेगा । फिर किसानको कपड़े आदिके लिये ज्यादा पैसा चाहिये । अतः वह गेहूँ, चावल आदिका भी दाम बढायेगा । तब मजदूरका वह बढ़ा हुआ वेतन इसी आटा, दाल, चावल, कपड़ा खरीदनेमें खतम हो जायगा और फिर वेतन बढ़ानेका आन्दोलन करेगा । फिर महँगी बढ़ेगी, वितरण अतिरिक्त आयका पञ्चधा विभाजन करके भारतीय शास्त्रोंमें यद्यपि राष्ट्र- हितार्थ उसका विनियोग बतलाया है, फिर भी अतिरिक्त आयको अवैध या अनुचित नहीं कहा जा सकता । कोई भी उद्योग यदि लागत खर्च, सरकारी टैक्सभरके लिये ही आमदनी पैदा करता है तो उससे उद्योगपतिका जीवन भी चलाना कठिन होगा और बड़ी-बड़ी मशीनोंके खरीदने आदिका काम भी न
? Wait, if it's attached under the same shirorekha, it's व्यापारियोंगorव्यापारियोंक! Wait, let's look at व्यापारियों: Is it attached? Yes, the shirorekha continues over that letter. Wait, what if the letter is NOT ग, but काconnected without space? In Hindi, postpositions likeकाare often written joined:व्यापारियोंका! Look at line 1: आयका Line 2:मशीनोंको, अन्वेषकोंको, आदिका Line 4:नुकसानका, आदिका Line 5:लाभके Line 6:आदिके Line 7:बारीमें, आदिमें, खर्चसे Line 8:श्रमका Line 9:विशेषताके Line 11:सम्पत्तिका Line 13:मालमें Line 14:भोजनका Line 15:मनुष्यकी Line 17:कार्यका Line 18:जन्मके Line 19:दुष्कृतके, गर्दभमें Line 21:मार्क्सके
३१२ मार्क्सवाद और रामराज्य नफा घट जाता है । खेतीसे उत्पन्न चीजोंका दाम बढता है । तब कारीगरीसे पैदा होनेवाली चीजोंका दाम घटता रहता है; क्योंकि नयी मशीनोंके आविष्कार तथा मजदूरोंके उत्तम प्रबन्धसे चीजोंके बननेमें लागत कम बैठती है। इस स्थितिका फल यह होता है कि पूँजीपर नफा घटता है, पूँजी कम होती जाती है, मजदूरी बढ़ती जाती है । पर मजदूरोंको उससे कोई लाभ नहीं; क्योंकि भोजन-सामग्रीका मूल्य बढता जाता है । उस समय नफा जमींदारो, जमीन तथा मकानमालिकोंके हिस्सेमें ही आता है, जो कि समाजकी उन्नतिका लिये कुछ भी नहीं करते ।' माँग और पूर्तिका नैसर्गिक नियम जिस प्रकार व्यक्तिवादी अर्थशास्त्रियोंने उपस्थित किया है, वह सामान्य स्थितिमें उपयुक्त होते हुए भी जब शोषणका कारण बनने लगे तो उसपर राज्यका नियन्त्रण अनिवार्य है । पक्षपातविहीन ईमानदार शासनका यही काम है कि वह उत्पन्न विरोधको दूरकर समन्वय एवं सामञ्जस्य स्थापित करे । दण्ड्यको दण्ड दे, अनुग्राह्यपर अनुग्रह करे, मात्स्य-न्याय मिटाये; यही राज्यका लक्ष्य होना चाहिये । विरोध बढ़ाना, उत्तेजना फैलाना, विनाशके दृश्यकी उत्सुकतासे प्रतीक्षा करना, किसी सरकार या दलके लिये शोभाकी बात नहीं है । विरोध या सघर्ष कोई सिद्धान्त नहीं है । काम, क्रोध, लोभ, मार- काट, छीना-झपटी स्वाभाविकतया ही अधिक होते हैं । निग्रहानुग्रहद्वारा मात्स्य- न्याय दूर करना एक बात है और सबका स्वामी स्वयं बन जाना दूसरी बात । कल-कारखानोंद्वारा उत्पादन बढ़नेसे जो दोष बढ़ते हैं, वे केवल मालिक बदल जानेसे घट न जायेंगे और न गुण ही हो जायेंगे । दूसरा मालिक जिस प्रकार उन दोषोको मिटा सकता है, उसी प्रकार पहला मालिक भी । केवल अपेक्षित है—ईमानदारीसे राष्ट्र-हितकी भावना । इसके बिना मजदूर सरकार भी कभी दोष नहीं मिटा सकती । उसीके सहारे कोई भी सरकार इन दोषोको मिटा सकती है । वस्तुतः यह संघर्ष भी मुट्ठीभर लोगोंका ही है । मिल-मालिक, पूँजीपतियोंकी संख्या नगण्य है । मजदूरोंकी संख्या भी सीमित ही है । भारत-जैसे देशमें मिल-मालिक मजदूरोंसे आठगुणी अधिक संख्या उन लोगोंकी है, जो न मजदूर हैं, न पूँजीपति और न जिनका इन संघर्षोंसे कोई प्रयोजन ही है । वे खेती करनेवाले, साधारणरूपमें व्यापार करनेवाले, पलटन, पुलिस, क्लर्क या अन्य ढंगके पेशेवाले हैं । उन सबके हितों तथा मतोंकी उपेक्षा करके मजदूरतन्त्र शासन स्थापित करनेका प्रयत्न सर्वथा अलोकतान्त्रिक है । जो कहते हैं कि कई उद्योगप्रधान देशोंमें ५० प्रतिशतसे भी अधिक मजदूरोंकी संख्या है, वे मतगणनाके मार्गसे मजदूरोंकी सरकार स्थापित क्यों नहीं कर लेते ? फिर
वर्ग-संघर्ष, वर्गविद्वेष, वर्ग-विध्वंसके मार्ग अपनानेकी क्या आवश्यकता ? किंच जिस प्रकार कहा जाता है कि 'पूँजीवादी-प्रणालीमें ही पूँजीवादके विनाशका बीज उत्पन्न होता है, क्या यही बात मजदूरोंके सम्बन्धमें नहीं कही जा सकती ? जैसे पूँजीपतियोंने अपने ही प्रयत्नसे अपनेको संकटमें डाल लिया, उत्पादन बढ़ाकर मजदूरोंको एक स्थानमें एकत्र होनेका अवसर उपस्थित कर अपना मार्ग अवरुद्ध कर लिया, ठीक वैसी ही बात मजदूरोंके लिये भी है। असलमें मार्क्सके मतानुसार वैज्ञानिक आविष्कारक भी बुद्धिजीवी श्रमिक ही हैं। उन्हीं लोगोंने नये-नये यन्त्र, कारखानोंका आविष्कार किया है। उन्हीं लोगोंने उत्पादन बढ़ाया । उत्पादन बढ़नेसे ही सौदेमें मंदी आयी । मंदी आनेसे वेतनोंमें कमी हुई । उत्तरोत्तर अच्छी मशीनोंकी पैदाइशसे मजदूरोंकी आवश्यकता घटी, जिससे मजदूरोंकी बेकारी बढ़ी । फलतः तत्काल मजदूरोंकी बेकारीमें श्रमजीवि वैज्ञानिक ही कारण हुए। इस तरह भलाईके साथ-साथ सर्वत्र बुराई भी लगी रहती है । बिजलीसे प्रकाशादि भी होता है, मृत्यु भी हो सकती है । इसलिये उपाय अपाय दोनों
३१४ मार्क्सवाद और रामराज्य हितार्थ ही होती है। शिबि, दिलीप, रन्तिदेव आदि इसके ज्वलन्त उदाहरण हैं। न सब पूँजीपति दूसरेका ही सर्वस्व हरण करते हैं, न सब पूँजीपतियोंका सदाके लिये सर्वस्व ही अपहृत होता है। अनेक स्थानोंमें दुष्प्रचारकोंके दुष्प्रचार व्यर्थ होते हैं और वहाँसे मार खाकर सर्वस्व गँवाकर भागना पड़ता है, जैसा जर्मनी आदि देशोंमें हुआ। उपर्युक्त वर्णनसे भी इसी निष्कर्षपर पहुँचना पड़ता है कि व्यष्टि-समष्टिके सामंजस्य- सम्पादनसे ही काम चलेगा। पहले लिख आये हैं कि मजदूर वेतन, बोनस, भत्ता बढ़ानेका आन्दोलन करके सफल भी हो जायँ, तो भी पूँजीपति उसके बदले सौदेपर दाम बढ़ायेगा। फिर उसे खरीदनेके लिये किसानको अधिक रुपयेकी जरूरत होगी। तदर्थ वह भी गेहूँ-चावलका दाम बढ़ायेगा। मजदूर भी बढ़ायी हुई मजदूरी महँगे गेहूँ, चावल, कपड़े खरीदनेमें खर्च कर देगा। अतः उत्पादन- साधनों, उत्पादकों एवं उत्पन्न होनेवाली सामग्रियोंको ध्यानमें रखते हुए ही उपयोगी नियम आवश्यक हैं। उसके बिना मजदूर राज्यके छू-मंतरसे भी समस्या- का हल होना असम्भव है। वस्तुतः सभी विचारक इस बातको मान गये हैं किमार्क्सवादमें बुद्धिजीवियों- का महत्त्व नहीं-जैसा ही है। सन् १९३६ के पूर्वतक साम्यवादी रूसमें उन्हे मत देनेका भी अधिकार नहीं था। अन्वेषक, आविष्कारक, वैज्ञानिकोंका वर्तमान विकासमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी तरह लाखो मजदूरोंसे काम लेनेवाले प्रबन्धकों- का भी (जिनके बिना लाखों मजदूर अकिंचित्कर हो जाता है) महत्त्वपूर्ण स्थान है। इसी तरह टूटे-फूटे, रद्दी टीन, लोहा आदि संगृहीत करके उनका सदुपयोग करके उनका करोड़ोकी आमदनी कर लेनेवाले विशेषज्ञोंका भी स्थान बहुत महत्त्व- पूर्ण है। इन सबको मजदूरोंके तुल्य शोषित भी नहीं कहा जा सकता और न पूँजीपतियोंके तुल्य शोषक ही कहा जा सकता है। इसी तरह किसानो एवं साधारण कामचलाऊ व्यापारियोंको अबके समाजवादी शोषित मजदूरकोटिमें गिनने लगे हैं। पहले किसान आदिकोंका मजदूरश्रेणीमें बिलकुल स्थान न था। बल्कि प्राकृतिक साधनोंसे उपार्जित करके जीविका चलानेवालोंको शोषककोटिमें ही गिना जाता रहा है। उनकी संख्याकी वृहत्ताका ध्यान न देकर बड़े घमण्डके साथ लेनिनने मजदूरोंकी तानाशाहीकी घोषणा की थी। सन् १९१७ की किसान-मजदूर-क्रान्तिके बाद रूसी-क्रान्तिके नेता लेनिनने (जो कि मार्क्सवादका सबसे बड़ा ज्ञाता समझा जाता था) मजदूरोंकी तानाशाहीका
समर्थन किया था । उस समयके स्थापित समाजवादी शासनको अभिमानपूर्ण- तानाशाहीका नाम दिया गया था । उस सम्बन्धमें यद्यपि कई आधुनिक समाज- वादी लीपा-पोती करते हुए कहते हैं कि 'यदि स्वयं मेहनत करनेवाले मजदूरोंका शासन करेगा तो मेहनत करनेवालोंका शोषण हो ही नहीं सकता । जो लोग पैदा नहीं करते, उनका शोषण किया जा सकता है ? हाँ, मजदूर-शासनमें कुछ लोगोंका दमन हो सकता है, उन्हें नागरिक अधिकारोंसे वञ्चित किया जा सकता है।' पर ये लोग कौन हैं, इनकी संख्या कितनी है, इनका भी दमन क्यों होगा ?
'मजदूर-राज्यमें प्रत्येक व्यक्ति मजदूर भी होगा और शासक भी। जब पूँजीवादी देशोंमे भी उनकी सख्या ९२ प्रतिशत या ९९ है । फिर मजदूर-राज्यमें तो उनकी सख्या शत-प्रतिशत होगी। काम न करनेवालोंकी सख्या हजारोंमें एक होगी। ऐसे लोग यदि समाजकी रायसे स्थापित शासनको उखाड़कर स्वार्थानुकूल शासन करना चाहें तो ऐसा करनेकी उन्हें स्वतन्त्रता देना प्रजातन्त्रके कहाँतक अनुकूल होगा? हाँ, मजदूर- शासनमें यदि कुछ व्यक्ति ऐसे हैं, जो सम्पूर्ण जनताके लाभार्थ समाजकी व्यवस्थामें परिवर्तन लाना चाहते हैं तो एक मजदूर होनेके नाते अपने विचार प्रकट करनेकी उन्हें उतनी ही स्वतन्त्रता है जितनी किसी दूसरे मजदूरको; क्योंकि मजदूरतन्त्रमें नागरिकोंके साधन और अधिकार समान होते हैं।'
उपर्युक्त कथन सर्वथा सत्यका अपलापमात्र है । क्या किसानोंकी भूमि-सम्पत्ति गरीब व्यापारियोंके व्यापार-साधनोंको छीन लेना शोषण नहीं है ? भारतके काश्त- कार आज भी अपनी काश्तकारी बचानेका आन्दोलन कर रहे हैं। यत्र-तत्र भू-स्वामी-सङ्घ, काश्तकार-सङ्घ बन रहे हैं। वे भूमि एव सम्पत्तिके अपहरणको घृणा- की दृष्टिसे देखते हैं और समष्टि या समाजके नामपर मुट्ठीभर तानाशाहोंके हाथमें अपनी भूमि-सम्पत्ति देकर, शासनयन्त्रका नगण्य कल-पुर्जा नहीं बनना चाहते । वस्तुतः मजदूरोंपर भी बलात्कारसे जडवादी तानाशाही शासन लादा ही जाता है। प्रायः गरीब मजदूर ईश्वरवादी धार्मिक होते हैं । भारतके शत-प्रतिशत मजदूर आस्तिक और धार्मिक हैं। वे रामायण, भागवत, गीताका सम्मान करते हैं, सत्यनारायणकी कथा सुनते, कीर्तन करते हैं केवल बोनस, वेतन, भत्ताका प्रलोभन देकर कम्युनिष्ट उन्हें अपने आन्दोलनोंमें शामिल करते हैं। यदि वे समझ जायें कि कम्युनिष्ट ईश्वर, धर्म एव शास्त्र नहीं मानते तो वे भूलकर भी उनके डाँड़े न जायें । हाँ, उनकी अपेक्षित माँगमें कोई ईश्वरवादी-दल सहायक हो तो वे सोलह आने उसीका साथ देंगे। हरेक मजदूर भी स्वतन्त्रता चाहता है।
३१६ मार्क्सवाद और रामराज्य दान-पुण्य करना चाहता है। अपनी सम्पत्ति अपने बेटे-पोतोंके लिये छोड़ना चाहता है। यदि वह जान ले कि कम्युनिष्ट-राज्यमें बाप-दादेकी कमाई बेटे-पोतेकी बपौती मिलकियत नहीं समझी जाती तो वह कभी भी कम्युनिष्टोंमें शामिल न होगा। यदि वह जान ले कि काम न करनेवाले वृद्ध माता, पिताको एवं वृद्ध होनेपर उसे भी कम्युनिष्ट-राज्यमें कोई स्थान नहीं है, तो अवश्य ही उसे घबड़ाहट होगी। इसके अतिरिक्त यह भी हम कह आये हैं कि यदि पूँजीवादी शासनमें ९९ मजदूर हैं, तो वहाँ मजदूर-सरकार क्यों नहीं बन जाती ? क्योंकि वहाँ तो मतगणना- के आधारपर सरकारें बनती हैं। अतः मजदूरोंकी उक्त संख्या मिथ्या एवं भ्रामक है। इसी तरह यह भी झूठ है कि किसी भी श्रम करनेवाले मजदूरको अपने विचार व्यक्त करनेकी स्वतन्त्रता है। जहाँ कोई स्वतन्त्र प्रेस या पत्र नहीं हो सकता, नागरिक स्वतन्त्रतापूर्वक किसी दूसरे देशके विचार नहीं पढ़ सकते, रेडियो सुन नहीं सकते, अपने देशमें भी स्वतन्त्रतासे अपने मतका प्रचार नहीं कर सकते, वहाँ भी प्रजातन्त्र एवं प्रजाहितकी बात करना सर्वथा उपहासास्पद है। वस्तुतः जो सम्पूर्ण जड़ प्रपञ्चको निरीश्वर मानते हैं, कोई शाश्वत नियम नहीं मानते, व्यक्तिगत शासन नहीं मानते, उन्हे कोई शासन बनानेका अधिकार भी कैसे है ? व्यक्तिका समुदाय ही समष्टि है। व्यक्तिमें जो गुण नहीं, वह समष्टिमें भी न आयेगा। लाल सूतोंसे ही लाल कपड़ा बनता है। सफेद सूतोंमें लालिमा नहीं है, अतः उनसे लाल कपड़ा नहीं बन सकता। यदि व्यष्टि शासन अमान्य है तो समष्टिके नामपर भी शासन नहीं बन सकता, फिर तो अराजकताका ही समर्थन श्रेष्ठ है। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरेका शासन क्यों मानेगा ? जो कोई सत्य, नियम या सिद्धान्त नहीं मानता, वह किस आधारपर नये सिद्धान्तोंकी स्थापना कर सकेगा ? गत दिनो (१९५४ में) किसी ब्रिटिश मन्त्रीने विचार-स्वातन्त्र्यके सम्बन्धमें एक लेख 'प्रवदा' (रूसी-पत्र) में भेजा था। जिसमे उन्होंने अखबारों, रेडियो तथा साम्यवादी विचारोंके विरुद्ध रूसी प्रतिबन्धकी चर्चा करते हुए रूसमे विचार- स्वातन्त्र्यका अभाव बतलानेका प्रयत्न किया था। 'प्रवदा'ने उसी अङ्कमे उसका उत्तर भी छापा था। उत्तरका सार यही था कि राष्ट्रियता-विरोधी भावोंको न पनपने देना भूषण है, दूषण नहीं। पर क्या कोई पूछ सकता है कि राष्ट्रिय विचार क्या शासनाारूढ दलका विचार है ? वस्तुतः यदि स्वतन्त्रताके साथ विश्वकी मत- गणना हो, तभी राष्ट्रिय विचारका पता लग सकता है।
षष्ठ परिच्छेद मार्क्सीय अर्थ-व्यवस्था मूल्यका आधार कहा जाता है, 'पूँजीवादी समाजके जीवन और गतिका आधार होता है खरीदना, बेचना तथा वस्तुओं एवं श्रमका विनिमय ही परस्पर सम्बन्धका सार है । मार्क्सके मतानुसार 'पूँजीवादके अन्तर्गत जो माल तैयार होकर बाजारमें जाता है उनके दो तरहके मूल्य होते हैं—एक उपयोग सम्बन्धी, दूसरा विनिमय-सम्बन्धी । पहलेका अभिप्राय उस वस्तुके गुणसे है, जिससे खरीदनेवालेकी शारीरिक या मानसिक आवश्यकताकी पूर्ति होती है। जिसका उपयोग मूल्य नहीं होता, उसका विनिमय या विक्रय नहीं होता। उपयोग मूल्यकी दृष्टिसे प्रत्येक वस्तु दूसरीसे भिन्न होना चाहिये। कोई आदमी एक मन गेहूँका परिवर्तन उसी ढंगके गेहूँसे नहीं करता; हाँ, उसका परिवर्तन २० गज कपड़ेमे कर सकता है। अब यह प्रश्न होता है कि एक वस्तुका विनिमय दूसरी वस्तुसे कैसे और किस नियमसे हो ? इसी नियम या कायदेका नाम विनिमय मूल्य है। इसका आधार श्रमके उस परिमाण और कठोरतापर निर्भर होता है, जो किसी वस्तुके बनाये या पैदा करनेमे आवश्यक होता है। बाजारमें श्रमके समान परिमाणका परस्पर बदला किया जाता है। श्रमका परिमाण इस दृष्टिसे नहीं नापा जाता कि अमुक व्यक्तिको एक वस्तु बनानेमें कितनी देर लगती है। किंतु समाजमें आमतौरसे प्रचलित प्रणालीसे जितना समय लगता है उसी हिसाबसे श्रमका परिमाण नापा जाता है। जैसे हाथसे कपडा बुननेवाले जुलाहेको २० गजके थान बनानेमें २० घंटे काम करना पड़ता है, जो कि आधुनिक मशीनोंद्वारा ५ घंटे या उससे भी कम समयमें बनाया जा सकता है। पर हाथसे कपड़ा बुननेवालेको—चौगुना-पाँचगुना मूल्य नहीं दिया जा सकता। अतः मार्क्सके मतानुसार वस्तुके विनिमय मूल्यका आधार वह परिमाण है, जो उस वस्तुके तैयार करनेमें लगता है। परंतु श्रमका यह परिमाण सदा एक सा नहीं रहता। नये आविष्कारोंसे माल तैयार करनेके ढंगमें उन्नति और श्रमजीवियोंकी उत्पादनवृद्धि आदि कारणोंसे किसी वस्तुके बनानेके लिये आवश्यक श्रमका परिमाण घट सकता है। उस अवस्थामें यदि दूसरी बातें (जैसे उसकी वस्तुकी माँग सिक्का आदि) ज्योंकी त्यों बनी रहें, तो विनिमय मूल्य भी कम हो जाता है। अतः श्रम ही विनिमय मूल्यका आधार है। विनिमय मूल्यका
३१८ मार्क्सवाद और रामराज्य ही किसी समाज या देशकी सम्पत्तिका निर्णय किया जा सकता है। वस्तुओंके तैयार करनेमें जितना श्रम अपेक्षित होता है, अगर वे उससे कममें तैयार होने लगे, तो किसी देशकी सम्पत्ति आकारमें भले ही बड़ी हों, पर मूल्यकी दृष्टिसे नगण्य हो सकती हैं। उद्योग-धंधोंकी दृष्टिसे जो देश जितना अधिक अग्रसर होता है, उसकी सभ्यताका दर्जा जितना ऊँचा होता है, उतनी उसकी सम्पत्ति भी अधिक होती है। सम्पत्तिकी उत्पत्तिपर श्रम भी कम खर्च होता है। वर्तमान व्यावहारिक राजनीतिमें यह अधिक मजदूरी और कम घंटेके कामके रूपमें दृष्टिगोचर होती है। विनिमय मूल्यका आधार उपयोग-मूल्य ही होता है। यदि कोई चीज इतनी अधिक बन जाय, जिसकी लोगोंको आवश्यकता न हो, तो शेष वस्तुका कुछ भी मूल्य नहीं रह जाता, भले ही उसके तैयार करनेमें श्रम किया गया है। इसलिये विनिमय मूल्य या समाजद्वारा किये गये श्रमका पूरा फल तभी प्राप्त हो सकता है, जब कि वस्तुओकी पैदावार और उनकी माँगमें समानता बनी रहे। इसके लिये संघटन और समाजके मार्गदर्शनकी आवश्यकता होती है।' कहा जाता है, 'प्राचीन अर्थशास्त्रोंके मतानुसार पूँजीपति जो कि उत्पत्तिका नियन्त्रण करता है, अपनी पूँजीद्वारा मजदूरोंको औजार और कच्चा माल पहुँचाता है। वह तैयार मालको बिकवाता है, माल तैयार होनेके क्रमको जारी रखता है, अतः वही मूल्यका उत्पादक माना जाता है। वह श्रमजीवियोंकी भी उत्पत्तिका एक साधन गिना जाता है। पर मार्क्सके मतानुसार श्रमजीवी ही जो कच्चे मालसे वस्तुएँ तैयार करते तथा कच्चा माल उत्पन्न करके वस्तु-निर्माणके स्थानतक पहुँचाते हैं, मूल्यके एकमात्र उत्पादक हैं।' वस्तुतः यह कोई अनहोनी बात नहीं है। व्यवहारमें सुगमता लानेके लिये मुद्रा या रुपयोंका प्रचलन ठीक ही है। मनभर गेहूँका दाम दो बकरी या एक जोड़े जूतेका दाम एक मेज है, इस व्यवहारमें झंझट अधिक है। व्यवहारमें सुविधाके लिये रुपयाके द्वारा पदार्थोंके दाम आँके जाते हैं ! कोई सौदा देकर रुपया ले लेनेपर इस बातका संतोष रखता है कि आवश्यक होनेसे उस रुपयेसे कोई भी चीज खरीदी जा सकती है। पदार्थोंके संग्रह करने या ले जाने, ले आनेमें अनेक कठिनाइयाँ होती हैं। रुपयोंसे ऐसी कठिनाइयाँ दूर होती हैं। रहा यह कि पूँजीपतिको उसके द्वारा मुनाफा खींचने या जमा करनेका अवसर मिलता है। पर सदुपयोग-दुरुपयोग प्रत्येक वस्तुका किया जा सकता है। मशीन चलानेवाली, प्रकाश फैलानेवाली बिजलीसे प्राणी आत्महत्या भी कर सकता है। रुपयेसे व्यवहारमें हर प्रकारकी सुविधा ही होती है। उधार या कर्जके रूपमें लेना देना, उगाहना
आदि रुपयेके व्यवहारमें सुगमता होती है । किसीको रुपयेसे लाभ होता है, एतावता वह बुरा नहीं कहा जा सकता । क्रय-विक्रयके काममें आनेवाली वस्तुओके दामका आधार भी केवल श्रम नहीं है, किंतु उपयोगिता एवं माँग दामका आधार है । और उसका भी परम आधार है उपकार्य-उपकारकभाव । विकासवादियोंके अनुसार अध्यात्मवादी नया आविष्कार नहीं मानते, किंतु वेदादिशास्त्रोंद्वारा विहित वर्णाश्रमानुसारी श्रौतस्मार्त्त धर्मद्वारा देवार्चन करना और उनके द्वारा प्रदत्त वृष्टि अन्न, प्रजा आदिरूपमें फल प्राप्त करना—यह सब भी विनिमय ही है । परम दार्शनिक भगवान् श्रीकृष्णने कहा है कि—तुम यज्ञसे देवताओंका अर्चनकर संवर्द्धन करो । देवता भी विविध फल प्रदानकर तुम्हारा संवर्द्धन करेंगे । इस तरह परस्पर एक दूसरेका पोषण करते हुए आप सब परम श्रेयके भागी होगे । देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ ( गीता ३ । ११ ) निःसीम, ज्ञान, शक्ति-सम्पन्न ईश्वर ही है ।
३२० मार्क्सवाद और रामराज्य बौद्धश्रमका महत्त्व अधिक होता था। शारीरिक, बौद्धिक सभी कर्मोंमे अभ्याससे योग्यता बढ़ती है। साथ ही कुछ जन्मजात, जन्मान्तरीय विशेषताएँ भी होती हैं। कभी-कभी समान पिताके पुत्रोंको समान सुविधा तथा शिक्षाका प्रबन्ध रहनेपर भी कोई किसी कार्यमें दक्ष होता है; कोई किसी दूसरे कार्यमें और कोई किसी भी कार्यमें दक्ष नहीं होता। उस दक्षताके तारतम्यसे भी श्रमके मूलका भेद हो जाता है। आधुनिक लोग भी फावड़ा चलानेवाले श्रमिककी अपेक्षा इंजीनियरके श्रमका बहुत ज्यादा मूल्य समझते हैं। यद्यपि फावड़ा चलानेवालेके श्रममें बहुत कठोरता है। इंजीनियरके श्रममें कठोरता नगण्य ही है। कभी श्रमद्वारा निर्मित उपयोगी वस्तुका श्रमनिर्मित दूसरी उपयोगी वस्तुके साथ विनिमय होता है, परंतु कभी श्रमका ही वस्तुके साथ विनिमय होता है। जैसे किसीसे अमुक परिमाणमें कोई उपयोगी वस्तु या रुपया देकर अमुक मात्रामें शारीरिक या बौद्धिक श्रम लिया जाता है। कभी-कभी श्रम-निर्मित उपयोगी वस्तु देकर गाय या बकरी आदि ऐसी वस्तु खरीदते हैं, जिसके बनानेमें श्रम कुछ भी नहीं खर्च होता। श्रमकी बराबरीके अनुसार दामकी बराबरीकी बात सर्वथा असंगत एवं अव्यावहारिक है। शीसम एवं चन्दनके सिंहासन बनानेमे श्रम समान ही होगा; पर दोनोंके मूल्यमें पर्याप्त अन्तर होता है। लोहेकी थाली एवं सोनेकी थालीमें श्रमके विपरीत मूल्य मिलनेका व्यवहार आज भी प्रचलित है। पहाड़से निकले हुए अपरिष्कृत हीरेमें कुछ भी श्रम नहीं लगा; किंतु लाखो गज कपड़ेके बनानेमें अपेक्षित महान् श्रम भी उसके बराबरका नहीं ठहरता। अतः कहना पड़ेगा कि उपयोग तथा माँगके अनुसार ही वस्तुका मूल्य होता है। यह बात श्रम एव श्रम-निर्मित पदार्थ दोनोंहीके सम्बन्धमें समानरूपसे लागू होती है। जल, वायु आदि अत्यन्त उपयोगी होते हुए भी जहाँ पर्याप्त मात्रामें सुलभ होते हैं, वहाँ उनका कोई दाम नही है। पर जहाँ कमी होनेके कारण उनकी माँग होती है, वहाँ उनका भी दाम बढ़ जाता है। यदि हीरा भी पानी या बालूके तुल्य पर्याप्त हाता और उसकी मांग न होती, तो इतने मूल्यका वह न होता। अथवा यदि वह शौकीन धनिकोंकी मानसिक आवश्यकताका पूरक न होता तो भी उसकी कीमत नगण्य ही होती। पहाड़में उत्पन्न हानेवाली विभिन्न वस्तुओके मूल्यमें जो कच्चे मालके रूपमें है; पर्याप्त अन्तर है। इसी प्रकार जंगलमें स्वतः उत्पन्न विभिन्न प्रकारकी ओषधियो, लकड़ियो तथा हिरण, गाय, हाथी, बाघ, बकरे आदि पशुओंके, जिनमें मनुष्यका कुछ भी श्रम खर्च नहीं हुआ है, दामोंमें पर्याप्त अन्तर है, परस्पर विनिमय भी हो सकता है। यह विनिमय श्रमकी बराबरीके आधारपर नहीं; किंतु उपयोगिता एवं माँगके आधारपर ही है, ऐसा कहना पड़ेगा। वस्तुके महत्त्व, अल्पता, बहुलताके साथ, उपयोग एवं माँगका सम्बन्ध रहता है। एक ज्ञानशून्य मनुष्य और बकरेके लिये
रोटी या नीमकी पत्तीका जो महत्त्व है, वह हीरेका नहीं । जो वस्तु जिसके बाह्य या आन्तरिक आवश्यकताओ, इच्छाओंकी पूरक होती है, उसके प्रति ही उसकी कीमत होती है । कभी-कभी एक गिलास पानी या एक टुकडा रोटी भी सैकड़ों हीरेके बराबर ठहरती है । गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं—'सपति सगरे जगतकी, स्वासा सम नहिं होइ ।' सारे संसारकी सम्पत्ति एक श्वासके बराबर नहीं होती । यदि कोई गुणी करोड़ों हीरा लेकर भी मरणकालमें श्वास लौटा दे, तो यह सौदा महँगा नहीं समझा जाता । वस्तुतः मार्क्स श्रमको ही आमदनी या मूल्यका आधार मानकर, प्राकृतिक वस्तु या कच्चे मालके उत्पादनका महत्त्व घटाकर मजदूर-राज्यका औचित्य सिद्ध करना चाहता है, परंतु उपर्युक्त कथनानुसार यही कहा जा सकता है कि मूल्यमें श्रम भी कारण है । जैसे श्रम बिना कभी मशीन एवं कच्चे माल तथा भूमि- खान आदि अन्य प्राकृतिक साधन मुर्दे पड़े रहते हैं, वैसे ही श्रम भी उपयुक्त साधनों बिना निरर्थक ही रह जाता है । काम लेनेवाला न हो तो कामका कुछ भी फल नहीं होता । काम लेनेवाला तथा दाम देनेवाला न मिलनेसे ही बेकारीका प्रश्न उठता है । यह ऊपर कहा ही जा चुका है कि अनेकों ऐसी वस्तुएँ हैं, जिनके उत्पादनमें श्रम कुछ नहीं हुआ और उनका उपयोग-मूल्य एवं विनिमय-मूल्य दोनो ही होता है । कोई भी कार्य लाभके लिये ही किया जाता है, तभी अति समान वस्तुका विनिमय नही होता । अर्थात् एक मन गेहूँका उसी ढगके एक मन गेहूँके साथ विनिमय नहीं किया जाता । यातायातके द्वारा देशान्तर, कालान्तरके सम्बन्धसे क्रय-विक्रय या विनिमय लाभके लिये ही होते हैं । जैसे भारतका जूट विदेशोमें विशेष मूल्य देता है; मार्गशीर्षका चावल श्रावणमें अधिक मूल्यवान् हो जाता है । अपनी आवश्यकतासे अधिक उत्पादन होने एवं अन्य वस्तुओंकी अपेक्षा होनेसे ही विनिमय या क्रय-विक्रयकी बात चलती है । अतएव खेती, मजदूरी और नौकरीके धंधेके समान ही क्रय-विक्रयका एक धंधा है । यदि उससे लाभकी सम्भावना न हो तो उसमें कोई प्रवृत्त ही क्यो हो ? मूल्य और श्रम कहा जाता है, 'मशीनोके नये आविष्कारो एवं उत्पादनके कामोमें दक्षता आनेसे कम श्रममें वस्तु उत्पन्न होने लगती है । इसीलिये वस्तुका दाम कम हो जाता है । अतः सिद्ध है कि श्रम ही विनिमय-मूल्यका आधार है ।' पर यह बात ठीक नहीं जँचती । कारण, दूसरा पक्ष यह कह सकता है कि मालकी अधिकताके कारण ही माँग घटी और माँग घटनेसे विनिमय-मूल्य घटा । माल बढानेके कारण मशीनें भी हैं ही । आवश्यकतासे अधिक सौदा तैयार हो जानेपर मार्क्सवादी श्रमको मा० रा० २१--
३२२ मार्क्सवाद और रामराज्य निरर्थक मानते हैं। वस्तुतः उपयोग-मूल्य और विनिमय-मूल्य, यह विभाजन ही व्यर्थ है। उद्देश्यभेदसे वस्तुभेद नहीं होता। अग्नि अपने लिये जलायी जाती है, वह दूसरोंके काममें भी आती है। अग्निहोत्रके उद्देश्यसे अग्नि-मन्थन करके अग्नि प्रकट की जाती है, फिर वही भोजन बनानेके काममें आती है। कभी उसीसे यज्ञशाला भी जल जाती है। पर इतनेसे ही अग्नि दो नहीं हो जाती। भारतीय दृष्टिसे तो कोई वस्तु केवल अपने लिये पैदा ही नहीं की जाती। यज्ञ, दान, देवता, पितर तथा पड़ोसीका हित भी उद्देश्य रहता है। फिर जब अन्य वस्तुएँ तथा रुपये भी अपने काममें आते हैं, तब बेचनेके लिये तैयार किया हुआ माल भी तो प्रकारान्तरसे आत्मार्थ ही हुआ। यदि वस्त्रादि पदार्थ या रुपयादि अपेक्षित न हों तो क्यों श्रमसे वस्तु-निर्माण करे और निर्मित वस्तुको दूसरोंको क्यों दे ? अतः निष्पक्षरूपसे सर्व- हितकारी रामराज्य है। यह ठीक है कि श्रम बिना कच्चा माल तथा मशीनें व्यर्थ हैं, पर श्रम भी प्राकृतिक साधनों (कच्चे माल) के अभावमें निरर्थक ही है। अतएव श्रमको केवल सहकारी कारण माना जा सकता है। जैसे घटका कारण मृत्तिका है, पर जल सहकारी कारण है; क्योंकि जलके बिना घटका निर्माण नहीं हो सकता। तो भी घटके कारणोंमें मृत्तिकाकी प्रधानताका खण्डन नहीं हो सकता, पर सहकारी कारण होनेसे जलकी तरह श्रम भी अवश्य महत्त्वपूर्ण है। साथ ही प्राकृतिक साधन तो श्रमानपेक्ष भी कुछ मूल्य रखते हैं, पर अन्य साधनोंके अभावमें श्रमकी कोई कीमत नहीं। मजदूरी कहा जाता है, 'यद्यपि मालूम पड़ता है, मजदूरको उसके श्रमके बदले पूरी मजदूरी मिल रही है, परंतु उसको घोड़ाको दाना देनेके तुल्य केवल उतनी ही मजदूरी दी जाती है, जितनेमें वह जीवन-निर्वाह कर सके और उसमें काम करनेकी शक्ति बनी रहे। जब कभी वस्तुओकी दर घट जाती है, तो मजदूरीका परिमाण ज्यो-का-त्यो बना रहनेपर भी मजदूर जीवन-निर्वाहकी अधिक सामग्री पा सकते हैं। वस्तुओके दर बढनेपर कम सामग्री मिलने लगती है। इस दृष्टिसे मजदूरों- के वेतनके रुपयोंकी संख्या ज्यो की-त्यो बनी रहनेपर भी वास्तवमें उनकी मजदूरी घटती-बढ़ती रहती है। पूँजीवादी अर्थशास्त्रकार इस नियमको स्पष्ट और न्याययुक्त मानते हैं। पर मार्क्स इससे संतुष्ट नहीं। उसका कहना है कि कोई पूँजीपति उसी नौकरको रखता है, जो उसे दी जानेवाली मजदूरीसे अधिक माल तैयार करता है। यदि अपने जीवन-निर्वाहके लायक सामग्री पानेके लिये मजदूरको प्रतिदिन ५ घंटा काम करना पर्याप्त हो, तो उसे ५ घंटे पूँजीपतिके लिये भी काम करना आवश्यक होता है। अतः मार्क्सके मतानुसार मजदूरके अपने लिये किये गये श्रमको